“वीर शिरोमणि महाराजा दाहिर सेन”

भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने भारत के शौर्य और असल इतिहास को कहीं छुपा दिया। सिंध के आखिरी ब्राह्मण राजा दाहिर का इतिहास किसी को न पता होना भी इसी का नतीजा है।

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सिंध के आखिरी ब्राह्मण राजा एवं वीर योद्धा महाराजा दाहिर।(Wikimedia Commons)

आज इतिहास के गलियारे से फिर एक ऐसे योद्धा की कहानी आप सबके समक्ष लाया हूँ जिन्हें हमने भुला दिया। वामपंथी इतिहासकरों की वजह से यही बात आज के भारत के लिए नासूर बन चुकी है। उन्होंने हिन्दुओं को बुरे संदर्भ में तो दिखाया ही और तो और उनके इतिहास को दबा भी दिया, जिन्हें आज हमें कुरेद-कुरेद कर निकालना पड़ रहा है। राजा दाहिर की कहानी जानने से पहले हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि हमने कई इतिहासों को धूमिल कर दिया है। हम अगर सनातन धर्म की बात करते हैं तो राजा दाहिर का नाम भी लिया जाता है, जिसका कारण आपको आगे पता चलेगा। इसलिए हमें हर जन में अपने इतिहास को जीवित रखना होगा।

“वीर योद्धा महारजा दाहिर”

सिंध भूमि वैदिक काल से ही योद्धाओं और ऋषि-मुनियों की वजह से जानी जाती है। सिंधु नदी के किनारे न जाने कितने ही वेदों के ऋचाओं की रचना हुई। पौराणिक भारत वर्ष में सिंध ने कई वीर-वीरांगनाओं को जन्म दिया जिन्होंने सिंध का ही नहीं बल्कि भारत वर्ष का पताका विश्वभर में फहराया। वीर शिरोमणी महाराजा दाहिर सेन भी उन्हीं में से एक थे।

यह उस समय की बात है जब ईसवी शताब्दी प्रारम्भ होने के छह सौ साल बीत चुके थे और उस समय के राजा थे राजा राय साहसी, जिनकी लम्बी बीमारी के उपरांत मृत्यु हो गई। राजा का कोई संतान न होने की वजह से उन्होंने अपने प्रधानमंत्री, कश्मीरी ब्राह्मण चच को अपना उत्तराधिकारी बना राज्य सौंप दिया। रानी सोहन्दी एवं राजदरबारियों की इच्छानुसार राजा चच ने रानी सोहन्दी से विवाह किया और महाराज दाहिर का जन्म हुआ। राजा चच ने राज्य का पदभार संभालते ही लोहाणा, गुर्जर और जाटों को पदों से मुक्ति दे दी और साथ ही उन्हें राज्यसभा से निलंबित कर दिया। किन्तु, राजा चच की भी जल्द मृत्यु हो गई जिसके बाद उनके भाई चन्दर ने पदभार संभाला, जो कि चच के राज में प्रधानमंत्री थे। चन्दर ब्राह्मण कुल के होने उपरांत भी बौद्ध धर्म अपनाया, जिस वजह ब्राह्मण समाज में आक्रोश आ गया। चन्दर ने 7 वर्ष तक राज-काज संभाला।

उनके बाद राज्य की बागडोर संभाल रहे थे महाराजा दाहिर जिनके अधीन 7 और राज्य भी थे। राजा दाहिर को सिंघासन पर आसीन होने के साथ ही कई चुनौतियों का भी सामना करना था। एक तरफ तो अपने पिता द्वारा लोहाणा, गुर्जर और जाटों का निलंबन और उनका आक्रोश और दूसरी तरफ अपने चाचा की वजह से ब्राह्मणों में गुस्सा। इन दोनों ही परिस्थितियों से राजा दाहिर को किसी भी हाल में निकलना था। इसलिए राजा दाहिर ने सब को एकजुट और एकमत होकर साथ लेकर चलने का संकल्प लिया। महाराजा दाहिर ने सिंध का राजधर्म सनातन हिन्दू धर्म को घोषित कर ब्राह्मण समाज की नाराजगी दूर कर दूरदर्शिता का परिचय दिया। और साथ ही जो बौद्ध धर्म के अनुयायी थे उन्हें भी अपने मंदिर व मठों के निर्माण की अनुमति दे दी गई। सभी को साथ लेकर चलना ही उनकी प्राथमिकता थी। इसी प्राथमिकता के कारण सिंध के समुद्री मार्ग सभी के लिए खुले थे और दूर देशों से व्यापारी सिंध के जरिए व्यापार करने आते थे। महाराजा दाहिर अपना शासन राजधानी अलोर से चलाते थे और देवल बन्दरगाह पर प्रशासनिक कार्य देखने के लिए अलग सूबेदार नियुक्त किए हुए थे।

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(सांकेतिक चित्र, Pixabay)

एक बार देवल बरदारगाह पर कुछ ऐसा घटित हुआ जिसने बाद में इतिहास को नई पगडंडी दे दी थी। हुआ ऐसा कि देवल बदरगाह पर एक अरबी जहाज आ कर रुका। जहाज में सवार सरक्षाकर्मियों ने एका-एक हमला कर कई महिलाओं और बच्चों को जहाज में बंदी बना लिया। जब इस बात की सुचना सूबेदार को मिली, तब उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से जहाज पर आक्रमण किया और सभी नागरिकों को सुरक्षित बंधमुक्त करवा दिया, और अरबियों को पैर सर पर रख के भागने पर विवश कर दिया।

हार से तिलमिलाए व्यापारी ईरान के शासक खलीफा के पास पहुंचे और सिंध में हुई घटना को नहीं बल्कि वहाँ पर चोरी की झूठी कहानी बताकर सहानुभूति प्राप्त करना चाहा। खलीफा के पूर्वज पहले भी सिंध पर कब्जा करना चाहते थे मगर कभी सफल नहीं हो पाए। व्यापारियों की मनगढंत कहानी ने आग में घी का काम किया, क्योंकि खलीफा खुद सिंध पर आक्रमण का बहाना ढूंढ रहा था। जिसके बाद सिंध पर आक्रमण के लिए अब्दुल्ला नमक व्यक्ति के नेतृत्व में सैनिकों को भेजा गया। इसी कड़ी में जब देवल की घटना का राजा दाहिर को पता चला तो उन्हें यह बोध हो चुका था कि ईरान इसका बदला जरूर लेगा। जिस वजह से देवल बदरगाह की सुरक्षा और बढ़ा दी गई और सेना को किसी भी युद्ध के लिए सचेत रहने के लिए कहा।

और जो सोचा था वही हुआ, ईरानी सेना ने देवल पर आक्रमण कर दिया। किन्तु सिंध के शेर राजकुमार जयशाह के नेतृत्व में उनके स्वागत के लिए तैयार खड़े थे। एक-एक सिंधी सैनिक तीन-तीन ईरानियों पर भारी पड़ रहा था। इसी युद्ध में ईरानी सेना का नायक अब्दुल्ला मारा गया और नेतृत्वहीन ईरानी सैनिकों को उलटे पांव भागने पर विवश कर दिया। राजकुमार जयशाह के नाम जयकार होने लगे। सभी सैनिकों की आरती की गई। इस हार से खलीफा और अधिक तिलमिला गया। खलीफा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे इस तरह से पराजय मिलेगी। जिसके बाद उसने पुनः आक्रमण की योजना बनाई और इस बार अरब का नेतृत्व का रहा था मोहम्मद बिन कासिम। एक बात और कि 74 सालों में नौ खलीफाओं ने सिंध पर 14 बार आक्रमण का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं रहे। और कासिम के नेतृत्व में यह पन्द्रहवां आक्रमण था, जिसमे 10 हज़ार से अधिक सैनिक ऊंट घोड़ों पर भेजे गए।

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महाराज ने बौद्धमत के ज्ञानबुद्ध नामक व्यक्ति को देवल का सूबेदार नियुक्त किया था। जब उसे अरबी आक्रमण के विषय में पता चला तो वह भयभीत हो गया और इसी कायरता ने उसे गद्दारी करने पर प्रेरित किया। जिसके बाद ज्ञानबुद्ध ने अपने मंत्री मोक्षवासव से समझौता करके खलीफा से सिंध के देवल और अलोर की राजगद्दी के बदले में उन्हें सहायता देने का सन्देश भेजा। और सिंध खेमे में गद्दार होने की वजह से अरबी सरदार लालायित हो गया और इस प्रस्ताव को स्वीकारते हुए उसने भी ज्ञानबुद्ध को मैत्री का पत्र भेजा।

अरबी सैनिकों को राज्य के निकट आता देख राजा दाहिर ने सिंधी सैनिकों को कूच करने का आदेश दिया। और इस बार भी सिंधियों का नेतृत्व कर रहे थे राजकुमार जयशाह। सिंध देश और महाराजा दाहिर के नाम की उद्घोष करते हुए सैनिक आगे बढ़े। पिता द्वारा हटाए गए गुर्जर, जाट और लोहाणों को पुन: सामाजिक अधिकार देते हुए सेना में सम्मिलित किया गया। उनका विश्वास और आत्मबल देखने को बन रहा था। हर एक सिंधी सैनिक की आँखों में अरबी सैनिकों का कटा हुआ सर नज़र आ रहा था।

वह पल भी आ गया जब सिंधी वीरों को अपने शौर्य और पराक्रम की परीक्षा देनी थी। अरबी सेना देवल किले के बाहर डेरा डाले बैठी थी। दोनों ओर से सैनिक एवं नायक तैयार खड़े थे और रणभेरी बजते ही आक्रमण की घोषणा हो गई। सभी सिंधी वीरों ने अरबियों के छक्के-छुड़ा दिए। पहले दिन ही उन अरबी सैनिकों को मौत अपने सर पर मंडराता दिखा। साँझ होते-होते अरब दल को काफी नुकसान हो चुका था और साथ ही युद्ध विराम की घोषणा भी हो गई। सभी सैनिक अपने शिविरों में विश्राम करने चले गए। किन्तु रात्रि में ज्ञानबुद्ध और मोक्षवासव ने एक ऐसा घिनोना चाल चला जिसकी आज हम पड़ोसी देश से अपेक्षा रखते हैं। उन दोनों ने अरबी सैनिकों को देवल किले के पीछे के मार्ग से दाखिल करा दिया और उन अरबी सैनिकों ने सिंध के विश्राम कर रहे सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। जिसमे राजकुमार जयशाह घायल हो गए और वह जंगल की तरफ भाग गए। देवल पर अरब का कब्ज़ा हो गया।

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रात के समय ईरानियों ने छल से सिंधी वीरों पर हमला किया। (सांकेतिक चित्र, Unsplash)

जब इस घटना की सूचना अलोर पहुंची तब राजा दाहिर ने रणभूमि में उतरने के फैसला किया और रानी लाडीबाई के कन्धों पर किले की बागडोर सौंप कर तुरंत देवल के लिए रवाना हो गए। स्वयं महाराज दाहिर को रणभूमि में पाकर सिंधी सैनिकों में जोश का गुबार फूट पड़ा। अरबी सैनिकों को हार समीप आती दिखाई देने लगी, किन्तु विश्वासघातियों ने पहले से बिछाए विस्फोटकों में आग लगा दी। जिस वजह से अफरा-तफरी मच गई और विस्फोटकों के कारण राजा दाहिर जिस हाथी पर बैठे थे उसके होदे में आग लग गई। हाथी डर की वजह से भागने लगा और महावत ने हाथी को नदी की तरफ मोड़ दिया। हाथी ने जाते ही नदी लगा दी और राजा ने अपने शस्त्र सँभालते हुए नदी में कूद गए। किन्तु घात लगाए अरबी सैनिकों ने नदी को घेर लिया और महाराज पर तीरों की वर्षा कर दी, जिससे महाराज दाहिर की मृत्यु हो गई। अपने राजा का मृत शरीर देख सिंधी सैनिकों का मनोबल चरमरा गया किन्तु सभी अंतिम साँस तक लड़ते लड़ते शहीद हुए। राजा दाहिर समेत सभी सिंधी सैनिकों ने अपनी मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर कर दिए।

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अरबियों ने सभी मंदिर और मठों को ध्वस्त कर दिया। (सांकेतिक चित्र, Pixabay)

अरबियों ने इस घिनौनी और षड्यंत्रकारी जीत के बात कत्लेआम के खेल को शुरू कर दिया। महिलाएं, बच्चों और वृद्धों को बेरहमी से मारा गया। कुछ को इस्लाम अपनाने के लिए छोड़ दिया तो किसी को वैश्या बनाने के लिए। नौजवानों में से एक को भी बक्शा नहीं गया। सभी मंदिर और बौद्ध मठों को ध्वस्त कर दिया गया। राजा के मृत्यु की सूचना अलोर पहुंची तो रानी लाडीबाई ने सभी वीरांगनाओं को एकत्रित किया और अरबी सैनिकों के स्वागत के लिए तीर तलवारें तैयार किए। सिंधी वीरांगनाएं रणभूमि में गर्जना कर रहीं थीं। किन्तु हज़ारों के सामने कुछ सौ नहीं टिक पातीं। तब लाडीबाई समेत कई वीरांगनाओं ने जौहर को अपनाया।-अंत

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आज के भारत में ना किसी को महाराजा दाहिर के विषय में ज्ञान है और न ही सिंध के वीरों विषय में, वह इसलिए क्योंकि वामपंथी इतिहासकारों ने कभी चाहा ही नहीं कि देश के नवयुवकों तक हिंदुत्व या उस से जुड़ा इतिहास पहुंचे। हम उन सभी वीरों के इतिहास को भुलाकर न केवल उनके शौर्य और मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम का अपमान कर रहें बल्कि भारतीय इतिहास की भी हत्या कर रहें हैं।

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