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ओपिनियन

लव जिहाद : पहले और अब की कहानी

बीते कुछ दिन में लव जिहाद को लेकर अच्छी खासी चर्चा पूरे देश में चल ही रही है , एवं उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों कि सरकार इसके खिलाफ सख्त कानून लाने की बातचीत कर रही है ।

(सांकेतिकचित्र,फाइल फोटो)

बीते कुछ दिनों में लव जिहाद को लेकर अच्छी खासी चर्चा पूरे देश में चल ही रही है , एवं उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों कि सरकार इसके खिलाफ सख्त कानून लाने की बातचीत कर रही है। ऐसे में यह देखना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है कि मौजूदा व्यवस्था में कौन से कानून मौजूद है। अगर अधिकार की बात की जाए तो देश के हर नागरिक को अपनी मर्जी से जीवन साथी चुनने का पूरा परम सिद्ध अधिकार है और कोई धर्म या जाति इसके आगे नहीं आ सकती। इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए कि ‘सिर्फ विवाह के उद्देश्य के लिए धर्मातरण अस्वीकार्य है’, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कहा था कि राज्य सरकार लव जिहाद के खिलाफ एक सख्त कानून लाने के लिए काम कर रहा है।

साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि ‘जबरन धर्मांतरण में शामिल लोगों को ‘राम नाम सत्य’ की यात्रा पर भेजा जाएगा। फिर हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह के उद्देश्य के लिए धर्मातरण वैध नहीं है और इसे अपराध माना जाना चाहिए।


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मौजूदा प्रावधान

देखा जाए तो हमारे देश में शादी को लेकर अलग-अलग धर्मों के प्रावधान मौजूद है। हिंदू मैरिज एक्ट के तहत होने वाली शादी में पहली शर्त यह है कि कपल हिंदू हो और वे शादी की योग्यता रखते हों। स्पेशल मैरिज एक्ट के प्रावधान के मुताबिक लड़का लड़की किसी भी धर्म के हो सकते हैं बस उनकी शादी करने की उम्र होनी चाहिए।
जब मुस्लिम धर्म का कोई लड़का यह लड़की अपने धर्म के तहत ही शादी करना चाहता है और उसका पार्टनर दूसरे धर्म का होता है और उसे इस्लाम धर्म अपनाना पड़ता है यही बात हिंदू धर्म के लिए भी लागू है।

चिंता की बात

कुछ लोगों के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि लड़कियों को प्यार के जाल में फंसा कर उनका धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है और इसे ही वह लव जिहाद का नाम दे रहे हैं। लेकिन यहां समझने वाली बात यह है कि कोई भी लड़का या लड़की केवल शादी के लिए धर्म परिवर्तन नहीं कर सकता।
अगर कोई बालिग है और शादी की योग्यता रखता है तो उसे स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत अपनी मर्जी से या अपनी पसंद से किसी भी धर्म जाति शख्स के साथ शादी करने का अधिकार है।

अब सवाल यह उठता है कि जब पहले से ही संवैधानिक अदालत ने ऐसी व्यवस्था दे रखी है कि केवल शादी करा देने से धर्म परिवर्तन नहीं हो सकता तो फिर इस मुद्दे को लेकर जा रहे नए कानून की कितनी अनिवार्यता है। यहां तक की सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को मान्यता दे रखी है।

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नए कानून की बात

हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सलमान अंसारी बनाम यूपी स्टेट के केस में कहा था की दो व्यक्ति को अपना पार्टनर पसंद करने का अधिकार है और अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वह मानव अधिकार और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। अगर दो अलग-अलग धर्म के लोगों को शादी करनी है तो वह स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत बिना धर्म बदले शादी कर सकते हैं। ऐसे में राज्य सरकारों को लव जिहाद के खिलाफ कानून लाने से पहले तमाम पहलुओं को देखना होगा।

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