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Maha Shivratri 2021: चंद्रधारी महादेव की महाशिवरात्रि !

भगवान शिव(Shva) की आराधना का , महत्वपूर्ण अवसर जिसे ना सिर्फ भारत में बल्कि दुनियां भर के कई अलग - अलग देशों में भी मनाया जाता है।

महाशिवरात्रि(Maha Shivratri 2021) का अर्थ ” शिव(Shiva) की महान रात्रि से होता है। यह फाल्गुन माह, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। हिन्दू धर्म का यह सबसे बड़ा त्योहार भी माना जाता है। भगवान शिव(Shva) की आराधना का , महत्वपूर्ण अवसर जिसे ना सिर्फ भारत में बल्कि दुनियां भर के कई अलग – अलग देशों में भी मनाया जाता है। यह एक ऐसा दिन है , जब प्रकृति और मनुष्य का अद्भुत मिलन होता है। यह महाशिवरात्रि((Maha Shivratri 2021)) का पर्व, रात भर मनाया जाने वाला एक आनंदमय उत्सव है।

शेते तिष्ठति सर्वं जगत्यस्मिन् स: शिव: शम्भु: विकाररहित:। अर्थात :- जिसमें सारा जगत शयन करता है। जो विकार रहित है , वही शिव है।


शिव पुराण के ईशान सहिंता में उल्लेखित है कि , इसी दिन भगवान शिव(Shiva) और माता पार्वती का विवाह हुआ था और यह भी मान्यताएं हैं कि , इसी दिन शिव(Shiva) शक्ति का प्रतीक ज्योतिर्लिंग का प्रादुभव भी हुआ था। इसी दिन भगवान शिव(Shiva) 64 शिवलिंग(Shivlinga) के रूप में संसार में प्रकट हुए थे, लेकिन आज मुख्यत: 12 शिवलिंग की ही पूजा की जाती है।
आइए! आज कुछ प्रमुख ज्योतिर्लिंगों पर प्रकाश डालें और भगवान शिव(Shiva) से जुड़े उनके कुछ मुख्य व प्रसिद्ध स्थलों को जानें।
उत्तर पूर्व से शुरू करते हुए , झारखंड राज्य के देवघर(Deoghar) नामक स्थान पर भगवान शिव(Shiva) का वैधनाथ मंदिर(Vaidyanath Jyotirlinga) सम्पूर्ण विश्व में प्रख्यात है। इसे बाबाधाम व वैधनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता है। देवघर(Deoghar) का अर्थ होता है , जहां अनेकों देवी – देवताओं का वास होता है। इस मंदिर का अपना एक अलग महत्त्व है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से नवां ज्योतिर्लिंग वैधनाथ मंदिर(Vaidyanath Jyotirlinga) को माना जाता है। इस मंदिर की यात्रा अत्यंत कठिन मानी जाती है। पुराणों में इस मंदिर से जुड़ी कथा इस प्रकार है कि , एक बार भगवान शिव(Shiv) , लंकाधिपति के तप से प्रसन्न होकर उनकी इच्छा (कि आप मेरे साथ लंका चलें) को पूरा किया था परन्तु भगवान शिव ने रावण से कहा कि , यदि तुमने इस लिंग को बीच किसी स्थान पर रखा तो में वहीं स्तिथ हो जाऊंगा। लेकिन रावण की शिव भक्ति भी अपार थी। तब भगवान शिव की मदद करने के लिए भगवान विष्णु ने अपनी लीला दिखाई और लिंग वहीं स्तिथ हो गया जिसे आज वैधनाथ मंदिर(Vaidyanath Jyotirlinga) के नाम से जाना जाता है।

(Pixabay)

भारत के मध्य में यानी उज्जैन में भगवान शिव(Shiva) को समर्पित उनका महाकालेश्वर मंदिर(Mahakaleshwar Mandir) स्तिथ है। ऐसा माना जाता है कि , इस मंदिर में भक्तों को दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते हैं। मुख्यत: यह तीन हिस्सों में विभाजित है। जिसके ऊपरी हिस्से में नाग चंद्रेश्वर मन्दिर। मध्य में ओम्कारेश्वर मंदिर एवं सबसे नीचे महाकाल मुख्य ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं।

(आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्। भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तुते’।।)

अर्थात : आकाश में तारक लिंग , पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही सबसे मान्य शिवलिंग है। इस महाकाल मंदिर की अनादि काल से ही उत्पत्ति मानी जाती है। शिव पुराण के अनुसार दृष्ट नामक एक दैत्य से अपने भक्तों को रक्षा करने के लिए भगवान शिव(Shiva) एक दिव्य ज्योति के रूप में उज्जैन में प्रकट हुए थे। यह एक मात्र ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिण मुखी है।

भारत में उत्तर यानी उत्तरांचल के ऋषिकेश में स्तिथ भगवान शिव का नीलकंठ महादेव मंदिर(Neelkhanth Mandir) है। मणि कूट पर्वत के शीर्ष पर स्तिथ भोलेनाथ का यह बहुत पौराणिक मंदिर है। यहां सावन के महीने में बड़ी संख्या में शिव भक्त कावड़ लेकर जलाभिषेक करने यहां आते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हो रहा था, जिसके पश्चात 14 रत्न एवम् हलाहल नामक विष की उत्पत्ति हुई थी। यह विष इतना घातक था, की यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विनाश कर सकता था, तब भगवान शिव(Shiva) ने इस विष को ग्रहण किया था। जिसके बाद ही, भगवान शिव(Shiva) को नीलकंठ के नाम से और उनका यह मंदिर नीलकंठ महादेव मंदिर(Neelkanth Mahadev Mandir) के नाम से जाना गया।

(Pixabay)

भारत के दक्षिण में मायलापुर चेन्नई तमिलनाडु में भगवान शिव का कपालेश्वर मंदिर(Kapaleeshwarar Temple) स्तिथ है। ऐसी मान्यताएं हैं कि यह अत्यंत प्राचीन मंदिर , जो मूल कपालेश्वर मंदिर(Kapaleeshwarar Temple) था। समुद्र की अनंत गहराइयों में समा गया था। बाद में इस मंदिर की खोज हुई थी तब 1250 ईश्वी में इसका पुनः निर्माण किया गया था। पौराणिक ग्रंथों में इस मंदिर से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं लेकिन एक मुख्य कथा यह है कि , माता पार्वती भगवान शिव के मंत्र “ॐ नमः शिवाय” में से “नमः शिवाय” का अर्थ जानना चाहती थी। जब वह तेज़ आवाज़ में भजन कर रहीं थी , तब एक मोर उनके समक्ष नृत्य करने लगा था। ऐसा कहा जाता है कि वह मोर शापित था और माता पार्वती ने उस मोर को श्राप मुक्त किया था और वहीं भगवान शिव(Shiva) के शिवलिंग की स्थापना भी की थी। इसलिए इस मंदिर में शास्त्रीय संगीत व नृत्य का काफी प्रचलन है।
इस प्रकार हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव लय और प्रलय दोनों को ही अपने अधीन किए हुए हैं। अथवा भगवान शिव को अलग – अलग नामों से जाना जाता है, जैसे : बाघम्बर , महादेव , त्रिशुलधारी , महाकाल , नीलकंठ , त्र्यंबकं , अविनाशी शंकर , जटाधारी , शशिशेखर , श्रीकण्ठ , गंगाधर आदि विभिन्न नामों से भी जाना जाता है।

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