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चर्चा

उस समय भी मैं लिखता था और आज भी मैं लिखता हूँ!

'मेरे गीत तुम्हारे नाम' इस गीत को अन्नू रिज़वी ने अपनी कलम से उकेरा है। जिसमें यादें हैं, कुछ इश्क हैं, इसमें गांव की झलक है। उन्ही से जानते हैं किताब के पीछे का एक अनजान किस्सा।

‘मेरे गीत तुम्हारे नाम’ जिनके लेखक हैं अन्नू रिज़वी।

अन्नू रिज़वी ने एक लेखक और गीतकार के रूप में टीवी इंडस्ट्री में अपने जीवन के 25 साल समर्पित किए हैं और इस समय वह ओपी जिंदल यूनिवर्सिटी में स्पोर्ट्स मैनेजर हैं। अन्नू रिज़वी ने कई गीतों की रचना की है, कुछ प्रेम पर, कुछ अतीत पर और कुछ अपने अनुभवों पर आधारित। हाल ही में उन्होंने अपने कुछ गीतों को किताब की शक्ल दी है, जिसका नाम है “मेरे गीत तुम्हारे नाम” जो amazon.in पर भी उपलब्ध है। आइए, अन्नू रिज़वी जी से ही जानते हैं, उनके किताब के पीछे का एक अनजान किस्सा।

“मेरे गीत तुम्हारे नाम” के रचनाकार अन्नू रिज़वी।


शान्तनू: “मेरे गीत तुम्हारे नाम” इस किताब में पाठकों को क्या नया पढ़ने को मिलेगा?

अन्नू रिज़वी: मुझे गीत लिखने का पहले से ही शौक था, मुझमें कभी यह इच्छा नहीं जगी कि मैं किसी कवि सम्मेलन या मुशायरे में जाकर अपने गीत सुनाऊँ। यह एक शौक था और इसी सिलसिले में मैं बॉम्बे(मुंबई) भी गया। फिर मुझे लगा जो गीत मैंने लिखे हैं वह कहीं गुमनामी में खो जाएं और इसी को ध्यान में रखते हुए मैंने इस किताब को प्रकाशित किया। इस किताब में आपको 62 गीत पढ़ने को मिलेंगे, लेकिन कम से कम 50-60 गीत और हैं जिन्हें मैंने किताब में जगह नहीं दी है क्योंकि उनमें मुझे लगा कि कुछ खामियां हैं जिन्हे ठीक करना है। फिर कभी मौका मिला तो उन्हें भी प्रकाशन के लिए भेजने का प्रयास करेंगे। बरहाल, ये गीत मेरी यादें हैं, कुछ इश्क हैं, इसमें हमारा गांव है जो मैं चाहता हूँ कि यह गीत अधिक लोगों तक पहुंचे। यह गीत मैंने समर्पित की है मेरी पत्नी को जो अब हमारे बीच नहीं हैं, क्योंकि वही मेरी प्रेरणा थीं, उन्होंने हमेशा मुझे लिखने के लिए और हर समय कुछ नया लिखने के लिए प्रेरित किया।

यह किताब सबके लिए है, यह किसी विशेष वर्ग या पाठकों को ध्यान में रखकर नहीं प्रकाशित की गई है। इस किताब में कठिन हिंदी के शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है, इसमें कुछ गीत पूर्वी जुबान में भी हैं क्योंकि मैं वहां का रहने वाला हूँ। इसी जुबान में लिखा और उसी को नया रूप देकर सबके सामने रखा है और इस किताब में उर्दू और कठिन हिंदी न हो इसका ध्यान रखा गया ताकि यह किताब सभी वर्ग के लिए पढ़ने योग्य हो। और मैंने कई गीतकारों और कवियों को पढ़ा और सुना, फिर मैं इन गीतों को लिख पाया हूँ।

शान्तनू: “मेरे गीत तुम्हारे नाम” इस अनोखे शीर्षक के पीछे की क्या कहानी है?

अन्नू रिज़वी: “मेरे गीत तुम्हारे नाम” मेरे एक गीत का मुखड़ा है जो कि कुछ इस प्रकार से है कि “कोई तो तुमसा उजियारा, नैनों सा कोई कजरारा। तुमसे प्रीत लगाकर देखो तुम राधा तो ये हैं श्याम, मेरे गीत तुम्हारे नाम।।” यहाँ से मैंने यह मुखड़ा उठाया और इसे मैंने सम्बोधित किया अपनी पत्नी को, और क्योंकि उन्हें ही यह किताब समर्पित की गई है।

दिल्ली के ही इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में इस किताब का मैं बड़े स्तर पर प्रमोशन कराना चाह रहा था, किन्तु कोरोना महामारी की वजह से वह हो नहीं पाया।

शान्तनू: पत्रकार, फिर गीतकार और अब यह किताब तो आपका यह पूरा सफर कैसा रहा?

अन्नू रिज़वी: जब पत्रकार था तब भी गीतकार था, उस समय भी गीतों को कहता था और लिखता था। और जब टीवी इंडस्ट्री में आया तब तो मेरा काम ही था लिखना और अभी भी लिख रहा हूँ। तो इस पूरे सफर को देखा जाए तो अच्छा सफर तय किया है। हाँ! कुछ काम ऐसे थे जिन्हे अधूरा छोड़ना पड़ा, लेकिन कुल मिलाकर यह सफर अच्छा रहा।

एक और बात कि मैं अब फिल्मों में नहीं जाना चाहता, हालांकि एक ओटीटी पर आई फिल्म के लिए गीत लिखा है जिसे बॉलीवुड गायक शान ने स्वर दिया है और उस गीत को बहुत लोगों ने सराहा भी है। इस तरह से फिल्मों से जुड़ा हुआ हूँ लेकिन अब वापस बॉम्बे(मुंबई) जाकर उस काम को करना वह मुझसे नहीं हो पाएगा।

यह भी पढ़ें: मैं आज भी पैसों के लिए नहीं लिखता : अन्नू रिज़वी

शान्तनू: आपके पास किताबों का और गीतों का एक अच्छा अनुभव है, सवाल यह है कि, आज के नए रचनाकारों को क्या आप सही दिशा में चलता हुआ देख रहे हैं?

अन्नू रिज़वी: आज नए रचनाकार भी हर तरह की शैली में लिख रहे हैं और अच्छा लिख रहे हैं। आज-कल के हालात जो चल रहे हैं उन पर भी बड़े अच्छे-अच्छे गीत लिखे गए हैं। शायरी और गीतों में समय-समय पर बदलाव आता रहा है। कुछ नव-युवक वास्तव में अच्छा लिख रहे हैं, कुछ शौखिया और बिना पढ़े लिख रहे हैं तो उनको बड़े कवियों और रचनाओं को पढ़ने की जरूरत है।

लेकिन कविताओं में बेहूदगी जो यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया पर नए तथाकथित कवियों द्वारा देखने को मिलती है वह सोशल मीडिया की ही देन है। केवल अपने-आप को मशहूर करने के लिए वह इस बेहूदगी का सहारा लेते हैं। लेकिन इस झूठी वाह-वाही पर कितने दिन टिक पाएंगे यह उनको नहीं पता है। एक बात और है कि अच्छी शायरी और कविताओं पर उतने लाइक भी नहीं मिल रहे हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर कविताएं सुनने वाले भी ऐसे ही हो गए हैं।

अंत में:

यह किताब कई किस्सों, कई यादों को गीतों के रूप सजोए हुए है, जिसे हर कोई अपने अतीत से जोड़ सकता है। गीत कभी पुराने या नए नहीं होते, बस पढ़ने वालों का नजरिया बदलता रहता है।

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