भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा का इतिहास और महत्व

भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का प्रमुख वास्तुकार माना जाता हैं।ऋग्वेद के अनुसार विश्वकर्मा का अर्थ "सृष्टि की रचना और निर्माता ईश्वर का अमूर्त रूप " है।
भगवान विश्वकर्मा को दुनिया के निर्माता और निपुण वास्तुकार के रूप में जाना जाता है ।
भगवान विश्वकर्मा को दुनिया के निर्माता और निपुण वास्तुकार के रूप में जाना जाता है ।Wikimedia

भारत में विभिन्न धर्मों के विभिन्न त्योहार मनाए जाते हैं जिनमें से एक है भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा । इस पर्व को विश्व में विश्वकर्मा जयंती के रूप में भी जाना जाता है। भगवान विश्वकर्मा को दुनिया के निर्माता और निपुण वास्तुकार के रूप में जाना जाता है । इस पर्व को विशेष रूप से भगवान विश्वकर्मा के लिए ही मनाया जाता है । ऐसी मान्यता है कि उन्होंने देवताओं के लिए कई यंत्र बनाए थे । द्वारका शहर का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही किया गया था । यही कारण है कि ऋग्वेद में उन्हें एक दिव्य बढ़ई के रूप में वर्णित किया गया है । तो चलिए आज हम इन्हीं भगवान विश्वकर्मा के विषय में समस्त जानकारी जानते हैं।

विश्वकर्मा के नाम का अर्थ

भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का प्रमुख वास्तुकार माना जाता हैं। ऋग्वेद के अनुसार विश्वकर्मा का अर्थ "सृष्टि की रचना और निर्माता ईश्वर का अमूर्त रूप" है। भगवान विश्वकर्मा सभी इंजीनियरों, पुजारियों , कारीगरों , वास्तुकारों और विश्वकर्मा (जाति) के पीठासीन देवता है।

आमतौर पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा बिहार , उत्तर प्रदेश , झारखंड , असम , पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में सितंबर या अक्टूबर के माह में की जाती है । इस साल भी 17 सितंबर 2022 को भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाएगी । इस दिन सभी लोग मिलकर विकास ,बेहतर भविष्य और सुरक्षित परिस्थितियों के लिए भगवान विश्वकर्मा जी से प्रार्थना करते हैं।

इस दिन को इंजीनियर , कारीगर , शिल्पकार , वेल्डर , औद्योगिक श्रमिक , कारखानों के श्रमिक और सभी लोग धूमधाम से मनाते हैं।

क्या है विश्वकर्मा पूजा का महत्व?

विश्वकर्मा पूजा का दिन हमें यह सिखाता है कि हमें अपनी रोजी-रोटी उपकरणों औजारों का सम्मान करना चाहिए । क्योंकि यही है जिनसे हम अपना जीवन यापन करते हैं । भगवान विश्वकर्मा को कारीगरों के मॉडल की उपाधि दी गई है । भगवान विश्वकर्मा की पूजा मानव और उनके उपकरणों के बीच एक कभी न टूटने वाला संबंध दर्शाती है। इस पूजा के पश्चात पतंगे भी उड़ाई जाती हैं और लोगों में प्रसाद वितरण भी होता है । भगवान विश्वकर्मा जी से सफलता का वरदान मांगते हुए उनके खूब जयकारे लगाए जाते हैं।

इस पूजा का इतिहास

हिंदी पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान विश्वकर्मा ने ही इस ब्रह्मांड का निर्माण किया है । और उन्होंने ही सभी देवताओं के हथियारों का भी निर्माण किया है जिसमें इंद्र का वज्र भी शामिल है। इस विशेष दिवस पर सभी कारखानों , फैक्ट्री आदि के भीतर पंडाल लगाया जाता है । और उसमें भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या छवि स्थापित कर, उसकी पूजा की जाती है । यह पूजा प्राचीन काल से होती आ रही है भगवान विश्वकर्मा को इंजीनियर , वास्तुकार , शिल्पकार , औद्योगिक , श्रमिक सभी अपने गुरु के रूप में पूजते हैं । भगवान विश्वकर्मा को मजदूर , इंजीनियर आदि अपना आराध्य मानते हैं।

हिंदू धर्म के अनुसार भगवान विश्वकर्मा देवशिल्पी है। उनके परिवार में माता, बहन और पिता शामिल थे । उनकी माता को "योगसिद्ध" के रूप में जाना जाता है और उनकी बहन को "बृहस्पति" उनके पिता को "प्रभास" कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि विश्वकर्मा ने ही इस ब्रह्मांड की रचना की, उन्होंने ही पृथ्वी और स्वर्ग की रचना की । यही सब कारण है कि उन्हें एक अच्छा कार्यकर्ता और गुणवत्ता का प्रतीक माना जाता है । द्वारका , लंका , हस्तिनापुर , इंद्रप्रस्थ जैसे कई विशाल शहरों का निर्माण भी विश्वकर्मा द्वारा ही किया गया । ऐसा कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा के चार हाथ थे जिसमें एक में वे अपने साथ किताब, दूसरे में पानी, तीसरे में फंदा और चौथे में उपकरण रखते थे।

(PT)

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