हथकड़ी बनी गहना...जेल से चुनाव लड़ सत्ता के गलियारे तक पहुँचने वाले 11 नेताओं की कहानी

संसद द्वारा बनाया गया एक कानून है, जिसने जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 (RPA Act) कहते हैं। जेल से चुनाव लड़ने की अनुमति या रोक से जुड़े सारे नियम इसी RPA कानून में लिखे हैं।
जेल की तस्वीर के साथ हथकड़ी लगाए हुआ व्यक्ति, साथ ही लोकसभा की तस्वीर
जेल से चुनाव लड़ने वाले 11 नेताओं की कहानी Wikimedia
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Summary

  • जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के तहत जेल में बंद व्यक्ति दोषी न होने तक चुनाव लड़ सकता है।

  • भारतीय राजनीति में कई नेताओं ने जेल से चुनाव लड़कर लोकसभा या विधानसभा तक का सफर तय किया।

  • जेल की दीवारें राजनीतिक रास्ता नहीं रोक पाईं, जनता का समर्थन सत्ता तक ले गया।

जेल एक ऐसी जगह जहाँ कोई चला जाए, तो समाज में उसकी छवि पूरी तरह से धूमिल हो जाती है। अगर वो अपनी सजा काटकर वापस भी आ जाए, तो गली-मोहल्ले में अपनी इज्जत वापस पाने में वर्षो लग जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति जेल जाता है, तो वो सामाजिक जीवन से पूरी तरह कट जाता है लेकिन एक अधिकार जो जेल में हर व्यक्ति को मिलती है, वो है चुनाव लड़ने का अधिकार। संसद द्वारा बनाया गया एक कानून है, जिसने जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 (RPA Act) कहते हैं। जेल से चुनाव लड़ने की अनुमति या रोक से जुड़े सारे नियम इसी RPA कानून में लिखे हैं।

इस कानून के तहत भारत का संसद एक व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वो आम चुनाव में जनता का प्रतिनिधित्व कर सके। ऐसे में आज हम आपके सामने ऐसे ही 11 नेताओं की कहानी सामने ला रहे हैं, जिन्होंने जेल से चुनाव लड़ा और अंततः सत्ता के गलियारों तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

जेल से चुनाव लड़ने वाले नेता

भारतीय राजनीति के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं, जहाँ नेताओं ने जेल के भीतर से भी चुनाव लड़ा है। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 (RPA Act 1951) के तहत किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया गया है। उनके पास ये अधिकार है कि वो जनता का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। ऐसे में आइये उन 11 नेताओं के नाम जानते हैं।

जॉर्ज फर्नांडीस

आपातकाल के दौरान जॉर्ज फर्नांडीस (George Fernandes) को 'बड़ौदा डायनामाइट कांड' (Baroda Dynamite Case) के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उनपर आरोप था कि उन्होंने डायनामाइट के जरिए रेलवे पटरियों और सरकारी इमारतों को उड़ाने की साजिश रची थी। उन्होंने 1977 के लोकसभा चुनाव में बिहार की मुजफ्फरपुर सीट से जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा था लेकिन वो अपने चुनाव क्षेत्र में प्रचार के लिए नहीं जा सके क्योंकि उन्हें जेल से बाहर आने की अनुमति नहीं थी।

बताया जाता है कि उनके समर्थकों ने बेड़ियों में जकड़ी उनकी तस्वीर के जरिये चुनाव प्रचार किया था। फर्नांडीस ने जनता पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ा और कांग्रेस के प्रत्याशी नीतीश्वर प्रसाद सिंह (Nitishwar Prasad Singh) को 3 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराया।

आज़म खान

साल 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान (Azam Khan) ने जेल से चुनाव लड़ा था। उन्होंने सीतापुर जेल में रहते हुए रामपुर सीट से चुनाव लड़ा और जीत भी दर्ज की। खान पर जौहर यूनिवर्सिटी के लिए किसानों की जमीन कब्जाने (Land Grabbing), धोखाधड़ी, और बेटे के फर्जी जन्म प्रमाण पत्र (Forgery) बनवाने सहित करीब 87 आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। यही वजह रही कि उन्हें जेल जाना पड़ा था।

बता दें कि मार्च 2022 में यूपी विधानसभा के नतीजे आए थे, जहां उन्होंने बीजेपी के आकाश सक्सेना को 55,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराया। हालांकि, बाद में हेट स्पीच मामले में सजा होने के चलते उनकी विधायकी रद्द कर दी गई।

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अमृतपाल सिंह

23 अप्रैल 2023 को पंजाब पुलिस ने 'वारिस पंजाब दे' (waris punjab de) संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह (Amritpal Singh) को इसलिए गिरफ्तार किया था क्योंकि उसपर अजनाला पुलिस थाने पर समर्थकों के साथ हथियारों सहित हमला करने, पुलिसकर्मियों को घायल करने और समाज में खालिस्तान समर्थक नारे लगाने का आरोप था। यही कारण रहा कि उनपर NSA लगाकर असम के डिब्रूगढ़ जेल भेज दिया गया।

जेल में रहते हुए अमृतपाल ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा का चुनाव लड़ा। जब 4 जून 2024 को नतीजे आए, तो पता चला कि उसने कांग्रेस उम्मीदवार कुलबीर सिंह जीरा (Kulbir Singh Zira) को 1,97,120 वोटों के विशाल अंतर से हराया है और खडूर साहिब सीट से सांसद बना है।

इंजीनियर राशिद

9 अगस्त 2019 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने टेरर फंडिंग (Terror Funding) के मामले में इंजीनियर राशिद (Sheikh Abdul Rashid) को गिरफ्तार किया था। राशिद पर ये आरोप है कि उसने कश्मीरी व्यवसायी जहूर वताली के साथ मिलकर अलगाववादी गतिविधियों और घाटी में अशांति फैलाने के लिए फंडिंग की थी।

फिलहाल राशिद तिहाड़ में बंद है और उसके ऊपर UAPA के तहत मामला दर्ज है। वहीं, जेल में रहते हुए उसने 2024 के लोकसभा चुनाव में बारामूला सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा। जब नतीजे आए, तो पता चला कि उसने उमर अब्दुल्ला को 2.04 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराया है।

मुख्तार अंसारी

साल 2005 से ही बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी (Mukhtar Ansari) जेल में बंद था। उसपर 2005 में बीजेपी के विधायक कृष्णानंद राय की हत्या, अपहरण, मऊ दंगे और गैंगस्टर एक्ट सहित 50 से अधिक गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। अंसारी को बांदा जेल में रखा गया था। जेल के भीतर से ही उसने 2017 का विधानसभा चुनाव बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट से मऊ सदर सीट से लड़ा।

जब 11 मार्च 2017 को चुनाव के नतीजे घोषित हुए, तो उसमे मुख्तार अंसारी को जीत हासिल हुई। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP-भाजपा गठबंधन) के उम्मीदवार महेंद्र राजभर (Mahendra Rajbhar) को 8,698 वोटों के अंतर से हराकर अंसारी ने लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की थी। बता दें कि मुख्तार अंसारी की मृत्यु 28 मार्च 2024 को हुई थी।

अतीक अहमद

माफिया नेता के नाम से मशहूर अतीक अहमद (Atiq Ahmed) पर साल 1989 में चांद बाबा हत्याकांड, अपहरण, फिरौती और जमीनों पर अवैध कब्जे के 100 से अधिक मुकदमे दर्ज थे। अतीक पर गैंगस्टर एक्ट (Gangster Act) के तहत कार्यवाई हुई थी, जिसके चलते वो लगातार जेल से अंदर-बाहर आता जाता रहा था।

साल 2002 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव उसने 'अपना दल' (Apna Dal) के टिकट पर इलाहाबाद पश्चिम सीट से लड़ा। फरवरी 2002 में जब नतीजे आए, तब दिखा कि अतीक ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार गोपाल दास यादव (Gopal Das Yadav) को हराकर अपनी सीट बचाई थी। बता दें कि अतीक अहमद की हत्या 15 अप्रैल 2023 को हुई थी। उस रात प्रयागराज में पुलिस हिरासत के दौरान मेडिकल जांच के लिए जाते समय अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की मीडिया के कैमरों के सामने हत्या कर दी गई। पत्रकार के भेष में आए तीन हमलावरों (लवलेश, सन्नी और अरुण) ने बेहद करीब से ताबड़तोड़ गोलियां बरसाकर इस वारदात को अंजाम दिया।

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मोहम्मद शहाबुद्दीन

कभी बिहार के सिवान में शहाबुद्दीन (Mohammad Shahabuddin) का खौफ चलता था क्योंकि उस व्यक्ति के ऊपर हत्या, अपहरण और अवैध हथियार रखने के दर्जनों मामले दर्ज थे। वो विशेष रूप से 1997 में जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष (JNU Student Union President) चंद्रशेखर की हत्या और 2001 में पुलिस के साथ मुठभेड़, प्रतापपुर गोलीकांड जैसे गंभीर मामलों के कारण लगातार कानून के शिकंजे में था।

जेल रहते हुए उसने 2004 का लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के टिकट पर सीवान सीट से लड़ा। मई 2004 में जब नतीजे आए तब पता चला कि उसने जनता दल (यूनाइटेड) के प्रत्याशी ओम प्रकाश यादव (Om Prakash Yadav) को लगभग 1 लाख वोटों के अंतर से हराकर जीत हासिल की थी। बता दें कि 1 मई 2021 को कोरोना के कारण शहाबुद्दीन की मृत्यु हुई थी।

रघुराज प्रताप सिंह

साल 2002 में रघुराज प्रताप सिंह उर्फ 'राजा भैया' (Raja Bhaiya) को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने पोटा (POTA) कानून के तहत जेल भिजवाया था। राजा पर मुख्यमंत्री की हत्या की साजिश रचने और उसके भदरी रियासत के तालाब से AK-56 राइफल व कंकाल बरामद होने के गंभीर आरोप लगाए गए थे।

'राजा भैया' (Raja Bhaiya) ने 2002 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रतापगढ़ की कुंडा सीट से जेल में रहते हुए ही निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा था। जेल में होने के बावजूद उसने कुंडा सीट से भारी मतों से जीत दर्ज की। राजा लगभग 11 महीने तक जेल में रहे थे और 2003 में मुलायम सिंह यादव की सरकार आने के बाद उन्हें रिहा किया गया था। चुनाव में उसने मुख्य प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी (SP) के मोहम्मद सामी (Mohammad Sami) को 82% वोटों के भारी अंतर से हराया था।

अखिल गोगोई

दिसंबर 2019 में आरटीआई कार्यकर्ता (RTI activist) और किसान नेता अखिल गोगोई (Akhil Gogoi) को इसलिए गिरफ्तार किया गया था क्योंकि उसने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया था। गोगोई के खिलाफ राजद्रोह (Sedition) और UAPA (आतंकवाद विरोधी कानून) के तहत मामले दर्ज किए गए थे। साथ ही एनआईए (NIA) ने उसपर माओवादी (Maoists) लिंक होने का भी आरोप लगाया था।

जेल में रहते हुए अखिल गोगोई (Akhil Gogoi) ने अपनी नई पार्टी 'राइजोर दल' (Raijor Dal) से सिबसागर (Sivasagar) सीट से चुनाव लड़ा और मई 2021 में भाजपा की उम्मीदवार सुरभि राजकोंवर (Surabhi Rajkonwar) को 11,875 वोटों के अंतर से हराया। गोगोई असम का पहला ऐसा व्यक्ति था, जो जेल से चुनाव जीतकर विधायक बना।

धनंजय सिंह

धनंजय सिंह (Dhananjay Singh) का नाम बाहुबली नेताओं में गिने गिना जाता है। 90 के दशक से वो लखनऊ यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति और गैंगवार के चलते चर्चा में थे। धनंजय पर 2002 के चुनाव के समय हत्या, सरकारी टेंडर में रंगदारी और गैंगस्टर एक्ट (Gangster Act) सहित कई आपराधिक मुकदमे दर्ज थे, जिसके चलते उन्हें जौनपुर जेल में रखा गया था।

जेल में रहते हुए धनंजय ने रारी (Rari) विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा और 2002 में जब चुनाव के नतीजे आए, तब पता चला कि उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार श्रीराम यादव (Sriram Yadav) को हराकर जीत हासिल की। उनकी यह जीत इसलिए चर्चित रही क्योंकि उन्होंने जेल के अंदर से ही बिना प्रचार के चुनाव जीता था।

अनंत सिंह

बिहार में छोटे सरकार के नाम से मशहूर बाहुबली अनंत सिंह (Anant Singh) ने 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव पटना की बेउर जेल में रहते हुए आरजेडी (RJD) के टिकट पर लड़ा था। बाहुबली नेता को अगस्त 2019 में अपने पैतृक घर पर AK-47 राइफल और हैंड ग्रेनेड रखने के बाद UAPA और आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था।

जेल में बंद होने के बावजूद अनंत सिंह चुनाव लड़े और 10 नवंबर 2020 को जब नतीजे आए, तो बाहुबली नेता को 35,757 वोट मिले। बिहार के छोटे सरकार के सामने जेडीयू (JD-U) के उम्मीदवार राजीव लोचन नारायण सिंह थे, जो हार गए। इसके साथ ही 2025 के विधानसभा चुनाव में वो जेडीयू (JD-U) के टिकट से मोकामा सीट से चुनाव लड़े और इस दौरान भी वो जेल से ही चुनाव लड़े थे। उनपर जनसुराज के कार्यकर्ता दुलारचंद यादव के हत्या का आरोप था। ये घटना 30 अक्टूबर 2025 को मोकामा विधानसभा क्षेत्र के घोसवरी थाना क्षेत्र के टाल इलाके (तरतर गांव के पास) में हुई थी।

जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत कौन लड़ सकता है चुनाव?

बता दें कि जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 (RPA Act) के तहत ऐसा नहीं है कि कोई भी चुनाव लड़ सकता है। इस कानून के अनुसार जेल से वही व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है, जिसका मामला कोर्ट में चल रहा हो (Undertrial) और उसे दोषी करार न दिया गया हो। आरोप चाहे कितने भी गंभीर या संगीन (जैसे हत्या, आतंकवाद या देशद्रोह) क्यों न हों, जब तक दोष सिद्ध नहीं होता, चुनाव लड़ने पर कोई रोक नहीं है। केवल वही कैदी चुनाव लड़ने के अयोग्य माने जाते हैं जिन्हें अदालत ने दोषी ठहराते हुए 2 साल या उससे अधिक की सजा सुनाई हो।

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