

Summary
पुलिस द्वारा ही यौन हिंसा और सत्ता के दुरुपयोग के गंभीर आरोप
FIR में देरी, विवादित फैसले और लंबी कानूनी लड़ाई
बार-बार सामने आते मामले, लेकिन जवाबदेही और सुधार की कमी
आज़ाद भारत में जब कानून व्यवस्था की नींव रखी गई, तो इसका मुख्य उद्देश्य था कि समाज के आम लोगों की सुरक्षा पुलिस करेगी। पुलिस को एक रक्षक का दर्जा दिया गया था लेकिन किसने सोचा होगा कि एक दिन ऐसा आएगा, जब रक्षक ही भक्षक बन जाएगा। जी हाँ, ऐसा हुआ है। यूपी के कानपुर (Kanpur) से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने कानून व्यवस्था की नींव हिलाकर रख दी है।
खबर है कि कानपूर (Kanpur) के सचेंडी के एक गांव की निवासी 14 वर्षीय किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म हुआ है, जिसमें दरोगा अमित मौर्या का नाम सामने आया है। फिलहाल सब- इंस्पेक्टर फरार है लेकिन पुलिस ने इस मामले में एक पत्रकार शिवचरण यादव को गिरफ्तार किया है। साथ ही सचेंडी थाना प्रभारी (SHO) विक्रम सिंह और चौकी इंचार्ज दिनेश कुमार को निलंबित कर दिया गया है क्योंकि इन्होने देर से FIR दर्ज किया था। वहीं, पुलिस ने उस स्कॉर्पियों को भी सीज कर लिया है, जिसमें इस घटना को अंजाम दिया गया था। जल्द ही पीड़िता का मेडिकल कराया जाएगा।
हालांकि, अब ये सवाल उठता है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएंगे, तो आम जनता का क्या होगा? ये पहला ऐसा मौका नहीं है जब खाकी शर्मसार हुई हो। इतिहास में 4 ऐसे मामले सामने आए हैं, जिसने पुलिस को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। आइये जानते हैं, उन मामलों के बारे में।
ये घटना आज से 50 साल पहले की है, जिसने खाकी को शर्मसार करने के साथ देश की अदालत को भी कटघरे में खड़ा कर दिया था। महाराष्ट्र की मथुरा नाम की आदिवासी महिला को 26 मार्च, 1972 को पुलिस ने थाने में पूछताछ के लिए बुलाया था। भाई ने रिपोर्ट लिखवाई थी कि उसका अशोक नाम के लड़के के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा है और वो उसके साथ भाग गई है। पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया और पूछताछ शुरू की।
जब रात होने लगी, तो पुलिस ने अशोक और मथुरा के भाई को जाने के लिए कह दिया लेकिन महिला को थाने में रोक लिया। बताया जाता है कि जब दोनों चले गए तो रात में बत्ती बुझाकर दो पुलिसकर्मियों (तुकाराम और गणपत) ने उसके साथ बलात्कार किया।
जब ये मामला सामने आया, तो निचली अदालत ने दोनों पुलिसकर्मियों को दोषी माना। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक को बरी कर दिया जबकि सुप्रीम कोर्ट ने दोनों की दोषीसिद्धि को ही पलट दिया और यह दलील दी कि महिला ने शोर नहीं मचाया, उसके शरीर पर कोई जख्म के निशान नहीं थे, तो ऐसे में उसकी इसमें सहमति थी।
कोर्ट के इस फैसले के बाद पूरे देश में आक्रोश का माहौल पैदा हुआ था। आज मथुरा की उम्र 70 साल से ऊपर है और वो नागपुर से 150 किमी दूर एक गांव में रहती हैं। उनके दो बच्चे हैं, एक बेरोजगार है और एक मजदूर। दोनों में से कोई उनकी देखभाल करने नहीं आता है और दोनों अलग ही रहते हैं।
नवंबर 2025 में मीडिया रिपोर्ट्स में उनकी खबर छपी थी जहाँ वो उस हादसे को याद करते हुए कह रही थीं कि अब क्या किया जा सकता है? सब खत्म हो गया। आज आलम ये है कि मथुरा के पास ढंग से खाने पीने के लिए भी कुछ नहीं है।
यह मामला यूपी के बागपत का है जो 18 जून 1980 को घटित हुई थी। पीड़ित माया त्यागी अपने पति और दी दोस्तों के साथ एक शादी में जा रही थी लेकिन रास्ते में उनकी कार ख़राब हो गई। वो सभी बागपत के पास चौराहे पर रुके थे। इसके बाद वहां कुछ पुलिसकर्मी सफ़ेद कपड़ों में आते हैं और माया त्यागी के साथ छेड़खानी करते हैं।
जब विरोध हुआ, तो विवाद ज्यादा बढ़ गया और पुलिस गोली चलाने लगी। मौके पर ही माया त्यागी के पति और उनके दो दोस्तों की मौत हो गई। आरोपी पुलिस का नाम नरेंद्र सिंह था।
अपना दोष छिपाने के लिए पुलिस ने माया त्यागी के पति और उनके दो दोस्तों डकैत बता दिया और फिर माया को घसीटते हुए थाने ले गए, उनके कपड़े फाड़ दिए और उन्हें नग्न अवस्था में पूरे बागपत बाजार में घुमाया। आरोप था कि थाने में उनके साथ सामूहिक बलात्कार (Gangrape) भी किया गया, जिसमे 9 पुलिसकर्मी शामिल थे।
1988 में बुलन्दशहर की एक अदालत ने 6 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा और अन्यों को उम्रकैद सुनाई। 44 साल पुरानी घटना में अधिकांश दोषी पुलिसकर्मी अपनी सजा काट चुके हैं। वहीं, मुख्य आरोपी नरेंद्र सिंह की मौत हो चुकी है।
यह घटना मार्च 1984 की है जहाँ सुमन रानी नाम की एक युवती के साथ हरियाणा के भिवानी जिले के सीवानी पुलिस स्टेशन में दो पुलिसकर्मियों, प्रेम चंद और निहाल सिंह ने हिरासत में बलात्कार किया था। मार्च 1984 में सुमन अपने बॉयफ्रेंड रवि शंकर के साथ घर से भाग गई थी। इसके बाद उसके परिवार ने अपहरण का मामला दर्ज कराया।
जब वो भागी थी, तब वो नाबालिग थी। 31 मई 1984 को पुलिस ने सुमन रानी और रवि शंकर को भिवानी बस स्टैंड से गिरफ्तार किया, जब वे जम्मू जा रहे थे। दोनों को पत्रम गेट पुलिस चौकी में अलग-अलग कमरों में रखा गया। इसी दौरान सुमन रानी के साथ दो पुलिसकर्मियों ने बलात्कार किया, जिनमें से एक का नाम प्रेमचंद था।
वहीं, रवि शंकर पर IPC की धारा 366 (अपहरण और बलात्कार) के तहत मामला दर्ज किया हुआ। भिवानी खेड़ा की सेशंस कोर्ट में रवि शंकर और दोनों पुलिसकर्मियों का एक साथ ट्रायल किया और तीनों को बलात्कार का दोषी ठहराया गया। पुलिसकर्मियों को कम से कम 10 साल की सजा सुनाई गई।
सेशंस कोर्ट के जज ने यह दलील साफ़ तौर पर खारिज कर दी कि सुमन रानी “पहले से यौन संबंधों की आदी थी”, इसलिए उसके साथ रेप नहीं हुआ। बाद में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से पलट दिया। रवि शंकर को यह कहकर बरी कर दिया गया कि सुमन रानी की उम्र 18 साल से कम साबित नहीं हो पाई और उसने रवि शंकर के साथ अपनी मर्जी से संबंध बनाए थे लेकिन पुलिसकर्मियों की सजा बरकरार रही।
वहीं, मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात से इंकार नहीं किया कि सुमन रानी के साथ पुलिस हिरासत में बलात्कार हुआ था, लेकिन जजों ने न्यूनतम सजा देने से मना कर दिया।
यह घटना अप्रैल 2015 की है। एक 29 साल की मॉडल अपने दोस्त के साथ साकीनाका इलाके के एक होटल गई थी। वहां पुलिसकर्मियों ने छापा मारा और मॉडल को डराया-धमकाया कि वे उसे ड्रग्स और वेश्यावृत्ति के झूठे मामले में फंसा देंगे। इसके बाद उसे जबरदस्ती थाने ले गए और केबिन के भीतर उसका साथ यौन शोषण और बलात्कार किया। साथ ही पुलिस वालों ने उसके दोस्त से करीब 5 लाख रुपये की वसूली भी की।
शर्मसार कर देने वाले घटना में तीन पुलिसकर्मियों का नाम सामने आया था। इसमें सुनील खतपे, सुरेश सुर्यवंशी और योगेश पोंडे शामिल थे। साथ ही 8 पुलिसवालों पर भी आरोप लगे थे। घटना जब सामने आई, तो मुंबई पुलिस ने इन सभी को बर्खास्त किया। मामला जब कोर्ट में गया तब जाकर आरोपियों को जेल भेजा गया।
वहीं, बचाव पक्ष के वकील ने एक शर्मनाक दलील दी थी, जो काफी चर्चित हुई थी। बचाव पक्ष के वकील ने कहा था कि मॉडल के साथ आधा ही रेप हुआ है, तो सजा भी आधी ही मिलनी चाहिए। हालांकि, यह मामला लंबे समय तक कानूनी प्रक्रियाओं में उलझा रहा। फिलहाल, आरोपी बेल पर हैं लेकिन समाज से बहिष्कृत जीवन जी रहे हैं।