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ओपिनियन

मेरा मानसिक स्वास्थ्य, हाय तौबा ज़िंदाबाद !

हर साल 10 अक्टूबर को दुनिया भर में मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। पर मेरे इस लेख का मक़सद आंकड़े पेश करना नहीं, सवाल खड़ा करना है। क्योंकि जवाब की खोज में तो मैं खुद हूँ।

कोरोनाकाल में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। (Pixabay)

ना फिक्रे-मआश (आजीविका की चिंता) थी, ना इश्क़ के शरारे! दिल लगी का मसअला ज़रूर था। मगर इतना निजी ना हो कर चलिए कुछ देर के लिए आप और मैं हमराह हो जाते हैं। ताकि मैं अपनी कहानी आप पाठकों को बता सकूँ। और फिर आप इन बेतुकी, ईमानदार बातों में अपने मतलब का कुछ ढूंढ लें।   

पर उससे पहले हालात की बेताबियाँ देखें। अपनी माशूक़ से क़यामत की रोज़ मिलने के वादे तो कई लोगों ने किए, मगर आज जब हक़ीक़त में क़यामत बरसी तो मिलना छोड़िये, बात करने तक के लाले पड़ गए। खैर, मुद्दा वस्ल (मिलन) और विछोह का नहीं। उससे कहीं बड़ा और मार्मिक है। 


आशिक़ों को यह पैगाम चला जाना चाहिए कि जिस समाज में लोगों की मौत तमाशा बन रही हो, वहां एक दुसरे के लिए मर मिटने वालों की क्या ही क़दर होगी। 

बहरहाल, मैं अपनी कहानी पर आता हूँ। सितम्बर का पहला हफ्ता रहा होगा जब मेरे अंदर का शोर पिघल कर पंक्तियों में ढला। क्योंकि मार्च में मुलाक़ात हुई, जून जुलाई तक बदहज़मी और उभरते उभरते सितम्बर आ गया। अब उन्हीं पंक्तियों के रास्ते से मैं अक्टूबर के महीने में, अपनी बात रखना चाहूंगा – 

इन दिनों बहुत संभाला खुद को , जैसे कोई भीतर नारी हो 

वट के अंकुर समतल पर रख , मैंने खुद को बांग दिया ।

मल मन से जीता हूँ खुद को , जैसे कोई मीरा प्यारी हो 

तट से दिनकर को लाकर , मैं महावीर बन निगल गया

आख़िर यह कविता क्यों? क्योंकि यह ग़ुरूर सिर्फ मेरा नहीं! उन सभी लोगों का है जो उस बदहज़मी से उभर पाए। कोरोना अंकल के आने से मैं भी बाकियों की तरह हाय तौबा में था। दिन रात की कोई खबर ना थी। सुबह आँखें बंद होतीं, रात से नींद गायब।

घर का भार तो माँ बाप के कन्धों पर है। मुझे तो बस कमरे की चार दीवारी में, एसी की ठंडी हवा का लुत्फ़ उठाना था। मगर यह भी सर दर्द बन गया। मन अशांत रहने लगा। कमरे की नीली दीवारों से निकल रही पपड़ी को भला कब तक देखता।

मैं परेशान रहने लगा, आए दिन घर में झगड़े होने लगे, पर…मेरे किसी ख़ास ने मेरी परेशानी को सुना, उसे समझा। उस हितैषी का मेरे पास होना ठीक वैसा रहा जैसे किसी बैरागी का ध्यान मग्न होना। शायद हम सभी उसी हितैषी की खोज में हैं।  

यह भी पढ़ें – भगत सिंह के बसंती चोले की वेदना को समझने की कोशिश

मेरा वाकिया तो मामूली सा है, पर ना जाने कितनों पर क्या क्या गुज़री होगी। बंद दरवाज़े के पीछे घुट रही मौन आवाज़ को भला कौन सुनता है? खुद से लड़ रहे लोगों की जंग को कौन देखता है?

बीते महीनों में ऐसे कितने ही सवाल पंखे से लटक गए, कितने सवाल बिल्डिंग से कूद गए, और कुछ सवालों के जवाबों में, सराबों (मृगतृष्णा) पर भटके लोग बदनाम भी हो गए। 

इससे यह बात तो साफ़ हो गई कि, मुनासिब बात को ना तो गोल्डन माइक की ज़रूरत है और ना ही चीखने की। 

बाकि मानसिक स्वास्थ्य, मन की पीड़ा की बातें अभी तो बाज़ार में गर्म हुई हैं। जानकारियां आप गूगल कर ही सकते हैं। मेरे इस लेख का मक़सद वो आंकड़े पेश करना नहीं था, बल्कि यह सवाल पूछना है कि क्या आप भी किसी के हितैषी हैं?

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