

अम्बरनाथ नगर निगम में भाजपा-कांग्रेस-एनसीपी का पोस्ट-पोल गठबंधन विचारधाराओं से ज़्यादा सत्ता की मजबूरी को उजागर करता है।
शिवसेना (शिंदे गुट) ने इस गठबंधन को जनता के साथ धोखा बताते हुए भाजपा पर दोहरे चरित्र का आरोप लगाया है।
एआईएमआईएम (AIMIM) गठबंधन में शामिल न होते हुए भी वोट विभाजन के कारण अप्रत्यक्ष रूप से इस राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बनती दिखाई दी।
राजनीति एक गन्दी नाली का कीड़ा है। ऐसा हमने या तो अपनी किताबों में पढ़ा है या फिर आसपास के लोगों से सुना है। कहा जाता है कि राजनीति में न कोई अपना होता है और न ही कोई पराया। सत्ता के खेल में विचारधाराएँ अक्सर सुविधानुसार बदल ली जाती हैं। ऐसा ही एक दृश्य महाराष्ट्र के अंबरनाथ में देखने को मिला है, जहाँ दो कट्टर पार्टियाँ (भाजपा और कांग्रेस) आपस में गठबंधन बना कर महारष्ट्रा के अम्बरनाथ नगर निगम चुनाव में अपनी सत्ता स्थापित की।
दिसंबर 2025 में हुए अंबरनाथ नगर निगम चुनाव ने प्रदेश की राजनीति को चौंकाने वाला मोड़ दे दिया। इस चुनाव में वह हुआ जिसकी कल्पना करना तक लोगों के लिए आसान नहीं था —दो कट्टर विरोधी दल, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, एक साथ आकर सत्ता में भागीदार बन गए। अम्बरनाथ नगर निगम चुनाव 20 दिसंबर 2025 को हुए थे, जिनकी मतगणना और परिणाम 21 दिसंबर 2025 को घोषित किए गए।
चुनावी नतीजों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं मिला। यही कारण था कि परिणाम घोषित होने के बावजूद कई दिनों तक नगर निगम में सत्ता का गठन नहीं हो सका। राजनीतिक असमंजस की यह स्थिति 7 जनवरी 2026 तक बनी रही। इसी दिन एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आई—भाजपा, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने मिलकर अम्बरनाथ नगर निगम में पोस्ट-पोल गठबंधन कर लिया। इस गठबंधन को “अम्बरनाथ विकास आघाड़ी” नाम दिया गया।
इस गठबंधन के तहत भाजपा नेता करंजुले पाटिल को नगरपालिका अध्यक्ष चुना गया। यह फैसला इसलिए भी ज्यादा राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया क्योंकि अम्बरनाथ को लंबे समय से शिवसेना (शिंदे गुट) का गढ़ माना जाता रहा है। जिस सीट पर शिवसेना अपनी मजबूत पकड़ का दावा करती रही हो, वहाँ भाजपा–कांग्रेस का साथ आना पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में एआईएमआईएम (AIMIM) और उसके प्रमुख नेता असदुद्दीन ओवैसी का नाम भी लगातार चर्चा में रहा। हालांकि एआईएमआईएम न तो भाजपा-कांग्रेस-एनसीपी के इस गठबंधन का औपचारिक हिस्सा रही और न ही उसने किसी पार्टी को बाहर से समर्थन देने की घोषणा की, लेकिन चुनावी मैदान में उसकी मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों और शिवसेना नेताओं का आरोप है कि एआईएमआईएम के चुनाव लड़ने से वोटों का बँटवारा हुआ, जिसका सीधा नुकसान शिवसेना (शिंदे गुट) को उठाना पड़ा। इसी वोट विभाजन के कारण किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका और बाद में बने इस अप्रत्याशित पोस्ट-पोल गठबंधन का रास्ता साफ हुआ। हालांकि ओवैसी और उनकी पार्टी इन आरोपों को सिरे से खारिज करते रहे हैं और उनका कहना है कि एआईएमआईएम स्वतंत्र रूप से अपनी राजनीति और अपने मतदाताओं के मुद्दों पर चुनाव लड़ती है, लेकिन अम्बरनाथ की राजनीति में उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद शिवसेना की प्रतिक्रिया तीखी और आक्रामक रही। पार्टी नेताओं ने गठबंधन को जनता के साथ “धोखा” बताया। शिवसेना (शिंदे गुट) के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री उदय सामंत ने खुलकर भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में “कांग्रेस मुक्त भारत” की बात करते हैं, लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा उन्हीं कांग्रेस नेताओं के साथ मिलकर सत्ता चला रही है। उनके अनुसार यह भाजपा की कथनी और करनी के बीच का सीधा विरोधाभास है और यही उसका “दोगलापन” है।
उदय सामंत के इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक गरमा गया। शिवसेना नेताओं का कहना है कि यह गठबंधन न तो विचारधारा के आधार पर बना है और न ही जनता के हित में, बल्कि केवल सत्ता की लालसा का परिणाम है। उनका आरोप है कि जिन पार्टियों ने वर्षों तक एक-दूसरे को भ्रष्ट, देशविरोधी और असफल कहा, वही अब कुर्सी के लिए साथ बैठी हैं।
इसी राजनीतिक तनाव के बीच अम्बरनाथ में हिंसा की खबरों ने भी चिंता बढ़ा दी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गठबंधन की घोषणा के बाद राजनीतिक कार्यकर्ता इम्तियाज़ जलील की कार पर अज्ञात लोगों द्वारा हमला किए जाने की घटना सामने आई है। हमला महारष्टा में होने वाले नगर परिषद् के चुनाव से सम्बंधित था, टिकट न मिलने की आक्रोश में कार्यकर्त्ता पर हमला किया गया। हालांकि प्रशासन ने अभी तक किसी भी पार्टी पर सीधा आरोप नहीं लगाया है, लेकिन इस घटना ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि जमीनी स्तर पर राजनीतिक असंतोष और गुस्सा तेज़ी से बढ़ रहा है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
कुल मिलाकर, अम्बरनाथ की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सवाल सिर्फ गठबंधन का नहीं, बल्कि राजनीति की नैतिकता का है। क्या विचारधाराएँ सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित रह गई हैं? क्या जनता के मतों का सम्मान सत्ता की गणित में दबकर रह जाता है? अम्बरनाथ का यह प्रयोग आने वाले समय में महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति के लिए भी एक मिसाल बन सकता है—या फिर एक चेतावनी।
(Rh/PO)