

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर फिर सवाल।
डी वाई चंद्रचूड़–मोदी तस्वीर ने बहस बढ़ाई।
अमित शाह से जड़े मामले की सुनवाई के दौरान जज की मौत।
भाजपा पर लोकतंत्र की हत्या करने का आरोप
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ देखा गया है। मुख्य न्यायाधीश का फोटो इस तरीके से सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखना एक बार फिर पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तस्वीर के विवाद की याद दिलाता है।
पूर्व न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ के निज़ी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोटो दिखाई देना ,उस समय काफ़ी कुछ सवाल खड़ा कर गया। यह आरोप लगाया जाने लगा था कि न्यायपालिका पर सरकार की छाया पड़ चुकी है जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर भारतीय राजनीतिक समाज में एक बहस छिड़ गयी थी। बता दें विगत कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर वर्तमान भाजपा (BJP) सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि संवैधानिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में सरकार हस्तक्षेप करके लोकतांत्रिक मूल्यों को ख़त्म करने की कोशिश कर रही है। इसी क्रम में यह समझने का प्रयास करेंगे कि क्यों संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव या फिर सरकार के द्वारा हस्तक्षेप ,एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है
2014 में केंद्र में भाजपा (BJP) की सरकार बनाने के बाद भाजपा के ही एक नेता अरुण जेटली ने कहा था कि न्यायपालिका व्यवस्थापिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है। व्यवस्थापिका को सीमित करने की कोशिश की जा रही है। न्यायपालिका के बारे में बोलते हुए सदन में ही अरुण जेटली ने कहा था कि (The desire of a post retirment jobs influences pre retirement judgments.) कहने का तात्पर्य यह था कि रिटायर (Retire) होने के बाद नौकरी की ख़्वाहिश, रिटायर (Retire) होने के पहले के निर्णयों को प्रभावित करता है।
वहीं दूसरी तरफ़ मुंबई सीबीआई(CBI) स्पेशल कोर्ट के जज रहे बृजगोपाल हरकिशन लोया (Brijgopal Harkishan Loya) की मौत से न्यायपालिका पर डाले जा रहे दबाव उजागर हुए ।
बता दें कि जज लोया (Loya) , सोहराबुद्दीन शेख (Sohrabuddin Sheikh) एनकाउंटर मामले से जुड़े केस की सुनवाई करने वाले थे जिसमें अमित शाह (Amit Shah) के ऊपर भी आरोप लगे थे। अमित शाह साल 2005 में गुजरात राज्य सरकार में गृहमंत्री हुआ करते थे। अमित शाह के ऊपर आरोप लगा था कि गुजरात राज्य सरकार में गृहमंत्री रहते हुए उन्होंने ज़बरदस्ती पुलिस अधिकारियों को एनकाउंटर का आदेश दिया था। अमित शाह को अदालत में पेश होने की तारीख 15 दिसंबर 2014 को जज लोया ने तय किया था। अचानक 1 दिसंबर 2014 को जज लोया के मृत्यु की ख़बर निकलकर बाहर आती है जो कि एक रहस्य्मयी मौत थी। हालांकि, जज लोया (Loya) की मौत को रिपोर्ट में नेचुरल डेथ (Netural Death) बताया गया था। वहीं लोया के परिवार वालों के कुछ बयानों ने उनकी मौत को संदिग्ध होने की शंका में तब्दील कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काट्जू (Markandey Katju) भी इस मामले पर काफी तीखी प्रतिक्रया दे चुके हैं। उनका कहना है कि बहुत सारे जजों को न्यायिक प्रक्रिया की बुनियादी समझ भी नहीं होती है फिर भी उनको जज बना दिया जाता है। उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में आधे से ज़्यादा जज भ्रष्ट हैं।
वहीं सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के वकील और पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण (Shanti Bhushan) ने साल 2008 -9 में एक हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया। इस हलफनामे में 16 पूर्व जजों के नाम थे। उन्होंने कहा था कि उस समय 16 में से कम से कम 8 जज ऐसे हैं जो भ्रष्ट रहे हैं। सवाल यह है कि यदि जजों के ऊपर इतने सारे आरोप लग चुके हैं तो जजों का राजनीतिक रसूखदारों के साथ अलग से मीटिंग करना या फिर अपने निजी कार्यक्रमों में शामिल करना क्या दर्शाता है।
हल ही में पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ (Pushpendra Kulshrestha) नाम के एक राष्ट्रवादी पत्रकार ने एक विचार मंच पर राम मंदिर फैसले से जुड़े मामले पर बयान दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा ,प्रधानमंत्री की चिट्ठी के आधार पर जज ने फैसला दिया था। पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ (Pushpendra Kulshrestha) ने आगे कहा कि जज के दामाद एक भ्रष्टाचार के मामले में फंसे हुए थे। चिट्ठी में उनके दामाद का काला चिट्ठा था, जिसका असर रहा कि जज ने 40 दिन के अंदर फैसला करने का बयान दिया। उनको राज्य सभा इसलिए भेजा गया ताकि जज साहब समाज में खुलकर मामले के बारे में बोल न सके। पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के बयानों से प्रतीत हो रहा था,उनका इशारा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) की तरफ था। प्रशंसा स्वरुप ही सही, परन्तु इस तरीके के बयान अगर सार्वजनिक मंचों पर दिए जा रहे हैं तो यह सवाल बनता है कि क्या हकीकत में न्यायपालिका ,जजों के निज़ी विचारों से प्रभावित है या फिर संवैधानिक संस्थाओं पर वास्तव में दबाव डाला जा रहा है।
बता दें कि चुनाव आयोग (Election Commission of India) एक संवैधानिक संस्था है। इसका काम देश में और राज्यों में निष्पक्ष चुनाव प्रणाली को बनाये रखना है। केंद्र में साल 2014 से भाजपा की सरकार आने के बाद से विपक्ष यह आरोप भी लगाता रहा है कि चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली को सरकार के माध्यम से प्रभावित किया जा रहा है। पूर्व में विपक्ष के नेताओं में बसपा प्रमुख मायावती ने बहुत बार आरोप लगाया है कि ईवीएम (EVM) के माध्यम से चुनाव को प्रभावित किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा कर चुके हैं।
अपने बहुत सारे प्रेसवार्ता में राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने प्रमाण भी देने का प्रयास किया और बताया कि महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव में अवैध वोटरों के नाम जोड़े गए। साल 2024 में हुए लोकसभा चुनाव की चर्चा करते हुए राहुल गाँधी ने कहा था ,"इससे साफ है कि संविधान की रक्षा करने वाली संस्था को मिटा दिया गया है और उस पर कब्जा कर लिया गया है। हमारे पास ऐसे सबूत हैं जो देश को दिखा देंगे कि चुनाव आयोग जैसी संस्था का अस्तित्व ही नहीं है। यह गायब हो गई है। इन सबूतों को ढूंढ़ने में हमें लगातार 6 महीने लगे हैं। आप बिना किसी शक के देख पाएंगे कि कैसे लोकसभा चुनाव में चोरी की जाती है। 6.5 लाख वोटर वोट करते हैं और उनमें से 1.5 लाख वोटर फर्जी होते हैं।" अभी फ़िलहाल एस.आई.आर (SIR) भी एक मुद्दा बना है जिससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं।
साल 2023 में कानून बनाया गया जिसमें यह निर्धारित हुआ, मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर की जाएगी। चयन समिति में प्रधानमंत्री , प्रधानमंत्री द्वारा नामित कोई एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष का नेता होंगे। यह समिति बहुमत तय करके मुख्य चुनाव आयुक्त के नियुक्ति की सिफारिश करेगी । चयन समिति को तार्किक पूर्वक देखने पर यही प्रतीत होता है कि विपक्ष के नेता द्वारा विरोध करने पर भी चयन प्रक्रिया में सत्ताधारी दल का प्रभाव बना रहेगा।
बता दें कि साल 2022 में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में विधानसभा चुनाव था। विधान सभा चुनाव में बहुत सारे ऐसे जगह थे जहाँ पर अवैध वोट डालने और बहुत सारे वोटरों को वोट देने जाने से रोका गया था। विपक्षी दलों की तरफ़ से बहुत शिकायत करने के बावजूद कोई विशेष कार्रवाई नहीं हुई थी। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के चंदौली लोकसभा क्षेत्र में मतदाताओं के अंगुलियों पर ज़बरदस्ती स्याही लगायी गयी और मतदान प्रक्रिया की निष्पक्षता को कलंकित करने का प्रयास किया गया था।
वर्तमान की राजनीतिक व्यवस्था में, संवैधानिक संस्थाओं को सरकार के द्वारा नियंत्रण में रखने की बात की जा रही है। अगर व्यवस्था में इसी तरह खामियां दिखती रहीं तो देश का वो स्वरुप जो भारतीय संविधान में निहीत है, जिसमें न्याय, समानता, स्वतंत्रता, बंधुता के स्थापना हेतु विस्तृत व्याख्या की गयी है, को कैसे हासिल किया जाएगा। देश के तमाम राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठाए जा रहे सवाल ये दर्शाते हैं कि व्यवस्था में जंग लग चुकी है। अगर ऐसी बात है, तो क्या जंग लग चुकि इस व्यवस्था को फिर से किसी जयप्रकश नारायण वाले संपूर्ण क्रांति की आवश्यकता है? ऐसा प्रश्न राजनीतिक व्यवस्थाओं के अध्ययनकर्ताओं के बीच बना हुआ है।
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