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संस्कृति

माँ मुंडेश्वरी मंदिर में होते हैं कुछ अनोखे चमत्कार जिसे जानकर आप रह जाएंगे दंग

भारत विविधताओं और अचंभित कर देने वाले कथाओं और स्थलों से घिरा हुआ है। यह एक ऐसा देश है जहाँ मंदिरों और मठों में भी हैरत में डालने वाले चमत्कारों को देखा जा सकता है। आँध्रप्रदेश में लेपाक्षी मंदिर में जहाँ माता सीता के पदचिन्ह को आज भी देखा जा सकता है और कर्नाटक देवी

भारत विविधताओं और अचंभित कर देने वाले कथाओं और स्थलों से घिरा हुआ है। यह एक ऐसा देश है जहाँ मंदिरों और मठों में भी हैरत में डालने वाले चमत्कारों को देखा जा सकता है। आँध्रप्रदेश में लेपाक्षी मंदिर में जहाँ माता सीता के पदचिन्ह को आज भी देखा जा सकता है और कर्नाटक देवी हसनंबा मंदिर जहाँ दीपावली त्यौहार पर ही मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और अगले साल तक के लिए फिर बंद क्र दिए जाते हैं, किन्तु माता के समक्ष जलाया दीप और चढ़ाए गए फूल ताज़ा ही रहते हैं। ऐसे ही चमत्कारों से भरी है बिहार के कैमूर जिले में स्थित माता मुंडेश्वरी का मंदिर। आइए माता मुंडेश्वरी मंदिर के इतिहास और चमत्कारों पर थोड़ा ध्यान केंद्रित करते हैं।

इतिहास

मुंडेश्वरी मंदिर के शिलालेख के अनुसार यह मंदिर महाराजा उदय सेन के शासन काल में निर्मित हुआ था। जिसका मतलब इस मंदिर की नक़्क़ाशी व मूर्तियाँ उत्तर गुप्तकालीन समय की हैं। ईसाई कैलेंडर के अनुसार इस मंदिर का निर्माण काल 635-636 ई. में माना जाता है। माता मुंडेश्वरी देवी मंदिर मूर्तियों के अलावा यहाँ पर विराजमान है पंचमुखी महादेव(पाँच मुख वाले महादेव) जिनका शिवलिंग भी काफी दुर्लभ है। माता मुंडेश्वरी की प्रतिमा माँ वाराही देवी की प्रतिमा है क्योंकि उनकी सवारी महिष(भैंस) है। इस मंदिर का सम्बन्ध मार्कण्डेय पुराण से जुड़ा है।


इस मंदिर की यह भी मान्यता है कि इसी भूमि पर चंड-मुंड का वध हुआ था। कहते हैं की चंड-मुंड के नाश के लिए देवी का अवतरण हुआ था, चंड के विनाश के उपरांत मुंड इसी पर्वत (जहाँ आज मंदिर है) पर आकर छिप गया था। किन्तु देवी के क्रोध से कौन बच सका है तो उसका भी वध इसी पहाड़ी पर हुआ, जिसके बाद ही माता का मुंडेश्वरी देवी नाम हुआ।

जानकारों और पुरातत्वविदों का मानना है कि यहाँ कभी तेज़ भूकंप का झटका आया होगा जिस वजह से भगवान गणेश एवं शिव की मूर्तियाँ सहित अन्य देवी देवताओं की मूर्तियाँ भी मलबे में दब गई होंगी। मंदिर के ध्वस्तीकरण का एक और कारण यह भी बताया जाता है कि मुग़ल शासक औरंगज़ेब ने इस पवित्र स्थान को तुड़वा दिया था। खैर, खुदाई के पश्चात् 97 दुर्लभ मूर्तियों को खोजा गया है जिन्हे ‘पटना संग्रहालय’ में सुरक्षित रखा गया है।

माता मुंडेश्वरी देवी मंदिर। (Wikimedia Commons)

यह भी पढ़ें: “धर्मो रक्षति रक्षतः” आज इस विषय पर मतभेद क्यों?

चमत्कार: ‘एक ऐसी बलि जिसमे नहीं जाती जीव की जान’

माता Mundeshwari Temple में एक ऐसा चमत्कार होता है जिसे देखने के लिए दूर-दूर से देखने के लिए यहाँ पर आते हैं। यहाँ बकरे की बलि तो चढ़ाई जाती है किन्तु प्राण लिए बगैर। जी हाँ! यहाँ भक्तों की कामनाओं के पूरा होने के बाद बकरे की सात्विक बलि चढ़ाई जाती है, लेकिन माता रक्त की बलि नहीं लेतीं, बल्कि बलि चढ़ने के समय भक्तों में माता के प्रति आश्चर्यजनक आस्था उत्पन्न होती है। जब बकरे को माता की मूर्ति के सामने लाया जाता है तो पुजारी ‘अक्षत’ (चावल के दाने) को मूर्ति को स्पर्श कराकर बकरे पर फेंकते हैं। बकरा उसी क्षण अचेत, मृतप्राय सा हो जाता है। थोड़ी देर के बाद अक्षत फेंकने की प्रक्रिया फिर होती है तो बकरा उठ खड़ा होता है और इसके बाद ही उसे बंधन-मुक्त कर दिया जाता है।

अंग्रेजी में पढ़ें: The Oldest Functional Temple Of The World- Mundeshwari Temple

कुछ और रौचक तथ्य:

  1. यहाँ भगवान शिव का एक पंचमुखी शिवलिंग है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका रंग सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग दिखाई देता है।
  2. वर्षों बाद Mundeshwari Temple में ‘तांडुलम भोग’ अर्थात ‘चावल का भोग’ और वितरण की परंपरा पुन: की गई है। ऐसा माना जाता है कि 108 ईस्वी में यहाँ यह परंपरा जारी थी।
  3. मंदिर का अष्टाकार गर्भगृह इसके निर्माण से अब तक कायम है।
  4. ‘माता वैष्णो देवी’ की तर्ज पर इस मंदिर का विकास किये जाने की योजनाएं बिहार राज्य सरकार ने बनाई हैं।
  5. मुंडेश्वरी मंदिर का संरक्षक एक मुस्लिम परिवार है।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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