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National Voter’s Day2021: है चुनना सही हमें, भविष्य हमारे हाथ में!

लोकतंत्र का स्तम्भ है मतदाता! जिनके सामने देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी हाथ जोड़े खड़ा रहता है। मतदाता के हाथ में सत्ता ‘छीनने और उसे पलट देने’ दोनों की शक्ति है। किन्तु जिस लोकतंत्र के त्यौहार ‘चुनाव’ में आज युवा भागीदार बनने से कतराते हैं उन्हें देख कर यह आभास होता है कि, क्या

लोकतंत्र का स्तम्भ है मतदाता! जिनके सामने देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी हाथ जोड़े खड़ा रहता है। मतदाता के हाथ में सत्ता ‘छीनने और उसे पलट देने’ दोनों की शक्ति है। किन्तु जिस लोकतंत्र के त्यौहार ‘चुनाव’ में आज युवा भागीदार बनने से कतराते हैं उन्हें देख कर यह आभास होता है कि, क्या आने वाले वर्षों में चंद लोग ही सत्ता का रास्ता बनाएंगे?

कुछ युवाओं से यह भी सुनने को मिल जाता है कि यदि आप देश में बदलाव लाना चाहते हैं, तो मतदान मत कीजिए! जो की सरासर गलत है, क्योंकि मतदान न करने से आप स्वयं ही अपने महत्वपूर्ण अधिकार का हनन कर रहे हैं। जिस युवा भविष्य के कंधे पर देश अपना आने वाले कल को लिख रहा है अगर वह, बीच रास्ते में ही साथ छोड़ दे तो विकास और उन्नति तो दूर देश को तोड़ने वाले संसद पहुँच जाएंगे।


सत्ता का पायदान नेताओं के लिए मतदाता बिछाता है और अगर काम पसंद न आए तो पाँच साल बाद वह पायदान खींचने की हिम्मत भी रखता है। केवल जरूरत है सही चुनाव की। आज कोई अगर देश की संसद में बैठे सरकार पर और विपक्ष पर टीका-टिप्पणी या सवाल करता है तो वह उसका अधिकार है क्योंकि उन्हें संसद में बैठने का हक़ आप मतदाताओं ने दिया हे। आपके पास वह शस्र है जिसके सामने नेता नतमस्तक खड़े होतें हैं। किन्तु आप उन सवालों को तभी पूछ सकते हैं जब आपने मतदान किया हो। वरना स्वयं समाज आपकी मानसिकता पर प्रश्नचिन्ह उठा देगा।

National voters day 2021चुनाव में मतदान करती जागरूक जनता। (PIB)

हर पाँच साल बाद एक मुख्य चुनाव और हर साल कहीं न कहीं चुनाव देखने को मिल जाता है। तो उसी की सुविधा के लिए चुनाव(Election Commission of India) आयोग ने राष्ट्रिय मतदाता दिवस (National Voter’s Day) पर मतदाताओं की सुविधा के लिए ई-एपिक (e-EPIC Electronic Electoral Photo Identity Card) लॉन्च किया है। चुनाव आयोग (Election Commission of India) की ओर से यह व्‍यवस्‍था राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voter’s Day) के मौके पर सामान्‍य मतदाताओं के लिए की गई है। अपने मोबाइल पर ही वह वोटर आइडी कार्ड को डाउनलोड कर सकता है। जब देश डिजिटल दुनिया में अपनी पकड़ मजबूत करने का हर संभव प्रयास कर रहा है तो चुनाव प्रक्रियाएं भी डिजिटल करने की प्रयास में सरकार का यह महत्वपूर्ण कदम है।

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देश के प्रथम वोटर व हिमाचल के श्याम सारंग नेगी 103 वर्ष के हैं, किन्तु आश्चर्य की बात यह है कि उन्होंने कभी भी अपने मतदान का अधिकार नहीं छोड़ा। इस साल भी हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के पंचायत चुनाव में उन्होंने अपनी हाजिरी दर्ज कराई। यह हैं मतदाता के अधिकार का सटीक उदाहरण, इसलिए जागरूक बनें और अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल करें।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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