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राजनीति

फ्रांस की मीडिया की एक रिपोर्ट से एक बार फिर भारत में गूंजा राफेल का मुद्दा

ताज़ा बवाल एक फ्रांसीसी मीडिया आउटलेट की एक रिपोर्ट के सामने आने के बाद मचा है। इस रिपोर्ट में यूपीए सरकार को कठघड़े में खड़ा किया गया।

दसॉल्ट एविएशन द्वारा बनाया गया राफेल विमान।(Pixabay)

23 सितम्बर 2016 को भारत ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी डिफेन्स डील को अंजाम दिया जिसमे उसने फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट एविएशन को 36 राफेल फाइटर जेट्स का आर्डर(Rafale Deal) दिया। यह पूरी डील तक़रीबन 58,000 करोड़ रुपयों में हुई जिसमे अप्रैल 2022 तक सभी राफेल फाइटर जेट्स रेडी टू फ्लाई कंडीशन में भारत आ जाएंगे लेकिन मुद्दा यह नहीं है की डील कितने में हुई मुद्दा डील पर मचने वाले बवाल का है। राफेल डील(Rafale Deal) का मुद्दा अब एक दफा फिर उजागर हो गया है। ताज़ा बवाल एक फ्रांसीसी मीडिया आउटलेट की एक रिपोर्ट के सामने आने के बाद मचा है।

फ़्रांसिसी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांसीसी विमान निर्माता डसॉल्ट एविएशन द्वारा भारत के साथ खरीद सौदे को सुरक्षित करने में मदद करने के लिए एक "बिचौलिए" को कम से कम 7.5 मिलियन यूरो (64 करोड़ रुपये से अधिक) का भुगतान करने के लिए "फर्जी चालान" का इस्तेमाल किया गया था।


मीडियापार्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, मॉरीशस में कथित 'किकबैक' का भुगतान मॉरीशस में 'बिचौलिये' को 2007 और 2012 के बीच किया गया था। गौरतलब है कि 2004 से 2014 तक कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सत्ता में थी।
अप्रैल 2015 में, पीएम मोदी ने 36 राफेल लड़ाकू जेट खरीदने के लिए भारत सरकार के फैसले की घोषणा की। यह रक्षा मंत्रालय (MoD) द्वारा डसॉल्ट एविएशन और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच हस्ताक्षरित 126 विमान सौदे को वापस लेने के एक साल बाद था।

क्या है राफेल डील ?

साल 2001 में भारतीय एयरफोर्स(Indian Airforce) ने केंद्र सरकार से मध्यम बहु भूमिका लड़ाकू विमान की मांग क्योंकि उस समय भारतीय वायुसेना के पास लाइट और हैवी रेंज लड़ाकू विमान पहले से मौजूद थे लेकिन भारत में लड़ाकू विमान खरीदने की असली प्रक्रिया साल 2007 में शुरू हुई जब उस समय की रक्षा अधिग्रहण परिषद के अध्यक्ष उस समय के रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने 126 लड़ाकू विमान खरीदने के प्रपोजल को हरी झंडी दिखा। इसके बाद भारत में फाइटर जेट्स को खरीदने के लिए बोली की प्रक्रिया शुरू हो गई जिसमे बड़ी-बड़ी फाइटर जेट निर्माता कंपनी जैसे बोइंग, लॉकहीड मार्टिन और दसॉल्ट एविएशन ने भाग लिया। शुरुवात में 6 फाइटर जेट्स को फाइनल किया गया फिर कम मेंटेनेंस कॉस्ट के कारण राफेल को खरीदने पर सहमति बन गई और दसॉल्ट एविएशन को 126 फाइटर जेट्स का कॉन्ट्रैक्ट दे दिया गया। इसमें 18 जहाज़ रेडी टू फ्लाई कंडीशन तो वहीं 108 जहाज़ ट्रांसफर ऑफ़ टेक्नोलॉजी के तहत भारत की हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड कंपनी में भारत में बनने थे। शुरुवात में इस डील की अनुमानित लागत 54,000 करोड़ रूपये आंकी गई।

यह डील जितनी आसान लगती है उतनी है नहीं। 2012 में दसॉल्ट और भारत सरकार के बीच राफेल जेट की कीमत को लेकर बातचीत शुरू हुई। ऐसी बातचीत अमूमन 5-6 महीने चलती हैं लेकिन इस मामले में इस बातचीत को चार साल लग गए। इसका असली कारण था 2012 में फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव और
2014 में भारत में सत्ता परिवर्तन। अंत में यह डील कभी हो ही नहीं पाई।

Dassault Aviation भारत ने फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट एविएशन को 36 राफेल विमान बनाने का करार दिया है (Wikimedia Commons)

2014 में भारत में सत्ता परिवर्तन के बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी। उस समय मोदी सरकार ने पाया की पूर्व में गई 126 विमानों की डील काफी महंगी थी। नरेंद्र मोई को लगा की भारत को लड़ाकू विमान की तुरंत आवश्यकता है। 2015 में अपने फ्रांस दौरे के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार ने फ्रांस की दसॉल्ट एविएशन के साथ एक नया करार किया जिसमे भारत को 36 रेडी टू फ्लाई कंडीशन में दसॉल्ट बनाकर देगा सारे विमान अप्रैल 2022 तक भारत आ जाएंगे। इस कुल डील की अनुमानित लागत 58,000 करोड़ रूपये है। इसमें राफेल विमान के साथ-साथ दसॉल्ट एविएशन भारत को रक्षा हथियार भी बनाकर देगा जिसमे खतरनाक meteor-1 मिसाइल भी शामिल है और तो और इस कीमत का 30 फीसद फ्रांस भारत के रक्षा क्षेत्र में निवेश करेगा। 23 नवंबर 2016 को भारत और फ्रांस के रक्षा मंत्रियों ने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर डील फाइनल कर ली। ये सारे विमान फ्रांस की दसॉल्ट एविएशन और भारत रिलायंस एयरोस्पेस मिलकर बनाएँगे।

यह भी पढ़ें- डब्ल्यूएचओ ने भारत के 2 टीकों को मंजूरी दी : मंडाविया

इस डील के बाद भारत में खूब बवाल मचा जिसमे विपक्ष हरबार सरकार पर आरोप लगाता रहा की यह डील यूपीए की सरकार से 3 गुना ज़्यादा मेहेंगी है और इससे भारत को 40000 करोड़ का घाटा होगा। अब भारत को कुल 26 राफेल जेट मिल चुके हैं और बाकी अप्रैल 2022 आ जाएंगे। साल 2018 में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने राफेल विमान की खरीद को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार किया और इसमें कोई अनुचितता नहीं पाई। 2019 में, शीर्ष अदालत ने राफेल मामले में अपने 2018 के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

Input-Various Source; Edited By-Saksham Nagar

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