पार्टी द्वारा बर्खास्त किए जाने का इंतज़ार, सचिन पायलट की सोची समझी रणनीति? – ओपिनियन

अब आगे 2 ही रास्ते हैं। या मध्य प्रदेश में जो हुआ उसे राजस्थान में भी दोहराया जाए, मतलब ज्योतिरादित्य सिंधिया के तरह सचिन पायलट भी भाजपा में शामिल हो जाएँ, या अपनी नई क्षेत्रीय पार्टी बना लें।

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सचिन पायलट, पूर्व उपमुख्यमंत्री व बागी काँग्रेस नेता, राजस्थान (Picture Source: Sachin Pilot Twitter Handle)

राजस्थान की सियासत में उठा पटक का दौर जारी है, और उसी बीच काँग्रेस के बागी नेता और राजस्थान के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को काँग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया गया है। सचिन पायलट के साथ उनके सहयोगी विधायक विश्वेंद्र सिंह और रमेश मीना से भी मंत्री पद छीन लिया गया है। 

कल तक स्थिति कुछ सुधरती हुई भी नज़र आ रही थी जब ऐसी ख़बरें चली की, सचिन पायलट समझौते के लिए राज़ी हो गए हैं, लेकिन फिर उनहोंने खुद बयान जारी कर सारी अटकलों पर विराम लगा दिया, और ये बता दिया की, किसी भी तरीके का समझौता नहीं किया गया है। उनका कहना है की उनके पास 30 विधायकों का समर्थन हासिल है जिसकी वजह से गलहोत सरकार अल्पमत में चली गयी है। लगातार पार्टी के नेताओं द्वारा उन्हे मनाने की कोशिश जब कामयाब नहीं हो सकी तो आज उन्हे उपमुख्यमंत्री और काँग्रेस अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया गया। बर्खास्त होने के बाद, सचिन पायलट ने अपने ट्वीटर के बायो में काँग्रेस प्रदेश अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री वाले जानकारी कों हटा लिया है, और साथ में एक ट्वीट कर लिखा है, “सत्य को परेशान किया जा सकता है पराजित नहीं।” 

बर्खास्त का इंतज़ार, सोची समझी रणनीति?

सूत्रों की मानें तो सचिन पायलट ने वापस लौटने के लिए कई शर्तें रखी थी, जिनमें सबसे बड़ी शर्त ये थी की, मुख्यमंत्री का पद उन्हे सौंपा जाए। इसके अलावा वे गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय की भी ज़िम्मेदारी अपने खेमे के लोगों को दिलाना चाहते थे। अशोक गहलोत और पार्टी आलाकमान ने इन शर्तों को मानने से इंकार कर दिया और नतिजन उन्हे सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। 

लेकिन सवाल ये है की, क्या बागी हुए सचिन पायलट ने विद्रोह से पहले आने वाले संकटों की विवेचना नहीं की होगी? ज़रूर की होगी। और अगर ऐसा है, तो ज़ाहिर है की ऐसे सख़्त बागी तेवर लिए खड़े सचिन पायलट को इस बात का भी अंदाज़ा होगा की, उन्हे सरकार व पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। आपको बता दें की सरकार में सचिन पायलट के पास उपमुख्यमंत्री पद के साथ पीडबल्यूडी और ग्रामीण विकास मंत्रालय की भी ज़िम्मेदारी थी। लेकिन जानकार बताते हैं की उनके अपने मंत्रालय में भी उनकी नहीं चलती थी, वजह? मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का उनके मंत्रालयों में हस्तक्षेप। पद से इस्तीफ़ा देना, पार्टी के लिए फ़ायदेमंद साबित होता और पार्टी को उन्हे बर्खास्त कर अपने हाथ गंदे नहीं करने पड़ते, लेकिन पार्टी द्वारा बर्खास्त करने का निर्णय, उन्हे राजनीतिक शहादत दे जाएगा। तो क्या ऐसा है की, ये उनकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है? संभव है। 

काँग्रेस पार्टी के आला नेताओं की मानें तो सचिन पायलट, लगातार भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के संपर्क में हैं। काँग्रेस का ये भी इल्ज़ाम है की भाजपा के तरफ से काँग्रेस के विधायकों को 20-25 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया गया है। 25 करोड़ के प्रस्ताव वाली बात में सत्यता कितनी है, इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता है लेकिन इन सबको अगर, राजस्थान में, काँग्रेस सहयोगियों पर कल पड़े ईडी के छापे से जोड़ कर देखा जाए तो इस खेल में भाजपा के सहयोग को नकारा भी नहीं जा सकता है। और ये पूरा खेल सोची समझी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। तो क्या इसका मतलब ये है की सचिन पायलट, पार्टी के बर्खास्त करने के निर्णय का ही इंतज़ार कर रहे थे? अगर ऐसा है तो इस बर्खास्त को अशोक गहलोत की जीत बताना अभी जल्दबाज़ी होगी। 

काँग्रेस के प्रभावी युवा नेताओं की बढ़ती लोकप्रियता से राहुल गांधी कों लगता है डर?

आपको बता दें की काँग्रेस और राजस्थान का एक बड़ा हिस्सा सचिन पायलट के समर्थन में खड़ा है। इसकी वजह है, काँग्रेस पार्टी के अंदर फैली अलोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ। काँग्रेस के आलाकमान पर आरोप है की राहुल गांधी की वजह से सचिन पायलट के आगे बढ़ने में समस्या पैदा की जा रही है। 2018 में राजस्थान में हुई काँग्रेस की वापसी का श्रेय भी सचिन पायलट को ही जाता है जिसकी वजह से मुख्यमंत्री पद पर सचिन पायलट की दावेदारी सबसे ज़्यादा थी, लेकिन उम्मीद के विपरीत पार्टी आलाकमान ने मुख्यमंत्री पद के लिए अशोक गहलोत को चुना। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं की, राहुल गांधी के युवा नेता वाली छवि को बरकरार रखने के लिए पार्टी किसी और जिम्मेदार और प्रभावी युवा नेता को शीर्ष पर नहीं पहुँचने देना चाहती है। कुछ लोगों का ये भी मानना है की काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए भी सचिन पायलट प्रबल दावेदार हैं, और ये राहुल गांधी के राजनीतिक कैरियर के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। 

अब आगे क्या करेंगे सचिन पायलट?

अब आगे 2 ही रास्ते हैं। या मध्य प्रदेश में जो हुआ उसे राजस्थान में भी दोहराया जाए, मतलब ज्योतिरादित्य सिंधिया के तरह सचिन पायलट भी भाजपा में शामिल हो जाएँ, या अपनी नई क्षेत्रीय पार्टी बना लें। अगर सचिन पायलट के 30 विधायकों के समर्थन वाला दावा पक्का है तो ये अशोक गहलोत के सरकार को गिराने में सहायक हो सकता है।

आपको बता दें की राजस्थान की 200 सीटों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 101 विधायकों के समर्थन की ज़रूरत होती है। उन 200 सीटों में से 107 सीट काँग्रेस, 72 सीट भाजपा, 2 सीट बीटीडी, 2 सीपीआईएम, 1 आरएलडी, 3 आरएलपी व 13 सीट निर्दलीयों के खाते में है। इनमें से काँग्रेस की सरकार को अपने 107 काँग्रेसी विधायकों के अलावा बीटीपी, सीपीआईएम, आरएलडी के साथ 12 निर्दलीयों का समर्थन हासिल था। ये कुल मिला कर 124 के आंकड़े तक पहुँचता है। 

सरकार गिराने के लिए ज़रूरी आंकड़े

सचिन पायलट के दावे को माना जाए, तो उनके पास 30 विधायकों का समर्थन हासिल है। दल-बदल कानून के कारण ये 30 बागी विधायक चाहे भी तो सीधे तौर पर भाजपा में शामिल नहीं हो सकते, तो अशोक गहलोत की सरकार गिराने के लिए इन्हे इस्तीफ़ा देना पड़ेगा। इस इस्तीफ़े से विधानसभा में कुल विधायकों की संख्या 200 से घट कर 170 के आंकड़े पर पहुँच जाएगी, जिससे बहुमत के लिए अब 101 नहीं बल्कि 86 विधायकों का समर्थन चाहिए होगा। 

अगर ऐसा मान लेते हैं की सचिन पायलट के दावे के अनुसार उनके समर्थन वाले 30 विधायक काँग्रेस के ही हैं, तो मामला और भी दिलचस्प हो जाएगा। क्यूंकी तब काँग्रेस के अपने विधायक 107 नहीं, बल्कि सिर्फ 77 रह जाएंगे। लेकिन सचिन पायलट तब भी सरकार नहीं गिरा पाएंगे, क्यूंकी काँग्रेस अल्पमत में होने के बावजूद, बाकी पार्टियों के समर्थन से बहुमत के 86 विधायकों के आंकड़े को पार कर जाएगी। मतलब ये है की 30 विधायकों के इस्तीफ़े के बाद भी, बाकी समर्थक दलों के कारण अशोक गहलोत, 94 विधायकों के समर्थन से सरकार बचाने में कामयाब रहेंगे। 

लेकिन गौर करने वाली बात ये हैं की, काँग्रेस की समर्थक दल बीटीपी ने कल ही किसी के भी समर्थन में अपना मत देने से इंकार कर दिया है। मतलब अब गहलोत का आंकड़ा 94 से घट कर 92 पर आ सकता है। मतलब सरकार गिराने के लिए तब भी, 7 विधायक और चाहिए होंगे। दूसरी तरफ 76 विधायकों वाली भारतीय जनता पार्टी अगर 12 काँग्रेस समर्थक निर्दलीय विधायकों में से 10 कों भी अपनी ओर खींचने में सफल होती है, तो भाजपा, राजस्थान की तख्त पर फिर से क़ाबिज़ हो सकती है। 

मामला दिलचस्प है, तो पॉप्कॉर्न उठाइए और आनंद लीजिये इस सियासी खेल का।  

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