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संस्कृति

मंदिर में पहनावे पर आग्रह करना, मतलब अभिव्यक्ति की आज़ादी को ठेस पहुँचाना है!

शिरडी के साईबाबा मंदिर ने श्रदालुओं से यह आग्रह किया कि वह सभ्य तरीके से कपड़े पहनकर आएं। उसके लिए बाकायदा बोर्ड भी लगाया गया गई।

(Wikimedia Commons)

शिरडी के साईबाबा मंदिर संस्थान ने श्रदालुओं से यह आग्रह किया कि वह सभ्य तरीके से कपड़े पहनकर आएं। उसके लिए बाकायदा बोर्ड भी लगाया गया है। मगर ध्यान दें, कि संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कान्हुराज बागते ने यह बयान भी जारी किया कि संस्थान किसी के भी पोशाक पर आपत्ति नहीं जता रहा है और न ही कोई नियम थोपा जा रहा है। यह अपील अन्य श्रद्धालुओं द्वारा शिकायत पर की गई थी जिसमे कहा गया कि कुछ लोग आपत्तिजनक कपड़े पहनकर मंदिर में आते हैं।

हालांकि कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह अपील ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को ठेस पहुँचाने जैसा लगा और इसी कड़ी में चर्चित सामाजिक कार्यकर्त्ता तृप्ति देसाई ने विवादासपद बयान दे दिया। देसाई ने एक वीडियो संदेश जारी कर यह कहा कि “मंदिर के पुजारी अर्धनग्न होते हैं, लेकिन किसी श्रद्धालु ने इस पर आपत्ति नहीं की। बोर्ड को तत्काल हटाया जाना चाहिए वरना हम आकर हटा देंगे।” आप को बता दें कि यह वही तृप्ति देसाई हैं जिन्होंने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के लिए आंदोलन किया था।


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क्या साईबाबा मंदिर संस्थान ने ही यह अपील की है?

देश के कई अन्य मंदिर और धर्मस्थल हैं जिन्होंने पहनावे को लेकर दिशानिर्देश जारी किए हुए हैं। सबसे बड़ा उदहारण है भारत का सुप्रसिद्ध ‘स्वर्ण मंदिर’, जहाँ पहनावे को लेकर कोई नियम नहीं हैं मगर सर पर दुपट्टा या रुमाल और स्लीवलेस कपड़े पहनने से बचने और घुटनों के ऊपर शॉर्ट्स या ड्रेस पहनने से बचने जैसे दिशा-निर्देश हैं। यह सभी दिशा निर्देश स्वर्णमंदिर के वेबसाइट पर भी उपलब्ध हैं। और लोग अपनी इच्छा से इन दिशानिर्देशों का पालन करते हैं।

हाल ही में, मिस्र में एक मॉडल और उसके फोटोग्राफर को गिरफ्तार किया गया, वह इसलिए क्योंकि सलमा अल-शिमी(मॉडल) ने मिस्र के प्राचीन पिरामिड ‘पिरामिड ऑफ़ जोसेर’ के सामने फोटोशूट कराया था। गिरफ़्तारी कारण था उनके द्वारा पहना गया प्राचीन पोशाक। मगर भारत में नेटफ्लिक्स पर मंदिर में फिल्माए आपत्तिजनक दृश्य पर किसी ने विरोध नहीं किया। और तो और सोशल मीडिया कुछ ऐसी तस्वीरें भी उपलब्ध हैं जिसमे मॉडलों ने अर्धनग्न अवस्था में मंदिर के सामने फोटो खिचवाया है। मगर उन पर कोई गंभीर करवाई नहीं हुई, क्या यही है अभिवयक्ति की स्वतंत्रता?

समाज में हो रहीं कुरीतियों पर आवाज उठाना एक अच्छी पहल है किन्तु आज़ादी कह कर नई कुरीतियों को जन्म देना, यह नहीं। मंदिर द्वारा की गई अपील शिकायतों का नतीजा है न कि थोपी जाने वाली नियम या एक विचार को बढ़ावा देने वाला प्रोपेगेंडा।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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