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ओपिनियन

क्या किसी को चिंता नहीं?

क्या हमें यह इस तरीके को इस्तेमाल करना रोक देना चाहिए और जिन विशेषज्ञों ने चेताया था उनके तर्कों को भी सुनना चाहिए? यह सवाल महत्वपूर्ण हैं।

सामूहिक टीकाकरण पर विशेषज्ञों की चेतावनी पर ध्यान देना होगा।(Pixabay)

By: Maria Wirth

“मारिया, आप देश में चल रहे सामूहिक टीकाकरण पर अपना किसी प्रकार का विचार न बनाएं”, एक भारतीय मित्र ने मुझे सलाह दी थी। क्योंकि “आप अपनी साख को स्वयं ही खराब करेंगी और कोई आपकी सुनेगा भी नहीं।” वह शायद सही भी हैं, किन्तु क्योंकि जो हो रहा है उसकी मुझे चिंता है और मुझे लगता है कि मुझे इसपर लिखना चाहिए…


मान लीजिए कि हमारे सामने एक समस्या है और विश्वास भी है, साथ ही हमे वह तरीका भी पता है जिससे हम उस समस्या को हल कर सकते हैं। कई विशेषज्ञ ऐसे हैं जिन्होने हमारे तरीके को सटीक बताया है, किन्तु कई ऐसे भी विशेषज्ञ हैं जो यह मानते हैं कि हमारा तरीका काम और बिगाड़ सकता है। हमने उस तरीके को आजमाया और जल्द ही हालात बिगड़ने लगे। हमने अपने तरीके को और जोर देकर आजमाया, किन्तु फिर भी वह समस्या बिगड़ती चली गई।

क्या हमें यह इस तरीके को इस्तेमाल करना रोक देना चाहिए और जिन विशेषज्ञों ने चेताया था उनके तर्कों को भी सुनना चाहिए?

फिर अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। टीवी पर आने वाले डॉक्टर एवं वैज्ञानिक, अब तक यह मानने को तैयार नहीं हैं कि मौत के आंकड़ों में वृद्धि और सामूहिक टीकाकरण में कोई संबंध भी हो सकता है। सामूहिक टीकाकरण अभियान शुरू होने के बाद एशियाई देशों में मौत के आंकड़ों में वृद्धि देखी गई है। उसके लिए आप थाईलैंड कम्बोडिया या मंगोलिया का चार्ट उठाकर देख लें।

यहाँ तक की चिली एवं तुर्की देश में जहाँ अधिकांश लोगों को टीका लगाया जा चुका है वहां भी मृत्यु दर में वृद्धि हुई है। चिली ने अपनी आबादी के 30 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या को टीकाकरण दोनों डोज लगवा दिए हैं और 70 प्रतिशत के करीब जनसंख्या को कम से कम एक खुराक मिली है, किन्तु भी 25 अप्रेल को चिली में महामारी से मृत्यु की संख्या भारत से 7000 ज्यादा थी। तुर्की में भी, 25 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या को कम से कम एक खुराक मिली है और लगभग 10 प्रतिशत को पूरी तरह से टीका लगाया जा चुका है। किन्तु टीकाकरण के बाद मृत्यु दर में वृद्धि हुई जो कि अभियान से पहले कम थी और भारत के संदर्भ में 5000 अधिक मौतें हुई थीं।

इजराइल को इस अभियान में सफल घोषित कर दिया गया(टीकाकरण के दुष्प्रभावों के बावजूद), कुछ समय तक अभियान शुरू होने के बाद भी पाबंदियों को जारी रखा था। इसके इलावा, सीएनबीसी, रायटर अदि मीडिया चैनलों पर यह दवा किया गया था कि कोरोना का अफ्रीकी वेरिएंट फाइजर टीके पर भी बेअसर है।

वायरोलॉजिस्ट और वैक्सीन डेवलपर गीर्ट वंडेन बॉसचे ने चेतावनी दी कि वायरस के टीकाकरण अभियान पूरा होने पर, यह वायरस अधिक खतरनाकरूप लेने में मजबूर करता है। किन्तु इन लोगों पर ही क्यों प्रश्न चिन्ह खड़ा होता। अब सवाल यह है कि क्यों इस महामारी के शुरुआत के समय दुनिया भर की मीडिया इसकी तरफ बुरी तरह आकर्षित था?

वंडेन बॉसचे ने चेतावनी दी कि वायरस के टीकाकरण अभियान पूरा होने पर, यह वायरस अधिक खतरनाकरूप लेने में मजबूर करता है। (Pixabay)

क्या आपको याद है कि कैसे चीन के लोगों की मरने की तस्वीरें अंधाधुन दिखाई जा रही थी? कैसे चीन के वुहान में लॉक-डाउन को लगाया गया था अस्पताल बन रहे थे? टीवी चैनलों ने एक 24 घंटे एक जैसा माहौल बना दिया था। क्या आपको बर्गामो/ इटली में सैकड़ों ताबूतों की पंक्तियाँ याद हैं? जो झूठी खबर थी। इन खबरों को किस मंशा से फैलाया गया?

सोचिए, हम रोजाना बड़े ध्यान से सुनते हैं कि देश भर में सड़क हादसों में मरने वालों की संख्या कितनी है और कितने घायल हुए। जिस वजह से हम यात्रा करने से भी डरते हैं। संयोग से, 2019 में सड़क दुर्घटनाओं में भारतीयों की मृत्यु संख्या और 2020 कोरोना से मरने वालों की संख्या एक समान है। हम सभी जीवन को नहीं बचा सकते हैं। कुछ जोखिम हमारे बीच जीवित हैं।

यह भी पढ़ें: कोरोना महामारी ने 23 करोड़ भारतीयों को गरीबी में धकेला : रिपोर्ट

कुछ और भी सवाल हैं कि क्यों कई देशों ने डॉक्टरों को कोरोक्साइक्लोरोक्वीन के साथ कोरोना का इलाज करने की अनुमति नहीं दी? अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा किए अनुरोध के बाद भारत ने इसके निर्यात पर लगे पाबंदी को हटाने के कुछ दिनों बाद ही लेंसेट द्वारा एक लेख छापा गया कि “इस दवाई को लेने वाले मरीजों की संख्या में मृत्यु दर बढ़ा है”, लेकिन कुछ दिन बाद ही इस लेख को हटा दिया गया। क्योंकि यह खबर गलत थी, लेकिन इसने भ्रम पैदा कर दिया था।

क्यों कोरोना से होने वाली मृत्यु की परिभाषा को ‘कारण से’ नहीं जोड़ा जाता? एक मृत्यु को “कोरोना से या कोरोना के साथ” के रूप में ही गिना जाता है वह भी तब जब वह पॉजिटिव पाया जाता है, और चार हफ्ते बाद इलाज के दौरान मृत्यु हो जाती है तब। एक जर्मन डॉक्टर ने एक उदाहरण दिया: जब एक व्यक्ति को खबर मिली कि वह कोरोना पॉजिटिव है और तब वह खिड़की से बाहर भी कूद गया, तो उसे कोरोना के मृतकों में गिना जाता है।

हम सभी जीवन को नहीं बचा सकते हैं।(Pixabay)

सबसे बड़ा और सबसेमहत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्यों विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2009 में महामारी की परिभाषा में से मृत्यु और बीमार शब्द को हटा दिया था? इससे पहले, मृत और बीमार लोगों की एक बड़ी संख्या एक महामारी घोषित करने के लिए शर्त थी। 2009 से हमें यह पता है कि एक वायरस जल्दी से फैलता है। चाहे लोग मरें या बीमार हों, महामारी के लिए कोई मापदंड नहीं है। सुनने में अजीब है?

मार्च 2020 में, पहले से ही कई डॉक्टरों और वैज्ञानिकों नेयूट्यूब पर बताया कि कोरोना उतना खतरनाक नहीं है, और उनमें से कई वीडियो को बाद में हटा दिया गया। भारत में पहले 5 महीनों कम मामले और मौतें हुईं, भले ही मीडिया ने स्थिति को बदतर बनाने की पूरी कोशिश की। जब मुंबई में सबसे बड़ी झुग्गी धारावी में कई लोग संक्रमित थे, तो मीडिया ने इसे एक प्रलय का दिन बताया। धारावी को बंद कर दिया गया था, और यह कोई प्रलय नहीं था। बाद में मैंने पेपर में पढ़ा, कि धारावी की 57 प्रतिशत आबादी में एंटीबॉडीज उतपन्न हो गई है। इसका मतलब कि वह वायरस की चपेट में आए किन्तु किसी को पता ही नहीं चला और साथ ही इन लोगों में प्रतिरोधक क्षमता धारावी में असम्भव डिस्टेन्सिंग आई।

तो हमें इससे क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए? एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉ. नॉट विटकोव्स्की का दावा है कि वायरस के प्रसार को रोकने का प्रयास जैसे लॉकडाउन और मास्क केवल महामारी को लम्बा खींचते हैं और वायरस के खतरनाक विविधीकरण को भी जन्म देते हैं।

वैज्ञानिक गीर्ट वंडन बॉश ने WHO से एक अपील की है कि वह कृपया सामूहिक टीकाकरण को तुरंत रोकें। लेकिन यूरोपीय वैज्ञानिकों ने वैक्सीन के लिए आपातकालीन उपयोग की मंजूरी के लिए यूरोपीय न्यायालय में मामले दायर किए हैं और तत्काल सुनवाई के लिए कहा है। हम यह नहीं सुनाई देता कि टीका लेने के बाद कितने लोगों की मृत्यु हुई। यूरोप में ऐसे कई हैं।

(मारिया वर्थ द्वारा अंग्रेजी लेख का मुख्य अंश, हिंदी अनुवाद शान्तनू मिश्रा द्वारा।)

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बात करे उत्तराखंड राज्य कि तो यहा पर आमतौर पर ठाकुर और ब्राह्मण जाति ही सत्ता के केंद्र में रहती है, लेकिन अब समय बदल रहा है राजनीतिक दल भी दलितों को लुभाने का विशेष प्रयास कर रहे हैं। दरअसल, उत्तराखंड राज्य में 70 विधानसभा सीट आती है , जिसमें 13 सीट अनुसूचित जाति और 2 सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। मसला सिर्फ 13 आरक्षित सीट भर का ही नहीं है। उत्तराखंड राज्य के 17 प्रतिशत से अधिक दलित मतदाता 22 विधानसभा सीटों पर जीत-हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इसके साथ ही कुल 36 सीटों पर जीत हासिल करने वाली पार्टी राज्य में सरकार बना लेती है।

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