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इतिहास

भारत की अमर वीरांगना ‘हाड़ी रानी’!

आज हम एक ऐसी वीरांगना की गाथा को पढ़ेंगे जिन्होंने अपने पति को प्रेम बंधन से मुक्त करने के लिए स्वम का शीश रणभूमि में निशानी के तौर पर भेजा था।

हाड़ी रानी की वीरता को आज भी एक मिसाल के रूप में सुनाया जाता है।(फाइल फोटो)

‘भारत’ एक ऐसा देश है जहाँ महिलाओं को माँ दुर्गा के शक्ति के रूप में पूजा जाता है, जहाँ वीरांगनाओं ने अपने शौर्य के झंडे गाड़े हैं। उसी वीर भूमि भारत की एक और वीरांगना की गाथा आपके सामने लाया हूँ, जिन्होंने अपने पति को अपनी सौंदर्य से मोह भंग न हो, इसलिए अपना शीश रणभूमि में निशानी के तौर पर भिजवा दिया था। इन वीरांगना का नाम है ‘हाड़ी रानी’। जिनकी गाथा को आज भी एक शौर्य प्रतीक के रूप में सुनाया जाता है।

हाड़ी रानी बूंदी रियासत के हाड़ा सरदार की बेटी थीं, जिनका विवाह मेवाड़ के सलूम्बर ठिकाने के रावल रतन सिंह चूंडावत से हुआ था। रावल चूंडावत से महज एक सप्ताह ही विवाह को हुआ था, और इसी बीच रावल को राणा राज सिंह का मुग़ल शासक औरंगज़ेब के खिलाफ युद्धभूमि में उतरने का फरमान मिला। इस समय रानी के हाथों में लगी मेहंदी का रंग भी नहीं सूखा था, विवाह के प्रेम को पूर्ण रूप से भी नहीं जिया था और रावल को युद्ध भूमि में उतरने का पत्र प्राप्त हुआ। 


राणा राज सिंह ने पत्र में लिखा था कि “हे वीर! अविलंब अपनी सैन्य टुकड़ी को लेकर औरंगजेब की सेना को रोको। मुसलमान सेना उसकी(औरंगजेब) सहायता को आगे बढ़ रही है। इस समय औरंगजेब को मैं घेरे हुए हूं। उसकी सहायता को बढ़ रही फौज को कुछ समय के लिए उलझाकर रखना है ताकि वह शीघ्र ही आगे न बढ़ सके। तुम इस कार्य को बड़ी कुशलता से कर सकते हो। यह एक खतरनाक काम है और जान की बाजी भी लगानी पड़ सकती है। किन्तु, मुझे तुम पर भरोसा है।”

रावल का मन विचलित हो उठा था, किन्तु ‘कर्तव्य आगे भावनाओं का कोई महत्व नहीं’ यह बात भी हाड़ी रानी को भलीभांति ज्ञात थी। जिस वजह से रानी ने रावल को उनके कर्तव्य और देश भक्ति के भावनाओं को ज्ञात कराते हुए युद्धभूमि में उतरने की ऊर्जा भरी।

रावल रतन सिंह को औरंगज़ेब पर आक्रमण के लिए राणा राज सिंह सिंह फरमान मिला। (काल्पनिक चित्र, Unsplash)

रावल रतन सिंह युद्ध भूमि के लिए कूंच कर चुके थे, किन्तु उनका मन अब भी पत्नी मोह से नहीं हट पा रहा था और इसलिए वह बार-बार हाड़ी रानी को याद कर रहे थे। इसी बीच रावल ने अपने विश्वसनीय दूत को रानी की एक निशानी लाने के लिए पुनः महल भेजा। जब हाड़ी रानी ने दूत से उसके आने का कारण पूछा, तब रानी समझ गईं कि रावल मेरे प्रेम मोह से नहीं हट पाए हैं। किन्तु, युद्ध भूमि में प्रेम और मोह दोनों दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं। इसलिए रानी ने वह कदम उठाया जिसकी न तो रावल ने कल्पना की थी और न ही निशानी लेने आए दूत ने। रानी ने दूत से कहा कि मैं तुम्हे एक ऐसी निशानी सौंप रही हूँ, जो रावल तक सजे थाल में जाए और साथ ही एक खत भी दे रही हूँ। इतना कहते ही हाड़ी रानी ने खत लिखा और खत लिखने के तत्पश्चात ही अपने तलवार से अपने ही हाथों खुद का सर धड़ से अलग कर दिया और राजा को प्रेम बंधनों से मुक्त कर दिया। 

पत्र में लिखा था कि “स्वामी, मैं आपको अपनी अंतिम और प्रिय निशानी भेज रही हूं। आपको सभी बंधनों से मुक्त कर रही हूं। अब आप निर्भीक होकर अपने कर्तव्य का पालन करें। हमारा मिलन अब स्वर्ग में ही होगा।”

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रावल का दूत जिस समय रानी का शीश थाल में लाया उस समय रावल सन्न रह गए। उनके लिए अपनी मृत पत्नी का शीश देख पाना अमंभव हो रहा था। उन्होंने हाड़ी रानी को ऐसा करने पर कोसा, साथ ही खुद को भी कोसा कि क्यों वह युद्ध भूमि में आए। किन्तु जब रानी द्वारा लिखे खत को रावल में पढ़ा तब उन्हें अपने कर्तव्यों का ज्ञात हुआ। उन्होंने दुश्मनों को ही इस मृत्यु का दोषी माना और घायल मगर खूंखार सिंह की भांति मुग़ल सेना पर टूट पड़े। रावल के भीतर मानों हाड़ी रानी समा गई थीं जो अपने मृत्यु का प्रतिशोध मुग़लों से ले रही थीं। अंतिम क्षण तक रावल ने मुग़लों से लोहा लिया और उन्हें पीठ दिखाकर भागने पर मजबूर कर दिया। माना जाता है कि इस लड़ाई में विजय हाड़ी रानी की हुई थी और इसलिए हाड़ी रानी के लिए यह कविता बेहद प्रसिद्ध है जिसका एक अंश है कि-

‘ चूंडावत मांगी सैनाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी’ 

हाड़ी रानी के शौर्य के उपलक्ष में कई लोक-गीत और कविताएं प्रसिद्ध हैं, किन्तु आज के भावी भविष्य को न तो इस स्वर्ण इतिहास के विषय में ज्ञान है और न ही इस इतिहास को किसी भी किताबों में जगह मिली है। यही कारण है कि आज के युवाओं को मुग़लों की पुश्तें याद हैं किन्तु भारत के हिन्दू वीर-वीरांगनाओं के विषय में कोई ज्ञान नहीं।  

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8 जनवरी को चुनाव आयोग(Election Commission of India) द्वारा जारी के गए 5 राज्यों के विधान सभा चुनावों(Vidhan Sabha Election 2022) के तारिखों के ऐलान से चुनावी गहमा-गहमी चरम पर है। आपको बता दें कि वर्ष 2022 में 5 अहम राज्यों में विधान सभा चुनाव आयोजित होने जा रहे हैं। यह राज्य हैं उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड, गोवा एवं मणिपुर। साथ ही उत्तर प्रदेश(Uttar Pradesh) में होने जा रहे चुनाव को 7 चरणों में बांटा गया है, मणिपुर 2 चरणों में और गोवा, उत्तराखण्ड, पंजाब(Punjab) में चुनाव 1 चरण में आयोजित किया जाएगा। चुनाव तारीखों के घोषित होने बाद सभी राजनीतिक दल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं और हर वह हथकंडा अपना रहे हैं जिससे मतदाता आकर्षित हों। साथ ही अब यह भी संभावना अधिक है कि इस बीच चुनावी जमाखोरी बढ़ जाएगी।

पिछले चुनाव में पार्टियों ने कितना खर्च किया था?

आपको जानकारी के लिए बता दें कि 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करीब 5,500 करोड़ रूपये बड़ी पार्टियों द्वारा चुनाव अभियान में खर्च किए गए थे। साथ ही एक मीडिया रेपोर्ट के अनुसार 1000 करोड़ से अधिक पैसा मतदाताओं को पैसे से या शराब से लुभाने में खर्च किए गए थे। आपको यह भी बता दें कि 2017 में ही हुए 5 राज्यों में विधान सभा चुनाव में 1.89 अरब रूपये खर्च किए गए थे, जिसमें बाहरी खर्च कितना था इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है।

इसके साथ विधानसभा में चुनाव आयोग ने निर्धारित की खर्च सीमा प्रति उम्मीदवार 30 लाख तय किया है, किन्तु यह सभी जानते हैं कि इसका पालन नहीं होता है। बल्कि बाहरी खर्च और वोट के लिए नोट का इस्तेमाल कर बेहिसाब पैसा बहाया जाता है। सभी पार्टियां, पार्टी चंदे को भी चुनाव में होने वाले खर्च के लिए इस्तेमाल करती हैं। साथ ही टिकट बिक्री को भी चुनावी जमाखोरी में गिना जा सकता है। हालही में आम आदमी पार्टी के खुदके विधायक ने अरविन्द केजरीवाल पर करोड़ों रुपयों के बदले टिकट बेचने का आरोप लगाया है।
जैसा की आपको पता है कि इस साल होने वाले 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव सभी पार्टियों की नाक की बात बन गई है, जिस वजह से हर कोई अपने-अपने तरीके से लोगों को जुटाने में और चीजों को भुनाने में जुटा हुआ है। चाहे वह बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा हो या 'मैं लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ', किन्तु आज भी हम यह कह सकते हैं कि किसी भी प्रदेश ने महिलाओं की सुरक्षा का ठोस आश्वासन नहीं दिया है। इसी तरह भ्रष्टाचार और पैसों की जमाखोरी पर किसी भी सरकार को निर्दोष करार दे देना समझदारी का काम नहीं होगा। आपको बता दें कि एक समय ऐसा भी था जब समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव ने यह स्वीकारा था कि समाजवादी पार्टी के सरकार में भ्रष्टाचार होता था।

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(NewsGram Hindi)

देश के पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत(General Bipin Rawat) 13 अन्य लोगों के साथ 9 दिसम्बर के दिन कुन्नूर के पहाड़ियों में हुए भीषण हेलीकाप्टर क्रैश में शहीद हो गए थे, जिनमें उनकी पत्नी मधुलिका रावत भी शामिल थीं। इस घटना ने न केवल देश को आहत किया, बल्कि विदेशों में भी इस खबर की खूब चर्चा रही। देश के सभी बड़े पदों पर आसीन अधिकारी एवं सेना के वरिष्ठ अफसरों ने इस घटना पर शोक व्यक्त किया।

जनरल बिपिन रावत(General Bipin Rawat) भारतीय सेना में 43 वर्षों तक अनेकों पदों पर रहते हुए देश की सेवा करते रहे और जिस समय उन्होंने अपना शरीर त्यागा तब भी वह भारतीय सेना के वर्दी में ही थे। उनके निधन के बाद देश में शोक की लहर दौड़ पड़ी है। मीडिया रिपोर्ट्स में वह लोग जिनसे कभी जनरल बिपिन रावत मिले भी नहीं थे, उनके आँखों में भी यह खबर सुनकर अश्रु छलक आए। देश के सभी नागरिकों ने जनरल बिपिन रावत(General Bipin Rawat), उनकी पत्नी सहित 13 अफसरों की मृत्यु पर एकजुट होकर कहा कि यह देश के लिए बहुत बड़ी क्षति है। आपको बता दें कि जनरल रावत के नेतृत्व में भारतीय सेना ने अनेकों सफल सैन्य अभियानों अंजाम तक पहुँचाया, जिससे भारत का कद न केवल आतंकवाद के खिलाफ मजबूत हुआ, बल्कि इसका डंका विदेशों में भी सुना गया।

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(NewsGram Hindi)

बीते एक साल से जिन तीन कृषि कानूनों पर किसान दिल्ली की सीमा पर और देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे थे, उन कानूनों को केंद्र ने वापस लेने का फैसला किया है। आपको बता दें कि केंद्र के इस फैसले से उसका खुदका खेमा दो गुटों में बंट गया है। कोई इस फैसले का समर्थन कर रहा है, तो कोई इसका विरोध कर रहा है। किन्तु यह सभी जानते हैं कि वर्ष 2022 में 6 राज्यों में विधानसभा चुनाव 2022 आयोजित होने जा रहे हैं, जिनमें शमिल हैं उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल-प्रदेश, और गोवा। और यह चुनाव सीधे-सीधे भाजपा के लिए नाक का सवाल है, वह भी खासकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में।

उत्तर प्रदेश एवं पंजाब का चुनावी बिगुल, चुनाव से साल भर पहले ही फूंक दिया गया था। और अब केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानून पर लिए फैसले का श्रेय अन्य राजनीतिक दल लेने में जुटे हैं। विपक्ष में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को इस फैसले का ताज पहनाना चाहते हैं, तो कुछ विपक्षी दल अपने-अपने सर पर यह ताज सजाना चाहते हैं। मगर इन सभी का लक्ष्य एक ही है 'विधानसभा चुनाव 2022'।

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