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थोड़ा हट के

महामारी का तनाव दूर करने के लिए जल्द विजिट करें स्वीडन

सुरक्षित यात्रा करने के लिए इंतजार कर रहे लोगों के लिए स्वीडन में प्राकृतिक परिवेश वाली 15 सबसे आकर्षक जगहें हैं, जहां लोग प्रकृति के बीच रहने का शानदार अनुभव ले सकते हैं।

स्वीडन में ध्रुवीय ज्योति या नॉर्दर्न लाइट्स प्रकृति का नायाब अजूबा है। (Pixabay)

महामारी ने कई तरह के तनाव दिए हैं। ऐसे में इन तनावों से बाहर निकलने में प्रकृति से खासी मदद मिल सकती है। रिसर्च के मुताबिक, प्रकृति के बीच समय गुजारना न केवल तनाव को घटाने में मदद करता है, बल्कि आउटडोर बिताई गईं छुट्टियां मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को कई लाभ पहुंचाती हैं। स्वीडन, जहां का 70 प्रतिशत हिस्सा जंगल से ढंका है, वहां प्रकृति के करीब रहना आसान है। यहां आने वाले लोगों को खेत, घास के मैदान, जंगल, शांत झील, कई मील लंबे समुद्र तट और हजारों द्वीपों के साथ प्रकृति से सीधे रूबरू होने का मौका मिलता है। सुरक्षित यात्रा करने के लिए इंतजार कर रहे लोगों के लिए स्वीडन में प्राकृतिक परिवेश वाली 15 सबसे आकर्षक जगहें हैं, जहां लोग प्रकृति के बीच रहने का शानदार अनुभव ले सकते हैं।

लंबे समय से अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रकृति के बीच समय बिताने की बात की जा रही है। शोध के अनुसार, बाहर रहने से नकारात्मक भावनाएं और तनाव कम होता है। बल्कि स्वीडन की पहल ‘द 72 आवर केबिन’ के सकारात्मक प्रभाव तो परीक्षणों में साबित हो चुके हैं, जिसमें विभिन्न शहरों के ऐसे प्रतिभागी शामिल थे, जिनकी नौकरियां बहुत तनाव वाली थीं।


स्वीडन देश की राजधानी और ख़ूबसूरत शहर स्टॉकहोम। (Pixabay)

नतीजों को जानने के लिए स्वीडिश के बाहरी इलाके में पानी के बगल में कांच के केबिन में तीन दिन तक लगातार सोने के पहले और बाद में इन लोगों की जांच की गई थी।

धीरे-धीरे यात्राएं शुरू होने के साथ ही लोग महामारी के कारण आए तनाव को दूर करने के लिए ऐसी जगहें ढूंढ रहे हैं, जहां समय बिताकर वे खुद को संतुलित कर सकें।

ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि प्रकृति से एक असामान्य रिश्ता जोड़ने के लिए स्वीडन से बेहतर कोई जगह है। खासकर अल फ्रेस्को में समय बिताने के लिए लोग दुनिया के हर हिस्से से आते हैं। देश भर में कई स्थानों पर विशेषज्ञ लोग प्रकृति का अद्वितीय अनुभव देने और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए बाहर खाना पकाने, लंबी पैदल यात्रा करने, कैनोइंग और माउंटेन बाइकिंग जैसी कई गतिविधियां कराते हैं।

यह भी पढ़ें: भातीय छात्र ने कोरोना काल में हासिल किए 20 इंटरनेशनल रिसर्च ऑफर

स्वीडन के केरोलिस्का इंस्टीट्यूट के एजिंग रिसर्च सेंटर की रिसर्चर सीसिलिया स्टेनफोर्ड कहती हैं, “हमारे समाज में स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करने के लिए प्राकृतिक वातावरण एक महत्वपूर्ण संसाधन है। शोध से पता चलता है कि बाहर बिताया गया समय नकारात्मक भावनाओं और तनाव को कम करता है और यह सकारात्मक भावनाओं, मानसिक स्वास्थ्य में सुधार और प्रदर्शन को बढ़ाता है।”

इतना ही नहीं पूवी एंग्लिया यूनिवर्सिटी के मुताबिक हरियाली रक्तचाप, कोर्टिसोल और हृदय गति को कम करती है।(आईएएनएस)

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एप्पल वॉच,सांकेतिक चित्र (Pixabay)

एक नए अध्ययन से जानकारी समाने आया है कि एप्पल वॉच सीरीज 6 'नियंत्रित परिस्थितियों में फेफड़ों की बीमारियों के रोगियों में हृदय गति और ऑक्सीजन संतृप्ति (एसपीओ2) प्राप्त करने का एक विश्वसनीय तरीका है।'

जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट में प्रकाशित अध्ययन ने 9टू5मैक की रिपोर्ट 'एप्पल वॉच डिवाइस कमर्शियल ऑक्सीमीटर के बीच मजबूत सकारात्मक सहसंबंध' देखा गया है।

ऐप्पल वॉच या वाणिज्यिक ऑक्सीमीटर उपकरणों में त्वचा के रंग, कलाई की परिधि, कलाई के बालों की उपस्थिति और एसपीओ 2 के लिए तामचीनी कील और हृदय गति माप के मूल्यांकन में कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं था।

साओ पाउलो विश्वविद्यालय की ओर से अध्ययन एक आउट पेशेंट न्यूमोलॉजी क्लिनिक से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और इंटरस्टिशियल लंग डिजीज के 100 रोगियों के साथ किया गया।

इसने ऐप्पल वॉच सीरीज 6 के साथ एसपीओ 2 और हृदय गति डेटा एकत्र किया और उनकी तुलना दो वाणिज्यिक पल्स ऑक्सीमीटर से की।

परीक्षण स्वस्थ व्यक्तियों, इंटरस्टीशियल लंग डिजीज और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज वाले लोगों के साथ किए गए थे।

oximeter, corona virus, covid 19 कोरोना काल में ऑक्सीमीटर का सबसे अधिक उपयोग किया गया है।(Pixabay)

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बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार। (Twitter, Nitish Kumar)

जातीय जनगणना को लेकर बिहार में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के दो बडे दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल (युनाइटेड) अब सीधे तौर पर आमने-सामने नजर आने लगे हैं। केंद्र की भाजपा नीत राजग सरकार जहां जाति आधारित जनगणना कराने से इंकार कर रही है वहीं जदयू के नेता नीतीश कुमार इस मामले को लेकर विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ मुखर हैं। ऐसे में कयास लगाया जाने लगा है कि क्या फिर से बिहार की सियासी समीकण बदलेंगे। हालांकि इस मुद्दे को लेकर कोई भी नेता अब तक खुलकर बात नहीं कर रही है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिल्ली में रविवार को स्पष्ट कर चुके हैं कि जाति जनगणना देश के लिए जरूरी है। उन्होंने दिल्ली में कहा कि केंद्र सरकार को जातिगत जनगणना करानी चाहिए। इसके कई फायदे हैं।

उन्होंने कहा कि आजादी के पहले जनगणना हुई थी, आजादी के बाद नहीं हुई। जातीय जनगणना होगी तभी लोगों के बारे में सही जानकारी होगी। तब पता चलेगा कि जो पीछे है, उसे आगे कैसे किया जाए। जातीय के साथ उपजातीय जनगणना भी कराई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि इसको लेकर एक बार फिर राज्य में सभी दलों के साथ बैठक कर आगे का निर्णय लेंगे। नीतीश के इस बयान के बाद तय है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जातिगत जनगणना के मामले में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इधर, भाजपा के नेता इसमें व्यवहारिक दिक्कत बता रहे हैं।

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और सांसद सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि तकनीकी और व्यवहारिक तौर पर केंद्र सरकार के लिए जातीय जनगणना कराना संभव नहीं है। इस बाबत केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार अगर चाहे तो वे जातीय जनगणना कराने के लिए स्वतंत्र है।


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अगरबत्ती उपयोग पर त्रिपुरा अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने का संभव कोशिश कर रहा है। (Unsplash)

अगरबत्ती उपयोग पर त्रिपुरा अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने का संभव कोशिश कर रहा है, जिसे पहले वियतनाम और चीन द्वारा नियंत्रण किया जा रहा था। त्रिपुरा इंडस्ट्रियल विकास निगम के अधिकारियों के अनुसार राज्य में बांस की छड़ियों का उत्पादन में भारी गिरावट आई है 2010 में 29,000 मीट्रिक टन से गिरकर 2017 में 1,241 मीट्रिक टन हो गया था, क्योंकि भारत कि प्रतिवर्ष 70,000 (96 प्रतिशत) मीट्रिक टन गोल बास की छड़ियां (46प्रतिशत) वियतनाम और (47 प्रतिशत) चीन द्वारापूरी की जा रही थी।

टीआईडीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि 2019 में, केंद्र सरकार ने सीमा शुल्क 25 प्रतिशत बढ़ा दिया और बांस के उत्पादों को प्रतिबंधित सूची में शामिल कर दिया गया, जिससे दूसरे देशों के लिए समस्या उत्पन्न हुई। वर्तमान में, पूर्वोत्तर राज्य 2,500 मीट्रिक टन बांस की छड़ें पैदा कर रहा है और आने वाले कुछ वर्षों में उत्पादन (12,000 मीट्रिक टन) पढ़कर हो जाएगा, क्योंकि आधुनिक मशीनों के साथ 14 और नई बांस की छड़ें निर्माण इकाइयां जल्द ही पूरे राज्य में आ जाएंगी।उन्होंने कहा, पहले त्रिपुरा के कारीगर हाथ से बांस की छड़ें बनाते थे ,परंतु कुछ साल पहले सरकार ने उनकी अनुकूल मशीन खरीदने में सहायता की।

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