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इतिहास

दुर्गावती देवी की वीर गाथा

भारत की आजादी मे दुर्गा भाभी ने दिया था महत्वपूर्ण योगदान।

क्रांतिकारी दुर्गावती देवी (wikimedia commons)

हिंदुस्तान की भूमि पर कई साहसी और निडर लोगों का जन्म हुआ जिन्होने भारत की आजादी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। लेकिन दुःख की बात यह है कि इनका नाम इतिहास के पन्नों में इतनी बार दर्ज नहीं हुआ जितना होना चाहिए था। ऐसी ही एक वीरांगना का नाम है दुर्गावती देवी। इन्हें दुर्गा भाभी के नाम से भी जाना जाता है। यह उन महिलाओं में से एक थी जिन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ क्रांति में भाग लिया था।

दुर्गा भाभी का जन्म 7 अक्टूबर 1907 में उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में हुआ था। इनका जन्म छोटी उम्र में ही भगवती वोहरा जी के साथ हुआ। भगवती वोहरा का परिवार लाहौर का प्रतिष्ठित परिवार था। दुर्गावती के पति भी क्रांति में पुरजोर तरीके से भाग लेना चाहते थे। लेकिन पिता के दबाव के कारण ऐसा कर नहीं पा रहे थे। पिता का देहांत होने के बाद भगवती जी ने भी क्रांति में भाग लिया था।


दुर्गवती देवी और उनके पति ने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन की स्थापना में अपना योगदान दिया था। दुर्गावती को अपने पिता और ससुर से कुछ रुपए मिले हुए थे जो कि इन्होने संभाल के रखे थे। उन रुपयों को दुर्गा भाभी ने क्रांतिकारियों को हथियार उपलब्ध कराने में खर्च कर दिए थे। दुर्गा भाभी क्रांतिकारियों को अपने घर में भी छिपा लेती थी।

1928 में भगत सिंह और राजगुरु ने सौंडर्स की हत्या कर दी थी। जिसके बाद से अंग्रेजी पुलिस इनके पीछे लग गई थी। पुलिस से बचने के लिए इन्होंने लाहौर छोड़ने का फैसला किया था। तब भगत सिंह ने एक अंग्रेज का भेस धारण किया और अपने बाल कटवा लिए थे। दुर्गा भाभी भगत सिंह की पत्नी बनी और दुर्गा भाभी का बेटा दोनों का बेटा बना था, और राजगुरु उनके सेवक बने थे।

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जब भगत सिंह को जेल में बंद किया गया था तब दुर्गा भाभी और उनके पति ने भगत सिंह को बाहर निकालने के बहुत प्रयास किए थे लेकिन वह असफल रहे। दुर्गा भाभी को हथियार चलाने भी आते थे। उन्होंने कई बार अंग्रेज अधिकारियों को निशाना बनाने की कोशिश करी थी। धीरे-धीरे इनके साथियों की मृत्यु होती गई और यह अकेली रह गई। इन्होंने कांग्रेस के लिए कुछ समय काम किया लेकिन इनकी विचारधारा न मिलने के कारण दुर्गा भाभी ने कांग्रेस को छोड़ दिया था।

दुर्गा भाभी ने लखनऊ में एक विद्यालय भी बनवाया था। यह विद्यालय कम बच्चों के साथ शुरू किया गया था। एक लंबा समय अकेले गुज़ारने के बाद दुर्गावती की मृत्यु 15 अक्टूबर 1999 को हुई थी।

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