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ओपिनियन

​विदेशों में किन-किन कठिनाइयों का सामना करते हैं भारतीय?

11 देशों में 5 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीय, लेकिन विदेशों में नस्लवाद की घटनाओं में प्रवासी भारतीय ही अधिक पीड़ित!

(NewsGram Hindi)

"प्रवासी भारतीय", जब भी यह शब्द हम लोग सुनते हैं तो हमारे जहन में क्या आता है? यही कि हमारे देश भारत के बाहर बसे भारतीय। वास्तव में, प्रवासी भारतीय का मतलब क्या होता है, आज हम आपको बताएंगे और वह लोग विदेशों में किस स्थिति का सामना कर अपना जीवन यापन करते हैं यह भी बताएंगे।

प्रवासी भारतीय का आशय होता है उन भारतवासियों से जो अपने कर्तव्य के कारण देश को छोड़ दूसरे देशों में निवास करते हैं और वहां की आर्थिक व राजनीतिक दशा व दिशा को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां उनकी आर्थिक, शैक्षणिक व व्यावसायिक दक्षता का आधार काफी मजबूत है। वे विभिन्न देशों में रहते हैं, अलग भाषा बोलते हैं परन्तु वहां के विभिन्न क्रियाकलापों में अपनी महती भूमिका निभाते हैं। प्रवासी भारतीयों को अपनी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने के कारण ही साझा पहचान मिली है और यही कारण उन्हें भारत से जोड़े रखता है। वह विश्व के अनेक देशों में फैले हुए हैं जिनकी जनसंख्या करीब 2 करोड़ है। इनमें से 11 देशों में 5 लाख से ज्यादा प्रवासी भारतीय वहां की औसत जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो कि प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व की बात है।


जरा सोचिए कि अमेरिका और कनाडा जैसे पश्चिमी देशों में जहां पर नस्लीय भेदभाव इतना प्रभावी है वहां हमारे प्रवासी भारतीय कैसे रहते होंगे? उनको कैसी-कैसी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता होगा। कभी-कभी तो नस्ली भेदभाव के कारण उनको अपनी जान भी गंवानी पड़ जाती है। विदेश मंत्रालय के पास उपलब्ध सूचना के आधार पर लोकसभा में सरकार ने प्रवासी भारतीयों पर हमलों की जानकारी दी थी लेकिन हमलों की प्रकृति या हमलों के पीछे के कारण का उल्लेख नहीं किया गया था। सरकार की तरफ से जो जानकारी दी गई थी उसके अनुसार, 2018 से 2020 के बीच विदेशों में रह रहे भारतीयों पर हमले के कुल 94 मामले सामने आए।

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संयुक्त राज्य अमेरिका में 2018 में भारतीयों पर हमले के 10 मामले दर्ज किए गए, इसके बाद 2019 में 5 घटनाएं और 2020 में एक घटना हुई। देश में लगभग 12.8 लाख एनआरआई आबादी है। आयरलैंड में वर्ष 2018 में भारतीयों पर 14 हमले हुए और 2019 में 4 और साल 2020 में 6 हमले हुए। देश में करीब 15,000 एनआरआई हैं। इसके अलावा पोलैंड मैं 8, कनाडा में 6 एवं फ्रांस में 5 मामले सामने आए थे। भारतीयों के हमले के मामले में पश्चिमी देश ही नहीं अपितु अफ्रीकी देश भी शामिल हैं इथियोपिया मेंं 2018 में भारतीयों पर हमले के पांच मामले सामने आए, जो 2019 में बढ़कर 11 हो गए। पिछले साल इस देश से हमले का सिर्फ एक मामला सामने आया था। दक्षिण अफ्रीका में जैकब जुमा की गिरफ्तारी के बाद से भारतीयों पर हमले और लूटपाट के मामले बहुत बढ़ गए थे जिसका रिकॉर्ड अभी तक सामने नहीं आया है।

Racism, Migrant Indians, Indians in Abroad प्रवासी भारतीय नस्लवाद का शिकार सबसे अधिक होते हैं।(Unsplash)

पश्चिमी देशों में नस्लवाद के कारण भारतीय एवं अफ्रीकी लोगों को वहां का पुलिस प्रशासन और श्वेत द्वारा अपमानित होना पड़ता है। कुछ महीने पहले हुई छात्रा रश्मि सामंत के साथ हुई घटना से भी आप इसे समझ सकते हैं। रश्मि सामंत हावर्ड यूनिवर्सिटी की महिला स्टूडेंट प्रेसिडेंट थी जो एक भारतीय है। रश्मि के जीत का जश्न ठीक से खत्म भी नहीं हुआ था कि रश्मि ने स्टूडेंड यूनियन प्रेसीडेंट पद से इस्तीफा देकर सभी को चौंका दिया था। दरअसल रश्मि एक भारतीय हैं और वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट प्रेसिडेंट बन गई जिसके कारण वहां के कुछ लोगों को यह बात पसंद नहीं आई इसलिए उन्होंने रश्मि को हटाने के लिए एक प्रोपेगेंडा चला दिया जिसमें उन्हें यहूदी विरोधी सहित कई घटनाओं से जोड़ा गया। अंततः जब जांच हुई तो सच सबके सामने आ गया। अब आप लोग खुद ही सोच सकते हैं कि रश्मि के साथ ऐसा बर्ताव क्यों हुआ? वह इसलिए क्योंकि वह केवल एक भारतीय हैं। इसमें उनकी हिंदू पहचान के साथ ही उनके रंग पर भी मजाक उड़ाया गया था।

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रश्मि जैसी एक घटना ही नहीं है, ना जाने ऐसी कितनी घटना होगी जो अभी तक मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चित नहीं हुई है इसके अलावा विकसित देश के श्वेत लोग अक्सर हमारे महापुरुष जैसे महात्मा गांधी की प्रतिमाओं के साथ भी खिलवाड़ किया करते हैं तो आप अब इस स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं कि वह लोग जो हमारे महापुरुष की प्रतिमा के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं तो हमारे भारतीयों की स्थिति क्या होती होगी। अंत में बस इतना ही कहूंगा कि किसी भी विकसित देश में रंग रूप के हिसाब से भेदभाव यदि किया जाता है तो उसका विकसित होना व्यर्थ रहता है।

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आईआईटी-कानपुर के प्रोफेसर बृजभूषण के मुताबिक, यह इस जियॉन तकनीक को सॉफ्वेयर में तैयार किया जाएगा। यह बच्चों की उम्र के हिसाब से होगा। पांच साल के बच्चों से यह शुरू होगी और इससे अधिक उम्र तक तक जारी रहेगी। ऑटिज्म की समस्या से जूझ रहे बच्चों के लिए भावों को समझाने की सरल तकनीक विकसित की जा रही है। इससे वह माता, पिता और घर के अन्य सदस्यों से मिल सकेंगे।

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