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इतिहास

यह है वीर गाथा ‘तक्षक’ की

'तक्षक' कन्नौज के राजा नागभट्ट द्वितीय के अंग रक्षक थे और उनके शौर्य के किस्से हर तरफ सुनाई दे रहे थे। तक्षक ने अरब से हुई युद्ध में वीरगति को गले लगा लिया था।

तक्षक ही वह योद्धा थे जिन्होंने समस्त अरबी सेना को धुल चटाया था। (काल्पनिक चित्र, Pixabay)

“तलवारों पर क्षत्रिय खून आग उगल रहें हैं, देखो उस ज्वाल में कितने मुग़ल जल रहे हैं”

ऐसे ही एक वीर की कहानी दोहराने जा रहा हूँ, एक ऐसी गाथा से आपको परिचित कराने जा रहा हूँ जिसे आज के आधुनिक युग ने भुला दिया है। यह गाथा है शौर्य एवं अतुल्य बलिदान कि, यह गाथा है ‘तक्षक’ की। 


महज़ 8 वर्ष के बालक ने अपने पिता को खोया और साथ ही साथ अपनी माँ और दोनों बहनों को भी खो दिया। तक्षक के पिता सिंधु नरेश दाहिर के सैनिक थे जो मौहम्मद बिन कासिम की सेना साथ हुए युद्ध में वीरगति पा चुके थे। इस युद्ध के बाद अरब सेना ने मानो कहर बरसा दीया हो। कासिम के अभियान में युवा आयु वाले एक भी व्यक्ति को जिन्दा नहीं छोड़ा और न जाने कितने ही मंदिर व मठों को तोड़ दिया गया। 

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वह 8 वर्ष का अनाथ बच्चा अब 32 वर्ष का पुरुष हो चुका था और तो और कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का अंगरक्षक था। तक्षक के मन में कहीं न कहीं बदला छुपा था अपनी माँ व बहनों का बदला अपने पिता का बदला मगर सनातन नियमों को पालन करना उसका पहला कर्तव्य था। 

अरब सैनिक कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे मगर हर बार मुँह की खा कर लौट गए थे, यह इसलिए कि कन्नौज की सेना एक विशाल सेना थी और तक्षक जैसे शूरवीरों से लदी हुई थी। यही कारण था कि हर बार राजपूती योद्धा उन्हें खदेड़ देते किन्तु ‘सनातन नियमों’ का पालन करते हुए नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते। यह युद्ध और हराने का सिलसिला 15 वर्षों से हो रहा था।  

कुछ ही समय पूर्व एक गुप्तचर ने सुचना दी कि अरब के ‘खलीफा’ से सहयोग लेकर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण करने के लिए चल पड़ी है और लगभग दो से तीन दिन में कन्नौज की सीमा पर होगी, इसी विषय पर महाराज की सभा लगी थी। 

नागभट्ट उन राजाओं में से थे जो अपने सभी सेनानायकों का विचार लेकर ही कोई निर्णय लेते थे और आज भी  सेनानायकों से उनका मत पूछा गया। सबको सुनने के बाद  तक्षक- बोले “महाराज, इस बार उन निर्दयी प्राणियों  को उन्ही भाषा में उत्तर देना होगा।” महाराज ने कुछ सोचा और तक्षक को बोले- “अपनी बात साफ़ साफ कहो तक्षक, कई चेहरे दुविधा में दिख रहें हैं।”

तक्षक ने कहा “महाराज अरब सैनिक बहुत क्रूर हैं, हम सनातन नियमों को ताक पर रख कर उन अरबियों को उन्ही की शैली में मुँह तोड़ जवाब देंगे।”

तक्षक के ऐसा कहते ही सभा में हलचल हो पड़ी और महाराज बोले “हम धर्म और मर्यादा को नहीं छोड़ सकते तक्षक”

तक्षक ने गर्जना के साथ कहा “मर्यादा, उन्ही के साथ निभानी चाहिए जिन्हे उसका मोल पता हो और ,महाराज, यह सभी तो राक्षस हैं इन्हे सिर्फ माँ बेटियों की चीखों और बच्चों को तड़पाने में ही आनंद मिलता है। इन सभी के लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है। 

देवल एवं मुल्तान के युद्ध को याद करें महाराज, जब कासिम ने दाहिर को पराजित करने के उपरांत प्रजा पर कितना अत्याचार किया था।  

अगर हम नियमों की लाज रखने के लिए इन राक्षसों को छोड़ देंगे, मुझे भय है की सिर्फ चीखें ही चुने देंगी।”

तक्षक के तर्कों और सभी के सहमति का भाव पढ़कर महाराज अपने मुख्य सेनापतियों, मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभा कक्ष की और बढ़ गए। अगले ही दिन कि संध्या तक कन्नौज की पश्चिमी सीमा पर दोनों सेनाओं का आगमन हो चूका था और सभी को लग रहा था की अगला सवेरा एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा। 

मगर, आधी रात को जब अरबी सेना निश्चिन्त हो कर सो रही थी तभी तक्षक के नेतृत्व में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर बरस पड़ी। 

अचानक हुए हमले की न तो किसी ने उम्मीद की थी और न ही तयारी, वह क्या सावधान होते और क्या हथियार संभालते इससे पहले ही आधे अरब राजपूती नरसिंहों का शिकार बन चके थे। उस रात्रि और अंधेरे ने तक्षक के शौर्य को अपनी आँखों से देखा था, तक्षक जिस तरफ मुद जाते उसी तरफ भूमि रक्तरंजित हो जाती, तक्षक उस समय उस सिंह की तरह शिकार कर रहे थे जो कई दिनों या वर्षों से भूखा था। सूर्यउदय से पहले ही अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी।

सुबह बची हुई सेना पीछे भागी, किन्तु महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ तैयार खड़े थे और दोपहर होते होते समूची अरब सेना को काट डाला गया। जिन अरबियों ने विश्वविजय का स्वप्न देखा था उन्हें यह उत्तर पहली बार मिला था। 

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महाराज ने विजय के बाद सभी सेना नायकों की तरफ देखा मगर उनमे तक्षक नहीं दिखाई दिए। तक्षक की खोज किए जाने का आदेश मिलते ही सभी सैनिकों ने खोज अभियान शुरू कर दिया। लगभग हज़ार अरब मृत सैनिकों के बीच तक्षक के मृत शरीर का तेज चरों दिशाओं को रौशन कर रहा था। 

अपने वीर योद्धा को मृत देखने के बाद महाराज नागभट्ट ने अपनी तलवार तक्षक के चरणों में रखा और उस मृत शरीर को प्रणाम किया। 

तक्षक की यह गाथा शौर्य और बुद्धिमानी का एक अकल्पनीय मेल है। 

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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