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आजादी की लड़ाई में गोरक्षपीठ की भी महती भूमिका रही है। जिस दौरान गांधी जी की अगुवाई में आजादी का आंदोलन चरम पर था। उस समय पीठ में मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दादा गुरु ब्रह्मलीन दिग्वजयनाथ (बचपन का नाम नान्हू) का गोरखनाथ मंदिर में आगमन हो चुका था। मूलत: वह चित्तौड़ (मेवाड़) के रहने वाले थे। वही चित्तौड़ जहां के महाराणा प्रताप आज भी देश प्रेम के जज्बे और जुनून की मिसाल हैं। जिन्होंने अपने समय के सबसे शक्तिशाली मुगल सम्राट अकबर के सामने घुटने टेकने की बजाय घास की रोटी खाना पसंद किया। हल्दीघाटी में जिस तरह उन्होंने अपने सीमित संसाधनों के साथ अकबर की फौज का मुकाबला किया, वह खुद में इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। आज भी हर राष्ट्रप्रेमी के लिए मिसाल है।


चित्तौड़ की माटी की तासीर का असर दिग्विजयनाथ पर भी था। अपने विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने मंदिर प्रागंण में अपने धर्म का प्रचार कर रहे इसाई समुदाय को मय तंबू-कनात जाने को विवश कर दिया। उस समय गांधीजी की अगुआई में पूरे देश में कांग्रेस की आंधी चल रही थी। दिग्विजयनाथ भी इससे अछूते नहीं रहे। उन्होंने जंगे आजादी के लिए जारी क्रांतिकारी आंदोलन और गांधीजी की अगुआई में जारी शांतिपूर्ण सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ गोरक्षनाथ मंदिर में पूजा करते हुए।(Twitter)

एक ओर जहां उन्होंने समकालीन क्रांतिकारियों को संरक्षण, आर्थिक मदद और अस्त्र-शस्त्र मुहैया कराया। वहीं गांधीजी की अगुआई में चल रहे असहयोग आंदोलन के लिए स्कूल का परित्याग कर दिया। चौरीचौरा कांड (चार फरवरी 1922) के करीब साल भर पहले आठ फरवरी 1921 को जब गांधीजी का पहली बार गोरखपुर आगमन हुआ था, वह रेलवे स्टेशन पर उनके स्वागत और सभा स्थल पर व्यवस्था के लिए अपनी टोली स्वयं सेवक दल के साथ मौजूद थे। नाम तो उनका चौरीचौरा कांड में भी आया था, पर वह ससम्मान बरी हो गये। देश के अन्य नेताओं की तरह चौरीचौरा घटना के बाद गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन के वापस लेने के फैसले से वह भी असहमत थे। बाद के दिनों में गांधीजी द्वारा मुस्लिम लीग को तुष्ट करने की नीति से उनका कांग्रेस और गांधी से मोह भंग होता गया। इसके बाद उन्होंने वीर सावरकर और भाई परमानंद के नेतृत्व में गठित अखिल भारतीय हिंदू महासभा की सदस्यता ग्रहण कर ली।

कई दशकों से गोरखपुर मंदिर को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार गिरीश पांडेय कहते हैं कि, “महाराण प्रताप से वह कितने प्रभावित थे। इसका सबूत 1932 में उनके द्वारा स्थापित महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद है। इस परिषद का नाम महाराणा प्रताप रखने के पीछे यही मकसद था कि इसमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों में भी देश के प्रति वही जज्बा, जुनून और संस्कार पनपे जो प्रताप में था। इसमें पढ़ने वाले बच्चे प्रताप से प्रेरणा लें। उनको अपना रोल मॉडल मानें।”

उन्होंने कहा कि अब चौरीचौरा के जरिए गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी वहीं कर रहे हैं। चौरीचौरा की शताब्दी पर 4 फरवरी से साल भर चलने वाले इस कार्यक्रम के जरिए मुख्यमंत्री चाहते हैं कि देश पर खुद को कुर्बान करने वाले मां भारती के जाबांज सपूतों को भावी पीढ़ी जाने और उनसे प्रेरणा लें।
(आईएएनएस)
 

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एप्पल वॉच,सांकेतिक चित्र (Pixabay)

एक नए अध्ययन से जानकारी समाने आया है कि एप्पल वॉच सीरीज 6 'नियंत्रित परिस्थितियों में फेफड़ों की बीमारियों के रोगियों में हृदय गति और ऑक्सीजन संतृप्ति (एसपीओ2) प्राप्त करने का एक विश्वसनीय तरीका है।'

जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट में प्रकाशित अध्ययन ने 9टू5मैक की रिपोर्ट 'एप्पल वॉच डिवाइस कमर्शियल ऑक्सीमीटर के बीच मजबूत सकारात्मक सहसंबंध' देखा गया है।

ऐप्पल वॉच या वाणिज्यिक ऑक्सीमीटर उपकरणों में त्वचा के रंग, कलाई की परिधि, कलाई के बालों की उपस्थिति और एसपीओ 2 के लिए तामचीनी कील और हृदय गति माप के मूल्यांकन में कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं था।

साओ पाउलो विश्वविद्यालय की ओर से अध्ययन एक आउट पेशेंट न्यूमोलॉजी क्लिनिक से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और इंटरस्टिशियल लंग डिजीज के 100 रोगियों के साथ किया गया।

इसने ऐप्पल वॉच सीरीज 6 के साथ एसपीओ 2 और हृदय गति डेटा एकत्र किया और उनकी तुलना दो वाणिज्यिक पल्स ऑक्सीमीटर से की।

परीक्षण स्वस्थ व्यक्तियों, इंटरस्टीशियल लंग डिजीज और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज वाले लोगों के साथ किए गए थे।

oximeter, corona virus, covid 19 कोरोना काल में ऑक्सीमीटर का सबसे अधिक उपयोग किया गया है।(Pixabay)

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बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार। (Twitter, Nitish Kumar)

जातीय जनगणना को लेकर बिहार में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के दो बडे दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल (युनाइटेड) अब सीधे तौर पर आमने-सामने नजर आने लगे हैं। केंद्र की भाजपा नीत राजग सरकार जहां जाति आधारित जनगणना कराने से इंकार कर रही है वहीं जदयू के नेता नीतीश कुमार इस मामले को लेकर विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ मुखर हैं। ऐसे में कयास लगाया जाने लगा है कि क्या फिर से बिहार की सियासी समीकण बदलेंगे। हालांकि इस मुद्दे को लेकर कोई भी नेता अब तक खुलकर बात नहीं कर रही है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिल्ली में रविवार को स्पष्ट कर चुके हैं कि जाति जनगणना देश के लिए जरूरी है। उन्होंने दिल्ली में कहा कि केंद्र सरकार को जातिगत जनगणना करानी चाहिए। इसके कई फायदे हैं।

उन्होंने कहा कि आजादी के पहले जनगणना हुई थी, आजादी के बाद नहीं हुई। जातीय जनगणना होगी तभी लोगों के बारे में सही जानकारी होगी। तब पता चलेगा कि जो पीछे है, उसे आगे कैसे किया जाए। जातीय के साथ उपजातीय जनगणना भी कराई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि इसको लेकर एक बार फिर राज्य में सभी दलों के साथ बैठक कर आगे का निर्णय लेंगे। नीतीश के इस बयान के बाद तय है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जातिगत जनगणना के मामले में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इधर, भाजपा के नेता इसमें व्यवहारिक दिक्कत बता रहे हैं।

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और सांसद सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि तकनीकी और व्यवहारिक तौर पर केंद्र सरकार के लिए जातीय जनगणना कराना संभव नहीं है। इस बाबत केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार अगर चाहे तो वे जातीय जनगणना कराने के लिए स्वतंत्र है।


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अगरबत्ती उपयोग पर त्रिपुरा अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने का संभव कोशिश कर रहा है। (Unsplash)

अगरबत्ती उपयोग पर त्रिपुरा अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने का संभव कोशिश कर रहा है, जिसे पहले वियतनाम और चीन द्वारा नियंत्रण किया जा रहा था। त्रिपुरा इंडस्ट्रियल विकास निगम के अधिकारियों के अनुसार राज्य में बांस की छड़ियों का उत्पादन में भारी गिरावट आई है 2010 में 29,000 मीट्रिक टन से गिरकर 2017 में 1,241 मीट्रिक टन हो गया था, क्योंकि भारत कि प्रतिवर्ष 70,000 (96 प्रतिशत) मीट्रिक टन गोल बास की छड़ियां (46प्रतिशत) वियतनाम और (47 प्रतिशत) चीन द्वारापूरी की जा रही थी।

टीआईडीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि 2019 में, केंद्र सरकार ने सीमा शुल्क 25 प्रतिशत बढ़ा दिया और बांस के उत्पादों को प्रतिबंधित सूची में शामिल कर दिया गया, जिससे दूसरे देशों के लिए समस्या उत्पन्न हुई। वर्तमान में, पूर्वोत्तर राज्य 2,500 मीट्रिक टन बांस की छड़ें पैदा कर रहा है और आने वाले कुछ वर्षों में उत्पादन (12,000 मीट्रिक टन) पढ़कर हो जाएगा, क्योंकि आधुनिक मशीनों के साथ 14 और नई बांस की छड़ें निर्माण इकाइयां जल्द ही पूरे राज्य में आ जाएंगी।उन्होंने कहा, पहले त्रिपुरा के कारीगर हाथ से बांस की छड़ें बनाते थे ,परंतु कुछ साल पहले सरकार ने उनकी अनुकूल मशीन खरीदने में सहायता की।

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