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टीपू सुल्तान का मंदिर उपहार देने के पीछे का ‘छुपाया गया’ सच

टीपू ने श्रृंगेरी मठ को क्यों दान में दिया था? उसके पीछे की मंशा को संदीप बालकृष्ण ने अपने लेख में साफ़ किया है। अगर वह हिन्दुओं का हितैषी था तो उन पर अत्याचार क्यों? जानने के लिए पढ़िए यह लेख।

टीपू सुल्तान (Wikimedia Commons)

टीपू सुल्तान का हिन्दुओं पर किए गए अत्याचार के दाग मिटाने के लिए कई तर्क पेश किए गए, जिसमे से एक तर्क यह है कि टीपू सुल्तान ने श्रृंगेरी शंकराचार्य मठ को दान देना। जहाँ अभी भी उनके और उस समय के शंकराचार्य के बीच के पत्राचार को मठ द्वारा संरक्षित किया गया है। हालांकि, इस पर पहली बार में विश्वास करना संभव नहीं है। हमें सभी तथ्यों और परिस्थितियों को आंकना पड़ेगा, उसके व्यक्तिगत उद्देश्य और मानसिकता को समझना पड़ेगा। जिसके उपरांत हम सही गलत का फैसला कर सकते हैं।

संदीप बालकृष्ण के पुस्तक ‘टीपू सुल्तान: द टायरेंट ऑफ मैसूर’ का एक अंश:


अगर औरंगज़ेब सबसे कट्टर मुस्लिम राजा था जिसने 18 वीं शताब्दी की शुरुआत में दिल्ली में मुगल सिंहासन पर राज किया था, तो उसके सामने टीपू सुल्तान ही वह राजा था जिसने दक्षिण भारत में उसी तरह से राज किया था। उसी ने औरंगज़ेब के क्रूरता पूर्ण शासन को दक्षिण भारत में आगे बढ़ाया था।

औरंगज़ेब ने 50 वर्षों की लंबी अवधि में हिंदुओं पर अत्याचार, उनके जीवन के तरीके, उनकी परंपराओं और उनके पूजा स्थलों पर अत्याचार किए। टीपू ने भी वैसे ही अत्याचार किए, किन्तु यह कह देना की 17 वर्ष में उस संख्या में अत्याचार नहीं हुए जिस संख्या में औरंज़ेब ने किया तो यह बुद्धिजीवियों के कट्टरता और एक धर्म के प्रति झुकाव को साफ साफ दिखता है। औरंगज़ेब ने अपनी कट्टर क्रूरता के लिए लगभग पूरे भारत को खेल के मैदान के रूप में रखा था, दिल्ली, आगरा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में अपने कट्टरता के चरम को समेटा था। हालांकि, टीपू ने कर्नाटक के बड़े हिस्से, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में अपनी क्रूरता को सीमित रखा। लेकिन इस तुलात्मक रूप से छोटे क्षेत्र के भीतर, वह इतने कम समय में हर तरह की क्रूरता करने में कामयाब रहा। उसके अत्याचार केवल हिन्दुओं के जीवन तक ही सिमित नहीं थे बल्कि महिलाओं पर ज़ुल्म, धर्मस्थलों और परंपराओं पर अत्याचार यह सब भी शामिल थे।

(Pinterest)

मैसूर और कूर्ग का इतिहास लिखने वाले ब्रिटिश इतिहासकार लुईस राइस कहते हैं कि “कैसे उसके विशालकाय साम्राज्य के किले ‘श्रीरंगपट्टनम’ में केवल दो ही मंदिर मौजूद थे। वह भी उनको इसलिए बख्शा गया था क्योंकि उस मंदिर के ज्योतिष, सुल्तान की कुंडली देखा करते थे। 1790 में प्रत्येक हिन्दू मंदिरों की संपत्ति को जब्त कर लिया गया था।”

वैसे ही, एम.एच गोपाल अपनी लिताब ‘टीपू सुल्तान्स मैसूर: ऐन इकोनॉमिक हिस्ट्री’ में कहते हैं कि “मुसलामानों को हाउस टैक्स, अनाज और अन्य सामानों पर कर का भुगतान करने से छूट दी गई थी, जो उनके व्यक्तिगत उपयोग के लिए थे और व्यापार के लिए नहीं। ईसाइयों को राजधानी में बंधक बना लिया गया और उनकी संपत्ति को भी जब्त कर लिया गया। इस्लाम में धर्मान्तरित लोगों को करों में छूट जैसी रियायतें दी गईं। टीपू ने सभी प्रशासनिक पदों से हिंदुओं को हटा दिया और उन्हें मुसलामानों के साथ ‘दीवान पूर्णैया’ के अपवाद के साथ बदल दिया। एक और बदलाव राजस्व विभाग में खातों के माध्यम के रूप में फारसी की शुरुआत थी। यह अब तक मैसूर में प्रथा थी। कन्नड़ में राजस्व खातों को बनाने के लिए, उन प्रतियों को निष्पक्ष रूप से संप्रेषित किया गया था, जिन्हें मराठी में अनुवाद किया गया।”

और फिर हमारे पास मालाबार पर टीपू की बर्बर छापेमारी के सबूत हैं। उस छापेमारी में ऐसा कोई अत्याचार नहीं बचा था जो टीपू ने हिन्दुओं पर नहीं किया। न जाने कितने हिन्दुओं का रक्त बहा। मालाबार के लगभग सभी मंदिरों को नष्ट कर दिया गया। और इस छापेमारी पर टीपू को बहुत गर्व महसूस हुआ, जिसका सबूत है उसके द्वारा अपने खास सेवक बदरूज़ जुमान खान को 19 जनवरी 1790 को लिखा पत्र जिसमे अपने उत्साह का वर्णन करते हुए लिखा था कि “मैंने हाल ही में मालाबार में शानदार जीत हासिल की है और चार लाख से अधिक हिंदुओं को इस्लाम में परिवर्तित कर दिया गया है। अब मैं रमन नायर के खिलाफ मार्च करने के लिए तैयार हूं।”

यह वही रमन नायर हैं जिन्हे त्रावणकोर के धर्मराज रमन नायर के नाम से जाना जाता है। आगे चल कर यह सीधे तौर पर तथाकथित तीसरे एंग्लो मैसूर युद्ध का कारण बना, जो टीपू को बुरी तरह से भरी पड़ा था। उसका तात्कालिक उद्देश्य अपने राज्य का आधा भाग वसूल करना था, जो कि उसे 1792 संधि के अनुसार, अंग्रेजों को समर्पण कर दिया था। और उसे यह भी महसूस हो गया कि वह हिन्दुओं के विरोध का जोखिम नहीं उठा सकता।

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यही परिस्थितियां थीं जब टीपू ने श्रृंगेरी मठ को उपहार और अनुदान में दिया। किन्तु, हमारे स्वघोषित बुद्धिजीवियों और कथित इतिहासकारों ने टीपू की अद्भुत धार्मिक सहिष्णुता के प्रमाण के रूप में इस कार्य को रखा है। लेकिन, अगर हम उन परिस्थितियों की जांच करते हैं जिनके तहत टीपू ने श्रृंगेरी के पंडितों को लुभावना पत्र लिखा था और मठ को भव्य दान दीए थे, तो एक पूरी तरह से अलग तस्वीर उभरती है। लीला प्रसाद ने अपने किताब ‘Poetics of Conduct: Oral Narrative and Moral Being in a South Indian Town’ में सुरेंद्र नाथ द्वारा कही बात को दोहराते हुए लिखा कि “टीपू उस समय शत्रुओं से जूझ रहा रहा था और यही वजह थी कि उसने अपने हिन्दू के प्रति छवि को सुधारना और साथ ही साथ दुश्मनों(मराठा) के लिए अन्धविश्वास फैलाना भी था।”

यह हमारे लिए टीपू के व्यक्तित्व का एक और पहलू सामने रखता है कि टीपू ज्योतिष में बहुत विश्वास रखता था। उसने अपने दरबार को सभी प्रकार के भविष्यवक्ता और ज्योतिषों से भर दिया था। वह एक छापे से पहले शुभ तिथियों और समय को ठीक करने के लिए उनसे परामर्श करता था। ‘इन लाइफ हिस्ट्री ऑफ़ राजा केशवदास’ पुस्तक में वीआर परमेस्वरन पिल्लई ने ज्योतिष के साथ टीपू के जुनून का वर्णन किया है कि ” जमीन दान और अनुदान के प्रकाशित दस्तावेजों को देखकर मैंने 40 साल पहले का इसके कारणों की व्याख्या की थी। टीपू को ज्योतिषीय भविष्यवाणियों में बहुत विश्वास था। अंग्रेजों की ताकत को नष्ट करने के बाद सम्राट (पद्मशाह) बनना था जिसके लिए टीपू ने जमीन का सहारा लिया। स्थानीय ब्राह्मण ज्योतिषियों की सलाह के बाद ही टीपू ने श्रृंगेरी मठ और अन्य मंदिरों का दान किया। यह सभी दान-धर्म 1791 में उसकी हार और 1792 में श्रीरंगपट्टनम संधि को अपमानित करने के बाद किए गए थे। यह सब हिन्दुओं के प्रति अचानक से जगा प्रेम का हिस्सा नहीं था। बस उसे अपने तख़्त को बचाना था।”

(Wikimedia Commons)

टीपू का आत्मविश्वास उस पर उल्टा पड़ गया था, जिसका अंत 1792 की अपमानजनक हार के रूप में हुआ। इस युद्ध में, उसने बहुत बड़ी धनराशि खो दी थी और अपना आधा क्षेत्र भी खो दिया था, और दोनों बेटों को बंधक के रूप में अंग्रेजों के सामने भेजना पड़ा था। 1782-92 दशक के घृणित टीपू ने अब अपने क्षेत्र को पुनः प्राप्त करने और अपने गर्व को वापस पाने के लिए एक कठिन संघर्ष का सामना किया। उसको समझ आ गया कि अगर अंग्रेजों से भिड़ना है तो उसे अधिकांश जनता को एकजुट करना पड़ेगा जो हिन्दू थे। उसको यह भी समझ आ गया कि अगर वह(हिन्दू) किसी भी तरह का विरोध करते हैं तो वह(टीपू) बहुत बड़े व्यक्तिगत खतरे में आ जाएगा।

इसलिए, यह कहना अधिक सही है कि श्रृंगेरी मठ को टीपू के दान से एक राजनीतिक अभियान का जन्म हुआ, न कि सहिष्णुता का। यदि वह वास्तव में एक अच्छा शासक था, तो वह अपने राज्य में और दूसरों के राज्यों में इतने सारे हिंदू मंदिरों को क्यों ध्वस्त करेगा? वह हिंदुओं का इतने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण क्यों करवाता? वह अपने गुप्त पत्रों में गैर-मुसलमानों को काफिरों के रूप में क्यों संबोधित करता? यह टीपू के अंदर का राजनेता था जिसने श्रृंगेरी मठ और कुछ अन्य मंदिरों को दान, अनुदान और उपहार दिए। लेकिन उसके भाव हिन्दुओं के प्रति सदा ही एक जैसे रहे।

(यह लेख संदीप बालकृष्ण के अंग्रेजी लेख का शान्तनू मिश्रा द्वारा किया गया अनुवाद है)

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