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राजनीति

बंगाल की जीत का श्रेय किसके सर, जनता या ममता?

तृणमूल कांग्रेस लगातार तीसरी बार सत्ता में आ गई है। "खेला होबे" से "खेला समाप्त" हुआ। आइए कुछ ऐसे कारण जानते हैं जिससे यह पता चलेगा कि जीते तो जीते कैसे?

बंगाल चुनाव पहली बार द्विपक्षीय रहा।(Wikimedia Commons)

बंगाल चुनाव के नतीजे रविवार देर शाम घोषित किए गए, जिसमें बहुमत के साथ जीतते हुए ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीट पर बढ़त बनाई। वहीं बंगाल चुनाव में हर संभव पैतरों के इस्तेमाल के बावजूद भी भारतीय जनता पार्टी 76 सीट जीतने में सफल रही और लेफ्ट एवं कांग्रेस गठजोड़ का तो मानो पत्ता ही साफ हो गया, वह एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही।

कुछ समय से Bengal Election 2021 को दो मुख्य पार्टियों ने अपनी साख का मुद्दा बना लिया था। एक के बाद एक रैलियां, जय श्री राम एवं जय माँ दुर्गा के नारे, ‘खेला होबे’ या ‘खेला शेष’, तुम बाहरी- हम भीतरी, यह सभी हथकंडे इसी लड़ाई का हिस्सा थे। पहली बार बंगाल में द्वी-पक्षीय सरकार बनी है, इनका मतलब कि बंगाल विधानसभा में दो मुख्य पार्टियां ही उपस्थित रहेंगी। तो क्या इस चुनाव को जीतने का श्रेय जनता को जाता है, ममता बनर्जी को?


श्रेय किसको?

यह तो मानना पड़ेगा कि इस चुनाव में सभी पार्टियों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, कांग्रेस, लेफ्ट और अन्य दलों को छोड़ कर दोनों पार्टियों ने अपना दम-खम दिखाया, जिसका नतीजा भी दिखा है। और यह भी मानना जरूरी है कि ममता बनर्जी एवं तृणमूल कांग्रेस बंगाल की मनो-दशा को गहराई से जानती है। इसलिए टीएमसी ने अपने घोषणा पत्र में कुछ ऐसे वादे किए जो लुभावने भी थे और एक समुदाय विशेष पर केंद्रित भी थे।

मुस्लिम वोट टीएमसी को गया: एक तरफ जहाँ भाजपा यह कह रही थी कि हिन्दू वोट हमारी तरफ है वहीं मुस्लिम वोटरों का पूरा ध्यान टीएमसी पर रहा, जिसका यह भी कारण है कि असदुद्दीन औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम भी कोई कमाल नहीं दिखा पाई। माना यह जा रहा था कि औवेसी की पार्टी वोटकटवा के रूप में नजर आएगी मगर बंगाल की जनता का मूड इस बार दो ही पार्टियों पर केंद्रित रहा था।

मतुआ एवं महिसिया समुदाय का तृणमूल को समर्थन देना: मतुआ और महिसिया समुदाय पर भाजपा को अच्छी पकड़ होने की कामना थी, मगर मतुआ एवं महिसिया समुदाय बहुल इलाके में तृणमूल की ही जीती है। जिसका भी कारण है घोषणा-पत्र जिसमें इस समुदाय को ओबीसी श्रेणी में जोड़ने की बात कही गई थी।

चुनावी नतीजों के बाद बंगाल की कुर्सी का खेल तो समाप्त हो गया है। (NewsGram Hindi)

ममता बनर्जी का इमोशनल सिक्का: आपको याद होगा कि चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी को पैर में चोट लग गई थी। जिस वजह से वह कुछ समय तक या कहिए परिणाम घोषित होने तक व्हीलचेयर के सहारे पार्टी मीटिंग्स एवं रैलीयों में पार्टी का प्रचार करने उतरीं थीं। उस समय उन्होंने यह आरोप लगाया था कि उन्हें यह चोट भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा एक षड्यंत्र के जरिए लगी है। और व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे ‘खेला होबे’ का नारा भी दिया था। बहरहाल जैसे ही चुनाव परिणाम घोषित हुए, ममता बनर्जी ने कुर्सी यानि व्हीलचेयर छोड़ने का फैसला भी कर लिया।

दल-बदल के बावजूद मजबूत दिखी टीम टीएमसी: चुनाव से पहले कई नेता तृणमूल पार्टी छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे। किन्तु इसका फायदा भी चुनाव परिणाम में तृणमूल को ही होता दिखा है। ऐसा इसलिए क्योंकि जिन 16 प्रत्याशियों ने तृणमूल का साथ छोड़ भाजपा का हाथ थामा था वह अपनी-अपनी सीट से हार गए हैं। किन्तु इस दल-बदल का नुकसान ममता बनर्जी को हुआ क्योंकि जिस सीट से वह चुनावी रण में उतरीं यानि नंदीग्राम से, उस सीट से वह हार गईं । वह सीट जीता है तृणमूल छोड़कर भाजपा में आए नेता शुभेंदु अधिकारी ने। नंदीग्राम को शुभेंदु का गढ़ भी कहा जाता है।

इन सभी कारणों के साथ एक और भी कारण है जिसे बंगाल में तृणमूल की जीत का कारण माना जा रहा है। वह कारण है ‘डर’, क्योंकि जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस पर बम फेंकने, राजनीतिक हत्याएं करने के आरोप लग रहे थे, उसका फायदा तृणमूल को कहीं न कहीं डर के रूप में दिखा है।

भाजपा की बम्पर सीटों पर जीत

अब तक हम बात कर रहे थे तृणमूल कांग्रेस की किन्तु इस चुनाव में जो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है वह है भारतीय जनता पार्टी जो 76 सीट जीतने में सफल रही। यह जीत भारतीय जनता पार्टी के लिए इसलिए अहम है क्योंकि 2016 के बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा मात्र 3 सीट ही जीती थी। 3 सीट से 76 सीट जीतने के पीछे कई अहम कारणों को माना जा रहा है।

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सबसे पहले बंगाल में सीएए को लागु करने के लिए भाजपा पहले ही वादा कर चुकी थी। जिस वजह से उसे उन जगहों पर भी फायदा हुआ जहाँ से इसे लागु कराने की मांग तेज थी। अयोध्या राम मंदिर आज भाजपा की यूएसपी बन चुकी है उन्हें भी इस्तेमाल किया गया। मगर बाहरी और भीतरी के लपट-जाल में भाजपा इतना कमाल नहीं दिखा पाई जितना हमने प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के रैली एवं रोड-शो में देखा था।

शुभेंदु अधिकारी की जीत ने जहाँ एक तरफ भाजपा में ढांढस बंधाया है वहीं इस नतीजे ने उसे 2024 लोक-सभा के लिए तैयार रहने का आश्वासन भी दिया है।

हार का कारण

देश में कोरोना महामारी अपने चरम पर है जिस वजह से बंगाल चुनाव के दौरान केंद्र सरकार पर देश के ऊपर ध्यान न देने का आरोप भी लगाया गया था। इसका खामियाजा भी भाजपा को बंगाल चुनाव के साथ-साथ अन्य राज्यों के विधान-सभा चुनाव में उठाना पड़ा है।

भाजपा के हारने की वजह में एक और घटना शमिल है, वह है दूसरे दलों से आए नेता। जिस वजह से पुराने नेताओं को किनारा कर दिया गया। यही अनदेखी बंगाल चुनाव के परिणाम में भी देखने को मिली है। दूसरे दलों से आए नेताओं में से 16 इस बार चुनाव नहीं जीत पाए। यह उन सीट पर भाजपा के प्रत्याशी थे जो कभी तृणमूल में उसी सीट से जीतकर विधानसभा में आए थे।

कांग्रेस और लेफ्ट का न चलना भी भाजपा की हार का अहम कारण है क्योंकि यह लड़ाई द्विपक्षीय ही रह गई थी। ना लेफ्ट सीट खिसका पाई और ना ही कांग्रेस जिसका पूरा फायदा तृणमूल कांग्रेस को हुआ है।

बंगाल चुनाव जीतने के बावजूद भी ममता बनर्जी अब चुनाव आयोग के खिलाफ कोर्ट में जाने की बात कर रहीं हैं। बहरहाल नतीजें आ गए हैं, लहर की लड़ाई खत्म हो चुकी है। अब देखना यह है कि तृणमूल कांगेस के शासन में क्या-क्या बदलाव आएंगे?

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कुरान, गैर-इस्लामियों के विषय में क्या कहता है,

मारिया वर्थ, लम्बे समय से हिंदुत्व एवं सनातन धर्म से जुड़े तथ्यों को लिखती आई हैं, लेकिन 2015 में लिखे एक आलेख में उन्होंने ईसाई एवं इस्लाम से जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों को उजागर किया जिसे जानना हम सबके के लिए आवश्यक है। इसी लेख में मारिया ने हिन्दुओं के साथ बौद्ध एवं अन्य धर्मों के लोगों को संयुक्त राष्ट्र में ईसाई एवं इस्लाम धर्म के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी और इसके पीछे उन्होंने यह कारण बताया कि ईसाई एवं इस्लाम दोनों ही धर्मों के बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि गैर-ईसाई या गैर-मुस्लिम नर्क की आग में जलेंगे। इसका प्रमाण देते गए उन्होंने क़ुरान की वह आयत साझा की जिसमें साफ-साफ लिखा गया है कि " जो काफिर होंगे, उनके लिये आग के कपड़े काटे जाएंगे, और उनके सिरों पर उबलता हुआ तेल डाला जाएगा। जिस से जो कुछ उनके पेट में है, और उनकी खाल दोनों एक साथ पिघल जाएंगे; और उन्हें लोहे की छड़ों से जकड़ा जाएगा।" (कुरान 22:19-22)

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(NewsGram Hindi)

देश में धर्मांतरण का मुद्दा नया नहीं है, लेकिन जिन-जिन जगहों पर हाल के कुछ समय में धर्मांतरण बढ़े हैं वह क्षेत्र नए हैं। आपको बता दें की पंजाब प्रान्त में धर्मांतरण या धर्म-परिवर्तन का काला खेल रफ्तार पकड़ चुका है और अपने राज्य में इस रफ्तार पर लगाम लगाने वाली सरकार भी धर्मांतरणकारियों का साथ देती दिखाई दे रही है। आपको यह जानकर हैरानी होगी, कि पंजाब में धर्मांतरण दुगनी या तिगुनी रफ्तार पर नहीं बल्कि चौगनी रफ्तार पर चल रही है। जिस वजह से पंजाब में हो रहे अंधाधुंध धर्म-परिवर्तन पर चिंता होना स्वाभाविक हो गया है।

गत वर्ष 2020 में कांग्रेस नेता और पंजाब में कई समय से सुर्खियों में रहे नवजोत सिंह सिद्धु ने दिसम्बर महीने में हुए एक ईसाई कार्यक्रम में, यहाँ तक कह दिया था कि 'जो आपकी(ईसाईयों) तरफ आँख उठाकर देखेगा उसकी हम ऑंखें निकाल लेंगे' जो इस बात पर इंगित करता है कि कैसे सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी पंजाब में हो रहे धर्म परिवर्तन को रोकने के बजाय उसे राजनीतिक शह दे रही है। आपको यह भी बता दें कि 3.5 करोड़ की आबादी वाले पंजाब राज्य में लगभग 33 लाख लोग ईसाई धर्म को मानने वाले रह रहे हैं। पंजाब के कई क्षेत्रों में छोटे-छोटे चर्च का निर्माण हो रहा है और कई जगह ऐसे चर्च मौजूद भी हैं।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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