Monday, May 10, 2021
Home देश क्या है संस्कृत शब्द "हिंगू" मसाले का महत्व !

क्या है संस्कृत शब्द “हिंगू” मसाले का महत्व !

आइए आज जानते हैं, भारतीय मसालों के बारे में जो देश और दुनिया में अपने रंग, अपनी खुशबू के लिए काफी प्रचलित हैं। पूरे भारत में अलग-अलग राज्यों के पकवानों का रंग उनका स्वाद बेशक अलग हो पर उनमें इस्तेमाल किए जाने वाले मसालें लगभग समान होते हैं।

हम सभी ने अपने घरों में अपने बड़े-बुजुर्गों को मसालें कूटते, सुखाते जरूर देखा होगा। घर के रसोईघरों में मसालों के डिब्बे जिनमें, हल्दी, नमक, मिर्ची, हींग, धनिया पाउडर आदि जैसे अन्य कई मसालें देखने को मिल जाते हैं। हर मसालों का अपना रंग, अपना स्वाद होता है। और थोड़ा गौर किया जाए तो हर मसाला अपने आप में एक आयुर्वेद का काम भी करता है। हल्दी बेशक सब्ज़ी में डाली जाए या इसका लेप लगाया जाए ये हर जगह अपना सुंदर पीला रंग बिखेरती है। धनिया सुंगध के साथ – साथ स्वाद को भी निखारती है। मिर्ची का अपना तीखा स्वाद लाल रंग है। और नमक बिना सब अधूरा है। हम एक सब्ज़ी में अक्सर कई मसालों का प्रयोग करतें हैं।

सभी प्रकार के मसालें जिनका हम बात कर रहें हैं , वो आज से नहीं सदियों से इनका प्रयोग होता आया है। ये सभी मसालें अपने – अपने स्तर पर एक तरह की जड़ी बूटी का काम करते हैं। प्राचीन काल में इन्हीं जड़ी बूटियों (मसाले) का प्रयोग आर्युवेद के रूप में किया जाता था। लेकिन आज जिस खास मसालें की बात हम कर रहें हैं वो है “हींग”, जिसका वैज्ञानिक नाम “फेरुला नार्थेक्स”, अंग्रेजी में “एसाफिटिडा” और संस्कृति में इसे “हिंगू” कहा जाता है।

यह ज्यादातर अफगानिस्तान और ईरान मूल का पौधा है। भूमध्य सागर से लेकर मध्य एशिया तक इसकी पैदावार देखने को मिलती है। भारत में ये कश्मीर और पंजाब जैसे कुछ इलाकों में देखने को मिलते हैं।

हींग में सल्फर की मौजूदगी के कारण इसकी गंध काफी तेज़ होती है। इसका ज्यादातर प्रयोग सब्जियों में, आचारों में सुगंध लाने के लिए किया जाता है। इसकी प्रवृति काफी गरम होती है इसलिए आपने देखा होगा कि बहुत ही कम मात्रा में इसका प्रयोग किया जाता है। यह दानेदार व हल्के भूरे रंग का होता है। एक और रोचक तथ्य है की : इसके तीक्ष्ण गंध के कारण इसे ” शैतान की लीद ” भी कहा जाता है।

हींग का पौधा बारहमासी शाक के नाम से जाना जाता है। (ट्विटर)

हींग का शुद्ध रूप कुछ गोंद की भांति होता है। आज तो हम जिस रूप में इसका प्रयोग करते हैं , वो एक तरह से इसका मिलावटी रूप कहा जा सकता है। हींग तो एक प्रकार के पौधे से प्राप्त होता है। इसका पौधा बारहमासी शाक के नाम से भी जाना जाता है। इसकी ज्यादातर पैदावार अफगानिस्तान , ईरान , तुर्की , बलूचिस्तान आदि जगहों पर होती है। भारत में इसकी ज्यादा पैदावार देखने को नहीं मिलती। भारत में ये बड़ी मात्रा में आयात किया जाता है। “The Book of Spices” के लेखक जॉन ओ कोनेल ने वर्णन किया है की ” 16 वीं शताब्दी में मध्य पूर्व से मुगल ही भारत में सबसे पहले हींग लेकर आए थे।

( हींग का आर्युवेदिक रूप )

हींग का प्रयोग बड़ी मात्रा में आर्युवेद के रूप में किया जाता है। जब कभी आपके पेट में दर्द हुआ हो , पाचन में तकलीफ़ हुई हुई हो तो, आपकी नानी , दादी ने आपको हींग को पानी में घोलकर पीने का सुझाव दिया होगा। हां! हींग में भरपूर मात्रा में औषधीय गुण पाया जाता है। जिससे पेट से जुड़ी सभी समस्याएं तथा महिलाओं को राजस्व के दौरान होने वाली सभी समस्याओं से निजात दिलाने में हमारी मदद करता है। हींग में कई तरह के एंटीऑक्सिडेंट्स होते हैं। जो संक्रमण को दूर करने में सहायक है। अक्सर बच्चों – बूढों के दांतों में दर्द रहता है। हींग इन समस्याओं को भी दूर करने में हमारी मदद करता है। आज – कल की भागती – दौड़ती ज़िन्दगी में लोग बड़े स्तर पर ब्लड प्रेशर का शिकार हो रहें हैं। हींग ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने में भी सहायक है। खांसी , जुखाम , भुखार सभी में हींग के प्रयोग से जल्दी राहत देखने को मिलती है। हींग के भारत और उसके बाहर भी कई परंपरिक औषधीय उपयोग हैं। अफ़गान में खांसी , अल्सर को ठीक करने में इसका प्रयोग किया जाता है।

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भारत बड़े स्तर पर हींग का आयात करता है। लेकिन आज सीएसआईआर की घटक प्रयोगशाला, इंस्टीच्यूट ऑफ़ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी (IHBT-Institute of Himalayan Bioresource Technology) के प्रयासों से हिमाचल प्रदेश में कुछ क्षेत्रों में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। हींग को अपने पौधों की वृद्धि के लिए ठंडे इलाकों की आवश्यकता होती है। तभी इनका विकास होता है । इनकी जड़ो में ओलियो-गम नाम की राल पैदा होने में पांच से छह साल लग जाते हैं। इसलिए भारत के हिमालय क्षेत्र इनके लिए काफी उपयोगी है। और आज बड़े स्तर पर हींग की खेती इन क्षेत्रों में देखने को मिलती हैं।

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