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दुनिया

2 साल के अंदर खत्म हो सकती है कोविड-19 महामारी : डब्ल्यूएचओ

'डब्ल्यूएचओ' के महानिदेशक घेब्रियेसस ने कहा कि "तकनीक में प्रगति से वर्तमान दुनिया कोविड -19 महामारी को 'कम समय में' रोक सकती है।"

कोरोना के बीच देशभर के बच्चों ने जेईई का परीक्षा दिया,(Image: Pixabay)

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक ट्रेडोस अधानोम घेब्रियेसस ने कहा कि कोरोनावायरस महामारी दो साल के अंदर खत्म हो सकती है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस शुक्रवार को जिनेवा से एक वर्चुअल प्रेस ब्रीफिंग को संबोधित करते हुए, डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने कहा कि 1918 के स्पैनिश फ्लू को दूर होने में दो साल लग गए थे, लेकिन तकनीक में प्रगति कर चुकी वर्तमान दुनिया कोविड -19 महामारी को ‘कम समय में’ रोक सकती है।

डब्ल्यूएचओ (Image Source- Pixabay)


उन्होंने कहा, “अधिक संपर्क के साथ बेशक वायरस को फैलने का एक बेहतर मौका मिला है।”

उन्होंने राष्ट्रीय एकता, वैश्विक एकजुटता के महत्व पर बल देते हुए आगे कहा, “लेकिन साथ ही, हमारे पास इसे रोकने की तकनीक भी है, और इसे रोकने के लिए ज्ञान भी।”

ट्रेडोस ने संबोधन के दौरान व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) से जुड़े भ्रष्टाचार के बारे में एक सवाल का जवाब देते हुए इसे अपराध बताया।

उन्होंने कहा, “किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार स्वीकार नहीं किया जा सकता है।”

यह भी पढ़ें- कोरोना महामारी की चपेट से कब तक उबर पाएगा वैश्विक अर्थव्यवस्था?

बीबीसी ने महानिदेशक के हवाले से कहा, “हालांकि, पीपीई से संबंधित भ्रष्टाचार .. मेरे लिए यह अपराध वास्तव में हत्या जितना जघन्य है, क्योंकि अगर स्वास्थ्य कार्यकर्ता पीपीई के बिना काम करते हैं, तो हम अपने जीवन को खतरे में डाल रहे हैं। और यह उन लोगों के जीवन को भी खतरे में डाल देता है जो वे सेवा करते हैं।”

समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रेडोस ने यह भी कहा कि महामारी ने जलवायु परिवर्तन पर प्रतिक्रिया के प्रयासों में तेजी लाने की नई प्रेरणा दी है।

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक ट्रेडोस अधानोम घेब्रियेसस (Image Source- Wikimedia Commons)

उन्होंने आगे कहा, “इतिहास पर गौर किया जाए तो पाएंगे कि प्रकोप और महामारी अर्थव्यवस्था और समाज में परिवर्तन के कारण बने हैं, यह भी वैसा ही है, उनसे अलग नहीं।”

उन्होंने कहा, “हम देख सकते हैं कि इस वैश्विक स्वास्थ्य संकट ने हमें अपनी दुनिया की एक झलक दी है कि हमारा आसमान और नदियां भी स्वच्छ हो सकती हैं, और हम बेहतर हरियाली भरे माहौल में वापस लौट सकते हैं।”

डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने दोहराया कि “कोविड -19 एक सदी में एक बार आने वाला स्वास्थ्य संकट है। लेकिन यह भी सच है कि यह हमें सदी में बस एक बार मौका देता है कि हम अपने बच्चों को बेहतर दुनिया विरासत में दें, एक ऐसी दुनिया जिसकी कामना सब करते हैं।”(IANS)

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एप्पल वॉच,सांकेतिक चित्र (Pixabay)

एक नए अध्ययन से जानकारी समाने आया है कि एप्पल वॉच सीरीज 6 'नियंत्रित परिस्थितियों में फेफड़ों की बीमारियों के रोगियों में हृदय गति और ऑक्सीजन संतृप्ति (एसपीओ2) प्राप्त करने का एक विश्वसनीय तरीका है।'

जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट में प्रकाशित अध्ययन ने 9टू5मैक की रिपोर्ट 'एप्पल वॉच डिवाइस कमर्शियल ऑक्सीमीटर के बीच मजबूत सकारात्मक सहसंबंध' देखा गया है।

ऐप्पल वॉच या वाणिज्यिक ऑक्सीमीटर उपकरणों में त्वचा के रंग, कलाई की परिधि, कलाई के बालों की उपस्थिति और एसपीओ 2 के लिए तामचीनी कील और हृदय गति माप के मूल्यांकन में कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं था।

साओ पाउलो विश्वविद्यालय की ओर से अध्ययन एक आउट पेशेंट न्यूमोलॉजी क्लिनिक से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और इंटरस्टिशियल लंग डिजीज के 100 रोगियों के साथ किया गया।

इसने ऐप्पल वॉच सीरीज 6 के साथ एसपीओ 2 और हृदय गति डेटा एकत्र किया और उनकी तुलना दो वाणिज्यिक पल्स ऑक्सीमीटर से की।

परीक्षण स्वस्थ व्यक्तियों, इंटरस्टीशियल लंग डिजीज और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज वाले लोगों के साथ किए गए थे।

oximeter, corona virus, covid 19 कोरोना काल में ऑक्सीमीटर का सबसे अधिक उपयोग किया गया है।(Pixabay)

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बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार। (Twitter, Nitish Kumar)

जातीय जनगणना को लेकर बिहार में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के दो बडे दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल (युनाइटेड) अब सीधे तौर पर आमने-सामने नजर आने लगे हैं। केंद्र की भाजपा नीत राजग सरकार जहां जाति आधारित जनगणना कराने से इंकार कर रही है वहीं जदयू के नेता नीतीश कुमार इस मामले को लेकर विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ मुखर हैं। ऐसे में कयास लगाया जाने लगा है कि क्या फिर से बिहार की सियासी समीकण बदलेंगे। हालांकि इस मुद्दे को लेकर कोई भी नेता अब तक खुलकर बात नहीं कर रही है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिल्ली में रविवार को स्पष्ट कर चुके हैं कि जाति जनगणना देश के लिए जरूरी है। उन्होंने दिल्ली में कहा कि केंद्र सरकार को जातिगत जनगणना करानी चाहिए। इसके कई फायदे हैं।

उन्होंने कहा कि आजादी के पहले जनगणना हुई थी, आजादी के बाद नहीं हुई। जातीय जनगणना होगी तभी लोगों के बारे में सही जानकारी होगी। तब पता चलेगा कि जो पीछे है, उसे आगे कैसे किया जाए। जातीय के साथ उपजातीय जनगणना भी कराई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि इसको लेकर एक बार फिर राज्य में सभी दलों के साथ बैठक कर आगे का निर्णय लेंगे। नीतीश के इस बयान के बाद तय है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जातिगत जनगणना के मामले में पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इधर, भाजपा के नेता इसमें व्यवहारिक दिक्कत बता रहे हैं।

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और सांसद सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि तकनीकी और व्यवहारिक तौर पर केंद्र सरकार के लिए जातीय जनगणना कराना संभव नहीं है। इस बाबत केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार अगर चाहे तो वे जातीय जनगणना कराने के लिए स्वतंत्र है।


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अगरबत्ती उपयोग पर त्रिपुरा अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने का संभव कोशिश कर रहा है। (Unsplash)

अगरबत्ती उपयोग पर त्रिपुरा अपने खोए हुए गौरव को वापस पाने का संभव कोशिश कर रहा है, जिसे पहले वियतनाम और चीन द्वारा नियंत्रण किया जा रहा था। त्रिपुरा इंडस्ट्रियल विकास निगम के अधिकारियों के अनुसार राज्य में बांस की छड़ियों का उत्पादन में भारी गिरावट आई है 2010 में 29,000 मीट्रिक टन से गिरकर 2017 में 1,241 मीट्रिक टन हो गया था, क्योंकि भारत कि प्रतिवर्ष 70,000 (96 प्रतिशत) मीट्रिक टन गोल बास की छड़ियां (46प्रतिशत) वियतनाम और (47 प्रतिशत) चीन द्वारापूरी की जा रही थी।

टीआईडीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि 2019 में, केंद्र सरकार ने सीमा शुल्क 25 प्रतिशत बढ़ा दिया और बांस के उत्पादों को प्रतिबंधित सूची में शामिल कर दिया गया, जिससे दूसरे देशों के लिए समस्या उत्पन्न हुई। वर्तमान में, पूर्वोत्तर राज्य 2,500 मीट्रिक टन बांस की छड़ें पैदा कर रहा है और आने वाले कुछ वर्षों में उत्पादन (12,000 मीट्रिक टन) पढ़कर हो जाएगा, क्योंकि आधुनिक मशीनों के साथ 14 और नई बांस की छड़ें निर्माण इकाइयां जल्द ही पूरे राज्य में आ जाएंगी।उन्होंने कहा, पहले त्रिपुरा के कारीगर हाथ से बांस की छड़ें बनाते थे ,परंतु कुछ साल पहले सरकार ने उनकी अनुकूल मशीन खरीदने में सहायता की।

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