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संस्कृति

भाषा का ज्ञान होना ज़रूरी है, किसी संप्रदाय से जोड़ना नहीं…

संस्कृत भाषा का पतन भारत के लिए एक चर्चा विषय है, कि क्यों हम एक भाषा को एक संप्रदाय से जोड़ कर देखते हैं और वह कौन लोग थे जिन्होंने संस्कृत भाषा के इस्तेमाल को गलत बताया था?

ब्रह्म समाज के संस्थापकराजा राम मोहन राय। Wikimedia Commons)

क्या संस्कृत भाषा केवल एक धर्म से जुड़ी भाषा है या एक संप्रदाय या केवल एक ही विचारधारा के दामन से जुड़ी भाषा है? क्या संस्कृत को हमारे ही कुछ बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों ने एक संप्रदाय का बोल कर ठुकरा दिया है और हमें भी इसे ठुकराने के लिए उकसाया है? ऐसा इसलिए कि जिस भाषा को हम भारतीयों ने धीरे-धीरे भुला दिया, आज उसी भाषा को विदेशी विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है। एक भाषा जिसका जन्म भारत में हुआ अब वही अपनी बुनियाद खोज रही है। 

वर्तमान भारत में कुछ चुनिंदा जगहों पर संस्कृत भाषा का उपयोग किया जाता है, जिसमें राजस्थान का गनोडा, मध्यप्रदेश में बघुवर, मोहद और झिरी, कर्नाटक में मत्तुर और होसहल्ली शामिल हैं। संस्कृत के विशेषज्ञ, ज्ञाता एवं आचार्य भी आज-कल संस्कृत छोड़ किसी अन्य भाषा का लिखने या पढ़ने में प्रयोग करते हैं। 


क्या आपको पता है कि भारत के ही कुछ वामपंथी विचारों ने कहा था कि हिन्दू हाल ही में जन्मा एक धर्म है जिसको उन्होंने नव-हिन्दू या नया-हिन्दू नाम दिया था और कहा गया कि यह कुछ राष्ट्रवादी विचारधाराओं की सोच थी, जो बंगाल और भारत के अन्य राज्यों से शुरू हुई थी। जिसमें ईसाई धर्म के विचारों को संस्कृत में अनुवाद कर के पेश किया गया है, इसका मतलब यह है कि हिन्दू धर्म ईसाई विचारों से जन्मा धर्म है। किन्तु आश्चर्य की बात यह है कि जब भी इस नव-हिन्दू के विषय को उछाला जाता है तब एक नाम बहुत ही साफ-साफ दिखाई पड़ता है और वह नाम है राजा राम मोहन राय। 

राम मोहन राय या तो अपने धर्म को ठीक से समझ नहीं पाए थे या अंग्रेज़ी प्रभाव ने उनके विचारों को बदल दिया था, यह अपने में ही एक सोचने का विषय है। किंतु हिन्दू समाज से होते हुए भी मूर्ति पूजा का विरोध करना एक संदेह पैदा करता है। आपको जानकारी के लिए बता दूं कि राम मोहन राय ने न कभी अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया और न ही उनके विचारों के विपरीत गए। राय, नए और आधुनिक भारत का सपना देख रहे थे लेकिन ब्रिटिश राज के नीचे। इसमें कोई संदेह नहीं राजा राम मोहन राय ने ‘सती’ जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई और इसलिए इतिहास उन्हें महान विचारक कह रहा है। किन्तु राम मोहन राय ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने संस्कृत के पतन में अहम योगदान दिया था।  

राम मोहन राय एक ऐसे ब्रिटिश मिशनरी विलियम कैरी के साथ भी करीबी रखते थे जो हिन्दू-फोबिक था या हिन्दू धर्म से डर था। 

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राय ने उस समय के भारत के गवर्नर-जनरल को चिठ्ठी लिखकर कहा था कि संस्कृत भाषा को पाठ्यक्रम से हटा देना चाहिए और उसकी जगह गणित जैसे विषयों को पढ़ाना चाहिए। मज़ेदार बात यह है कि लोग, लॉर्ड मैकाले को शिक्षा में अंग्रेजीकरण के लिए कोसते हैं किन्तु राम मोहन राय ने मैकाले से 12 साल पहले ही इस मुद्दे को उठा दिया था। 

भारत वर्ष की यह विडंबना कहिए या बदकिस्मती कहिए कि जिस भाषा पर कई शोध हो रहे हैं एवं कई विदेशी पाठ्यक्रम में सम्मिलित है उस संस्कृत भाषा को भारत के कुछ बुद्धिजीवियों ने पिछड़ा हुआ बता कर भुला दिया है। जिस वजह आज अंग्रेजी भाषा बोलने वाले को उच्च श्रेणी का बताया जाता है। 

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