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ओपिनियन

आज अगर हम सोते रहे तो कल जागना मुश्किल है!

आज हिंदुत्व खतरे में है! ऐसा मैं नहीं विशेषज्ञ कह रहे हैं क्योंकि जिस गति से धर्मांतरण का जंजाल पैर पसार रहा है उसी को देखकर यह सोच भी उत्पन्न होती है।

भारत ने विश्व को ज्ञान ज्योति का उपहार दिया किन्तु आज वह अपनों से घिर बैठा है।(Pixabay)

आज इस लेख को मैं भारत के पूर्व-प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा रचित एक कविता से करूँगा जिस से आपको यह बोध हो हिन्दू का अर्थ उनके और वास्तविक दृष्टि में क्या है,

“मैं अखिल विश्व का गुरु महान्, देता विद्या का अमरदान।
मैंने दिखलाया मुक्ति-मार्ग, मैंने सिखलाया ब्रह्मज्ञान।
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर?
मेरा स्वर नभ में घहर-घहर, सागर के जल में छहर-छहर।
इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सौरभमय।
हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!”


‘आज हिंदुत्व खतरे में है’ ऐसा कह कर न तो मैं धर्मनिरपेक्षता को नीचा दिखा रहा हूँ न ही उन तथाकथित लिबरल या उदारवादी सोच रखने वालों को चुनौती दे रहा हूँ। खतरे में इसलिए है क्योंकि अनुमान यह लगाया जा रहा है कि 2040 तक हिन्दू अल्पसंख्यक के दर्जे में आ जाएंगे। और ऐसा करने वाले यही उदारवादी सोच होगी और धर्म परिवर्तन का ठेका लेकर बैठने वाले लोग होंगे। भारत के तीन ऐसे राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश है जहाँ हिन्दू आबादी 10% से भी कम रह गई है, वह है मणिपुर, नागालैंड और लक्षद्वीप।

केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप पर सबसे अधिक मुस्लिम समुदाय है जिसमे घबराने वाली या हैरत में डालने वाली कोई बात नहीं है। किन्तु लक्षद्वीप चोला राजवंश का राज था। जिसके बाद उस पर टीपू सुल्तान ने कब्जा किया और टीपू सुल्तान का इतिहास हम सबको पता है कि कैसे उसने हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया था। और टीपू के मरने के उपरांत यह अंग्रेजी शासन के अधीन आया और इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला।

मिजोरम में 87% ईसाई धर्म की आबादी है, जिसका अहम कारण है वहाँ पर भारी मात्रा में धर्मपरिवर्तन होना। मणिपुर राज्य में भी 1991-2001 के बीच हिन्दू जनसंख्या में भरी कटौती हुई है और इसका भी अहम कारण है ईसाई धर्मांतरणकारी द्वारा बड़े पैमाने पर धर्मपरिवर्तन करना। जिसकी शुरुआत का का केंद्र नागालैंड से विस्थापित ईसाइयों द्वारा किया गया है।

देश में ईसाई धर्म ने अपना पैर बहुत तेज़ी से पसारा है।(सांकेतिक चित्र)

जम्मू एवं कश्मीर में भी हिन्दुओं की आबादी केवल 28% के आस-पास ही रह गई है, जिसका कारण न तो विश्व से छुपा है और न ही छुपेगा और वह बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों की हत्या और उनका पलायन।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अभी धर्मांतरण का विस्तार बड़े पैमाने पर हो रहा है। और इसका अधिक कारण है बाहरी फंडिंग और ‘उनकी’ कट्टरवादी सोच का नतीजा। यह सोच अब अपना विस्तार दक्षिण भारत में भी पैर पसारने पर तुली है। किन्तु साक्षरता और लोगों में बढ़ती जागरुकता को कुछ हद तक कम किया गया है।

यह भी पढ़ें: “अल्पसंख्यक का रोना रोने वाले अल्पसंख्यक नहीं”

दुःख की बात यह है कि आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों पर एक मत को थोपने का आरोप कई वर्षों से लगाया जा रहा है, और कोई इनके पक्ष या विषय में बात करे तो इस्लामॉफ़ोबिक करार दे दिया जाता है। किन्तु सत्य यह है कि यदि ऐसे संगठन भारत में जागरुकता और धर्म का प्रचार-प्रसार नहीं करेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब वामपंथी सत्ता की कुर्सी पर होंगे और देश का हिन्दू डरा और सहमा कहीं चुप बैठा होगा। इसलिए इस मुद्दे को उठाने से घबराना क्यों? अगर आज हम सोते रहे तो कल जागना मुश्किल है!

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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