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थोड़ा हट के

क्या महत्व है रात्रि का और क्यों हिन्दू धर्म में अधिकतम पर्व रात्रि से जुड़े हैं?

रात्रि का अहम योगदान है हमारे जीवन में, यही कारण है कि अधिकतम हिन्दू पर्व में रात्रि में ही पूजा की जाती है और धूम-धाम से मनाया जाता है। साधना या तप के लिए रात्रि ही उत्तम विकल्प है।

शक्ति, ध्यान और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है नवरात्री। (Wikimedia Commons)

कभी नवदिन या शिवदीन सुना है? कभी नहीं! और ना ही सुनेंगे, ऐसा इस लिए कि रात्रि इन सब में अहम भूमिका निभाती है। नवरात्र, शिवरात्रि, दीपावली यह सब वह पर्व हैं जिन्हे रात्रि में ही पूजा जाता है या धूम-धाम से मनाया जाता है। ऐसा इस लिए कि ‘रात्रि’ शब्द का अर्थ सिद्धि को भी माना गया है एवं कई ऋषि मुनियों ने दिन में अपेक्षा में रात्रि को ज़्यादा महत्व दिया है। खास बात यह है कि शैव और शक्ति से जुड़े धर्म में रात्रि को अहम माना गया है और वैष्णव धर्म में दिन को।

रात्रि के महत्वों को अगर हम ठीक ढंग से पहचाने तब हमें समझ आएगा कि रात्रि हमारे जीवन में कई बदलाव ला सकती है और अनजाने में लाती भी है। एक छोटा मगर फलदायक महत्व यह है कि रात्रि में शांति का आभास होता है, और एक साधक के लिए रात्रि से बढ़कर और कुछ नहीं। दिन की भागति और झुंझलाती दौड़ से यह रात्रि ही है जो आपको खुद से मिलने का अवसर देती है। मौका देती है आपको आपके और अपनों के बारे में सोचने के लिए।


अगर रात्रि की बात शुरू ही हुई है तो बता दूँ कि नवरात्र का फल भी रात्रि साधना से ही मिलेगा। नवरात्रे साधना, ध्यान, व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, तंत्र, त्राटक, योग इन सब का मेल है और व्यक्ति इन सब पर विजय पा लेता है उन्हें हम सिद्ध पुरुष कहते हैं। यही कारण है की जो लोग सिद्धि पाने का प्रयास करते हैं या मोह-माया को खुद से दूर करना चाहते हैं वह रात्रि में ही ध्यानमग्न रहते हैं या बीज मंत्रों का जाप करते हैं।

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नवरात्र उस माह में आती है जिस में ऋतू में बदलाव आना शुरू होता है या हम नए मौसम में प्रवेश कर रहे होते हैं जिस कारण इस पर्व का नाम नव जिसका मतलब ‘नया’ से आरम्भ होता है। अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह वही महीना है है जिस में रोग हम पर आक्रमण करते हैं किन्तु इन नवरात्री नियमों का पालन कर के हम रोग मुक्त भी रह सकते हैं।

एक तथ्य यह भी है कि रात्रि में रेडियो तरंगो का आना-जाना दिन के मुकाबले काफी सरल रहता है, जिसका सबसे मजबूत उदाहरण है रेडियो फ्रीक्वेंसी। इसलिए हम रात्रि में जब भी मंत्र का उच्चारण करते हैं वह तरंगो का रूप ले कर ईश्वर के पास जाती हैं और हमारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। रात्रि में आवाज़ दिन के मुकाबले बहुत दूर तक जाती है, यह भी रात्रि का महत्वपूर्ण होने का कारण हो सकता है।

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(NewsGram Hindi)

अगले वर्ष भारत एक बार फिर सबसे बड़े राजनीतिक धमाचौकड़ी का साक्षी बनने जा रहा है। जिसकी तैयारी में अभी से राजनीतिक दल अपना खून पसीना एक कर रहे हैं। यह चुनावी बिगुल फूंका गया है राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहाँ जातीय समीकरण, विकास और धर्म पर खूब हो-हल्ला मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश चुनाव में जहाँ एक तरफ भाजपा हिन्दुओं को अपने पाले करने में जुटी वहीं विपक्ष ब्राह्मणों को अपनी तरफ करने के प्रयास में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। आने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव क्या मोड़ लेगा इसका उत्तर तो समय बताएगा, किन्तु ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

आपको बता दें कि वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में सभी पार्टियों ने खूब खून-पसीना बहाया था, किन्तु सफलता का परचम भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों को जीत कर लहराया था। वहीं अन्य पार्टियाँ 50 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई। भाजपा की इस जादुई जीत का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के धुआँधार रैली और मुख्यमंत्री चेहरे को जाहिर न करने को गया। किन्तु उत्तर-प्रदेश 2022 का आगामी चुनाव सत्ता पक्ष के चुनौतियों से भरा हो सकता है। वह इसलिए क्योंकि सभी राजनीतिक पार्टी अब धर्म एवं जाति की राजनीति के अखाड़े में कूद गए हैं। इसमें सबसे आगे हैं यूपी में राजनीतिक बसेरा ढूंढ रहे एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन औवेसी! जो खुलकर रैलियों में और टीवी पर यह कहते हुए सुनाई दे जाते हैं कि वह प्रदेश के मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए उत्तर प्रदेश आए हैं।

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(NewsGram Hindi, Shantanoo Mishra)

हिन्दू या हिंदुत्व, एक धर्म है या विचार इसका फैसला आज के समय में ग्रंथ, पुराण या धर्माधिकारी नहीं करते, अपितु इसका फैसला करता है कंप्यूटर के सामने बैठा वह तथाकथित बुद्धिजीवि जिसे न तो धर्म का ज्ञान है और न ही सनातन संस्कृति की समझ। इन्हें हम आम भाषा में लिब्रलधारी या लिब्रान्डू भी कहते हैं। यही तबका आज देश में ‘हिन्दू बांटों आंदोलन‘ का मुखिया बन गया है। समय-समय पर इस तबके ने देश में हिन्दुओं को हिंदुत्व के प्रति ही भड़काने का काम किया है। महिलाऐं यदि हिन्दू परंपरा अनुसार वस्त्र पहनती हैं तो वह इस तबके के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर चोट है और साथ ही यह पुराने जमाने का है, किन्तु इसी तबके के लिए हिजाब सशक्तिकरण की मूरत है। जब लव-जिहाद या धर्मांतरण के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी तब भी इस तबके ने इसे प्रेम पर चोट या अभिव्यक्ति की आजादी जैसा बेतुका रोना रोया था। दिवाली पर जानवरों के प्रति झूठा प्रेम दिखाकर पटाखे न जलाने की नसीहत देते हैं और बकरी-ईद के दिन मौन बैठकर, सोशल मीडिया पर मिया दोस्त द्वारा कोरमा खिलाए जाने का इंतजार करते हैं।

सवाल करना एक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, किन्तु स्वयं को लिब्रलधारी बताने के लिए श्री राम और सनातन धर्म की परम्पराओं पर प्रश्न-चिन्ह उठाना कहाँ की समझदारी है? इसी तबके ने भारत में मुगलिया शासन को स्वर्णिम युग बताया था, साथ ही हिन्दुओं को मारने वाले टीपू सुल्तान जैसे क्रूर शासक को करोड़ों का मसीहा भी बताया था। लेकिन आज जब भारत का जागरुक युवा ‘छत्रपति सम्राट शिवाजी महाराज’ का नाम गर्व से लेता है तो यह तबका उसे भी संघी या बजरंग दल का बताने में देर नहीं करता। इस तबके के लिए हिंदुत्व धर्म नहीं एक पार्टी की विचारधारा और यह इसी मानसिकता को विश्व में अन्य लोगों तक पहुंचाकर हिन्दुओं को बदनाम करने का कार्य कर रहे हैं।

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(NewsGram Hindi, साभार: Wikimedia Commons)

आज शहीद स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे(Mangal Pandey) की 194वीं जयंती है। मंगल पांडे(Mangal Pandey) पराधीन भारत की आजादी के वह जननायक थे जिनके एक नारे ने स्वतंत्रता के संग्राम को नई ऊर्जा दिया था। मंगल पांडे(Mangal Pandey) को स्वतंत्रता का जनक भी कहा जाता है जिनके नक्शे-कदम पर चलकर शहीद भगत सिंह, आजाद जैसे वीरों ने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मंगल पांडे(Mangal Pandey) उन वीरों में से थे जिनके लिए धर्म एवं स्वाभिमान भी बड़ा था और राष्ट्र की स्वतंत्रता भी।

मंगल पांडे!

शहीद मंगल पांडे 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में जन्में थे। मंगल पांडे(Mangal Pandey) क्रांतिकारी के रूप में उभरने से पूर्व कलकत्ता (कोलकाता) के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” के सिपाही थे। अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों को भी बहुत प्रताड़ित किया था। मंगल पांडे के साथ-साथ अन्य सैनिकों ने भी इन प्रताड़नाओं को सहा, किन्तु पानी सर से तब ऊपर चला गया जब भारतीय सैनिकों को सूअर और गाय की चर्भी लगे बारूद वाली बंदूक दी गईं। मंगल ब्राह्मण थे जिस वजह से उन्होंने अपने साथी सिपाहियों के साथ इसकी शिकायत बड़े अधिकारीयों से की। किन्तु इस मामले पर सुनवाई न होता देख उनमें प्रतिशोध की भावना उमड़ पड़ी।

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