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क्या बुंदेलखंड को इस बार जलसंकट से मुक्ति मिल पाएगी?

देश और दुनिया में सूखा, गरीबी, भुखभरी और बेरोजगारी के लिए पहचाने जाने वाले बुंदेलखंड की धरती की प्यास को बुझाने के लिए फिर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की तैयारी है, योजना बन चुकी है और इसकी जिम्मेदारी भी तय की जा चुकी है, मगर सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई में इस

देश और दुनिया में सूखा, गरीबी, भुखभरी और बेरोजगारी के लिए पहचाने जाने वाले बुंदेलखंड की धरती की प्यास को बुझाने के लिए फिर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की तैयारी है, योजना बन चुकी है और इसकी जिम्मेदारी भी तय की जा चुकी है, मगर सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई में इस राशि से जमीन की प्यास बुझेगी या पानी के पैरोकारों की। यह वह इलाका है जो पूरे साल पानी के संकट से दो-चार होता है, मगर इसकी याद सरकारी मशीनरी को दिसंबर जनवरी में आती है, क्योंकि प्यासी धरती और प्यासे लोगों के गले को तर करने के नाम पर फसल काटने का मौसम जो आ जाता है। हर साल यही होता है, दिसबंर से ही बैठकों का दौर शुरू हो जाता है, पानी पर चिंता जताई जाने लगती है, तालाबों की जर्जर हालत की बात होने लगती है, योजनाएं मंजूर कराने और इसके लिए आवंटित राशि को अपने हिस्से में लेने की होड़ लग जाती है। यही सिलसिला फिर चल पड़ा है।

वैसे तो बुंदेखलंड मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सात-सात जिलों को मिलाकर बनता है। बात मध्य प्रदेश के हिस्से की करते हैं। यहां के छह जिलों में भू-जल स्तर बढ़ाने के लिए एक योजना बनाई गई है। इस योजना में छह जिलों के नौ विकासखंडों की 672 ग्राम पंचायतों में अटल भू-जल योजना के तहत जनभागीदारी से भू-जल स्तर को बढ़ाने के लिए ग्राम स्तरीय जल सुरक्षा योजना के तहत मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद ने एक कार्ययोजना तैयार करेगी।

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बताया गया है कि इस पंच वर्षीय कार्ययोजना के अंतर्गत सागर, पथरिया, छतरपुर, नौगांव, राजनगर, बल्देवगढ़, पलेरा, अजयगढ़ एवं निवाड़ी के विकासखंडों के लिए 11 करोड़ 25 लाख की राशि स्वीकृत की गई है। इस योजना का क्रियान्वयन भारत सरकार एवं राज्य सरकार की प्रचलित योजनाओं मनरेगा, पीएमकेएसवाय, बुंदेलखंड पैकेज एवं आईडब्ल्यूएमपी आदि के तहत किया जाएगा। इसके लिए स्टेट प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट अटल भू-जल योजना एवं मप्र जन अभियान परिषद के मध्य समझौता हुआ है।

बुंदेलखंड को जलसंकट से मुक्ति दिलाने और भू जल स्तर को बढ़ाने के लिए पहली दफा योजना नहीं बनी है, इससे पहले इस इलाके में हजारों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। बुंदेलखंड पैकेज की राशि 32 सौ करोड़ में से ज्यादातर राशि पानी के लिए ही आई, इतना ही नहीं दीगर योजनाएं बनीं, सरकारी और गैर सरकारी लोगों ने पानी के संरक्षण की मुहिम चलाई। सरकार और अन्य माध्यमों से राशि आई, मगर हालात नहीं बदले।

क्षेत्रीय जानकार रवींद्र व्यास का कहना है कि, “इस क्षेत्र का दुर्भाग्य है कि पानी का संकट हल नहीं हो पा रहा है, बल्कि यहां की जल संरचनाएं लगातार कम होती जा रही हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर जो धनराशि आती है वह जाती कहां है। इस क्षेत्र में कोई तो वह स्थान बताएं, जहां की तस्वीर बदली हो, पानी की समस्या खत्म हुई हो, हां कुछ तस्वीरें जरुर मीडिया में आ जाती हैं कि हालात बदले, मगर जमीनी हकीकत कुछ और ही होती है। वास्तव में इसकी सोशल ऑडिट होना चाहिए और पंचायतों की हिस्सेदारी बढ़ाई जाए तभी लूट पर रोक लग पाएगी। (आईएएनएस)

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भारत के तमिलनाडु राज्य में बसा कन्याकुमारी स्थल (wikimedia commons)

कुमारी देवी मंदिर :

यह स्थान श्रीपद पराई के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन मान्यताओं की बात करे तो इसके अनुसार इस स्थान पर कभी कन्याकुमारी ने भी तपस्या की थी। इसलिए इस स्थान को कन्याकुमारी कहा जाता है। यहां कुमारी देवी के पैरों के निशान भी हैं। कन्याकुमारी के समुद्री तट पर ही कुमारी देवी का मंदिर है, जहां देवी पार्वती के कन्या रूप को पूजा जाता है। प्राचीन कथाओ में कहा गया है कि भगवान शिव ने एक असुर वाणासुर को वरदान दिया था कि कुंवारी कन्या के अलावा किसी के हाथों उसका वध नहीं होगा। प्राचीनकाल में कभी भारत पर शासन करने वाले राजा भरत की आठ पुत्री और एक पुत्र था। राजा भरत ने अपने साम्राज्य को नों बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी संतानों को दे दिया था और दक्षिण का हिस्सा उनकी पुत्री कुमारी को मिला। कुमारी भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं और भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं। कहा जाता हैं कि विवाह की तैयारियां होने लगीं लेकिन नारद मुनि यह चाहते थे कि वाणासुर नामक असुर का कुमारी के हाथों वध हो जाए। इस कारण शिव और देवी कुमारी का विवाह नहीं हो पाया। कुमारी को शक्ति देवी का अवतार माना जाने लगा और वाणासुर के वध के बाद कुमारी की याद में ही दक्षिण भारत के इस स्थान को 'कन्याकुमारी' कहा जाने लगा। यह भी कहा जाता है कि शहर का नाम देवी कन्या कुमारी के नाम पर पड़ा है । प्रचलित कथाओं में कुमारी देवी को भगवान श्रीकृष्ण की बहन भी माना गया है। प्रचलित कथा के अनुसार ऐसा कहा गया है कि देवी का विवाह संपन्न न हो पाने के कारण बचे हुए दाल-चावल बाद में कंकर बन गए। आश्चर्यजनक रूप से कन्याकुमारी के समुद्र तट की रेत में दाल और चावल के आकार और रंग-रूप के कंकर बड़ी मात्रा में देखे जा सकते हैं।

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यूएनडीपी का चिन्ह (Wikimedia Commons)

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक विकास नेटवर्क है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की स्थापना 22 नवंबर 1965 को हुई थी। यह राष्ट्रों के बीच तकनीकी और निवेश सहयोग को बढ़ावा देता है और देशों को ज्ञान, अनुभव और संसाधनों से जोड़ता है ताकि लोगों को अपने लिए बेहतर जीवन बनाने में मदद मिल सके। संयुक्त राष्ट्र की विकास एजेंसी के रूप में, यूएनडीपी सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में देशों की मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यूएनडीपी के कार्यक्रमों में गरीबी कम करने, विकासशील देशों में बीमारियों के प्रसार का इलाज और मुकाबला करने के लिए रणनीति विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम लोगों के जीवन की गुणवत्ता को मापने के लिए हर साल मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट प्रकाशित करता है। पहला मानव विकास रिपोर्ट 1990 में पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब उल हक और भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन द्वारा लॉन्च किया गया था। तब से लेकर अब तक हर साल यह रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है। मानव विकास सूचकांक प्रमुख क्षेत्रों में देश के प्रदर्शन के आधार पर सभी देशों को रैंक देता है। इन प्रमुख क्षेत्रों में शैक्षिक स्तर, स्वास्थ्य की स्थिति और एक सभ्य जीवन स्तर शामिल हैं। मानव विकास सूचकांक में 0 से 1.0 के पैमाने पर देश को रैंक किया जाता है, जिसमें 1.0 उच्चतम मानव विकास है।

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पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह (wikimedia commons)

हाल ही में कांग्रेस की पंजाब इकाई के प्रमुख के रूप में नियुक्त किए गए नवजोत सिंह सिद्धू के साथ जारी राजनीतिक खींचतान के बीच कैप्टन अमरिंदर सिंह ने शनिवार को पंजाब के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। राजभवन के गेट पर 79 वर्षीय अमरिंदर सिंह ने कहा कि वह खुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं। बात यह है कि यह एक महीने में तीसरी बार हो रहा है कि विधायकों को बैठक के लिए बुलाया जा रहा है, मेरे नेतृत्व पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

अमरिंदर सिंह का यह फैसला कांग्रेस के लिए मुसीबत बन सकता है क्योंकि पंजाब के चुनाव में 6 महीने से भी काम के समय रह गया है। अमरिंदर सिंह ने कहा कि "मैंने आज सुबह कांग्रेस अध्यक्ष (सोनिया गांधी) को फोन किया और उनसे कहा कि मैं इस्तीफा देने जा रहा हूं। उन्होंने कहा कि भविष्य की रणनीति उनके समर्थकों से चर्चा के बाद तय की जाएगी।

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