सरकारी नीतियों और जागरूकता के कारण देश में लगातार प्रगति कर रही हैं महिलाएं

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सरकारी नीतियों और जागरूकता के कारण देश में लगातार प्रगति कर रही हैं महिलाएं। (IANS)

देश में प्रतिवर्ष 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस(National Girl Child Day) मनाया जाता है और भारत में बच्चियों की हालत में सुधार करने तथा उनके आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय(Ministry Of Women And Child Development) ने इस दिवस को मनाने का फैसला किया है। एमथ्री एम फाउंडेशन की ट्रस्टी डा. पायल कनोदिया कहती है वेद भी बालिकाओं पर, विशेष रूप से लड़कियों की शिक्षा पर जोर देते हैं। वैदिक साहित्य न केवल लड़कियों को विद्वान होने के लिए प्रोत्साहित करता है, बल्कि यह भी व्यक्त करता है कि यह सुनिश्चित करना प्रत्येक माता-पिता का कर्तव्य है कि उनकी बेटी को शिक्षित और शिक्षित किया जाए। ऋग्वेद कहता है कि जब बेटी पति के घर जाती है तो माता-पिता को अपनी बेटियों को बौद्धिकता और ज्ञान की शक्ति का उपहार देना चाहिए । उन्होने दावा किया कि अथर्ववेद विशेष रूप से महिला सशक्तिकरण की वकालत करता है।

वह मजदूरों के बच्चों, खासकर बच्चियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए समर्पित रूप से काम कर रही है।

इस देश के इतिहास में कई शक्तिशाली महिलाओं को देखा जा सकता है। रानी लक्ष्मी बाई और रजिया सुल्तान जैसे कई उत्कृष्ट उदाहरण हैं। रानी लक्ष्मी बाई को ‘झांसी की रानी’ के नाम से जाना जाता है जिन्हें 1857-58 के भारतीय विद्रोह के दौरान उनकी वीरता के लिए याद किया जाता है। रजिया सुल्तान जो भारत की पहली महिला शासक थीं और दिल्ली में 1236 से 1240 के अंत तक शासन किया था।

वर्तमान सदी में पहली भारतीय महिला चिकित्सक, आनंदीबाई गोपालराव जोशी ,अंतरिक्ष में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला , भारत में पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी भारत में पहली महिला आईपीएस अधिकारी बनीं, सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त पहली महिला न्यायाधीश,न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीवी ,छह विश्व चैंपियनशिप में से प्रत्येक में पदक जीतने वाली एकमात्र महिला मुक्केबाज मैरी कॉम , माउंट एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल ,भारतीय वायु सेना में अकेले उड़ान भरने वाली पहली महिला पायलट बनीं हरिता कौर देओल नारी शक्ति के कई उदाहरण हैं।

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महिला और बाल विकास मंत्रालय (Wikimedia Commons)

कनोदिया ने कहा पेप्सिको की पूर्व अध्यक्ष और सीईओ इंदिरा नूयी और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) में मुख्य अर्थशास्त्री के रूप में नियुक्त होने वाली पहली भारतीय महिला गीता गोपीनाथ जैसी महिलाओं की उपलब्धियों को कौन नजरअंदाज कर सकता है।

वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा प्रकाशित ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 में भारत ने बेहतर प्रदर्शन नहीं किया है जिसमें भारत को 156 देशों में से एक के स्कोर में से 0.625 से अंकों के साथ 140वें स्थान पर रखा गया है, हालांकि भारत की महिला आबादी पुरुष आबादी से अधिक है। पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट (एनएफएचएसआर-5),2019-21 के अनुसार भारत में अब प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाएं हैं।

भारत सरकार पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा कार्यक्रमों पर ध्यान देकर अपने नजरिए को लगातार बनाए हुए है ‘चलो पढाएं कुछ कर दिखें’, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ और किशोरियों के लिए कई अन्य योजनाएं इस बात की गवाह हैं कि भारत ने आज क्या हासिल किया है। प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाएं होने की स्थिति कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे दुनिया नजरअंदाज कर सकती है, यह जानते हुए कि भारत जनसंख्या के मामले में दूसरा सबसे बड़ा है। भारत लैंगिक समानता को लेकर संवेदनशील देश बन गया है और पिछले कई वर्षों से बालिकाओं के प्रति जिम्मेदारी और प्रतिबद्धता की भावना विकसित हुई है। एक स्वस्थ मां एक स्वस्थ बेटी को जन्म देती है और अब वह स्वस्थ नागरिक भी पैदा कर रही है। गांवों और छोटे शहरों में मानसिकता बदल गई है और यह नजरिया समाज को संतुलित करने जा रहा है।

कनोदिया के अनुसार सामाजिक निकाय ,शिक्षा और जागरूकता के जरिए लिंगानुपात में बदलाव के प्रमुख कारक हैं।

उन्होंने कहा ग्रामीण स्तर पर लगातार शिक्षा और जागरूकता ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका श्रेय न केवल केंद्र और राज्य स्तर की सरकारों को जाता है बल्कि उन सभी फाउंडेशनों, गैर सरकारी संगठनों और व्यक्तियों को भी जाता है जो संवेदनशील बनाने के लिए वर्षों से अथक प्रयास कर रहे हैं। अच्छी तरह से जागरू क महिलाएं समाज में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाती हैं, और यह बार-बार साबित हुआ है। यह सुनिश्चित करने की हमारी एक बड़ी जिम्मेदारी है कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली युवा महिलाओं को भी कॉपोर्रेट जगत में महत्वपूर्ण स्थान हासिल हो ।

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वह कहती हैं इतिहास में यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि लड़की का जन्म समृद्धि और सौभाग्य लाता है। भारत में लड़कियों को लक्ष्मी के रूप में स्वीकार किया जाता है। यह भी सच है कि लड़कियों का सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण कई और अनुकरणीय उपलब्धियां ला सकता है। हमें लड़कियों को समाज के सभी वर्गों में समान रूप से स्वीकार करने की जरूरत है,चाहे वे कामकाजी हो या अपने घरों में।

Input-IANS; Edited By-Saksham Nagar

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