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थोड़ा हट के

लाह की खेती से लाखों कमा रही झारखंड की महिला किसान

झारखंड(Jharkhand) के पश्चिमी सिंहभूम जिले के रूमकूट गांव की रहने वाली रंजीता देवी की लाह की खेती ने जिंदगी बदल दी।

By: मनोज पाठक


झारखंड(Jharkhand) के पश्चिमी सिंहभूम जिले के रूमकूट गांव की रहने वाली रंजीता देवी की लाह(lacquer farming) की खेती ने जिंदगी बदल दी। रंजीता उन महिलाओं में शामिल हैं, जो लाह की खेती((lacquer farming)) से सालाना तीन लाख रुपए तक की आमदनी प्राप्त कर रही हैं। रंजीता कहती हैं, दूरस्थ क्षेत्र होने के कारण उनकी आजीविका मुख्यत: जंगल और वनोपज पर निर्भर है। उनके परिवार में पहले भी लाह की खेती(lacquer farming) की जाती थी, लेकिन अब वैज्ञानिक विधि से खेती करने से उपज बढ़ाने के बारे में जानकारी मिली और फिर उत्पादन बढ़ गया।

रंजीता ऐसी केवल एकमात्र महिला नहीं है, जिनकी जिंदगी लाह की खेती(lacquer farming) ने बदल दी है। झारखंड(Jharkhand) में 73 हजार से ज्यादा ग्रामीण परिवारों को लाह की वैज्ञानिक खेती से जोड़ा गया है, जिनमें अधिकतर अति गरीब एवं सुदूरवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीण परिवार हैं।राज्य सरकार द्वारा ग्रामीण महिलाओं को लाह की वैज्ञानिक खेती से जोड़कर अत्याधुनिक प्रशिक्षण के जरिए आमदनी बढ़ोतरी के प्रयास किये जा रहे हैं। इस पहल से राज्य की वर्ष 2020 में करीब 2000 मीट्रिक टन लाह का उत्पादन ग्रामीण महिलाओं द्वारा किया गया है।

झारखंड(Jharkhand) सरकार भी लाह की खेती(lacquer farming) को कृषि का दर्जा देने में जुटे हैं, जिससे राज्य की ग्रामीण महिलाओं को वनोपज आधारित आजीविका से जोड़कर आमदनी बढ़ोतरी का कार्य हो सके। झारखंड(Jharkhand) के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन(Hemant Soren) भी कहते हैं कि भारत आत्मनिर्भर देश तभी बनेगा, जब ग्रामीण क्षेत्र का सशक्तिकरण होगा।सोरेन(Hemant Soren) कहते हैं, “राज्य सरकार लाह की खेती को कृषि का दर्जा देगी। इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय करेगी। किसानों को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाना सरकार का संकल्प है। इस बाबत कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिसके जरिए किसानों(farmers) को अनुदान, ऋण और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही है।”

लाह की खेती से महिलाएं बन रहीं हैं सशक्त।(सांकेतिक चित्र, फाइल फोटो)

रंजीता कहती हैं, “जे.एस.एल.पी.एस के माध्यम से लाह की आधुनिक खेती(lacquer farming) से सम्बंधित प्रशिक्षण प्राप्त किया। सरकार की ओर से लाह का बीज भी उपलब्ध कराया गया।” पिछले वर्ष रंजीता ने 300 किलो बिहन (बीज) लाह के रूप में लगाया, जिससे उन्हें 15 क्विंटल लाह की उपज प्राप्त हुई और उससे उन्हें तीन लाख रुपए की आमदनी हुई। गोईलकेरा प्रखंड की महिला शोभा देवी कहती हैं कि लाह की खेती में लागत नाममात्र है, लेकिन उससे कई गुना ज्यादा उपज एवं मुनाफा प्राप्त हो रहा है।

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महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना के तहत महिला किसानों को लाह उत्पादन, तकनीकी जानकारी, प्रशिक्षण और बिक्री हेतु बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है। समूहों के माध्यम से लाह की सामूहिक खेती, बिक्री हो रही है। किसानों को उचित बाजार उपलब्ध कराने के लिए राज्य भर में 460 संग्रहण केंद्र और 25 ग्रामीण सेवा केंद्र चलाए जा रहे हैं। हालांकि अभी भी लाह के लिए बहुत कुछ किया जाना शेष है। लाह को खेती का दर्जा देने के लिए संघर्ष कर रहे पलामू जिला के कुंदरी निवासी कमलेश सिंह कहते हैं कि कुंदरी वन क्षेत्र में ही लाह के लाखों पलाश के पेड हैं, लेकिन इसका सही उपयोग नहीं हो रहा है। वे कहते हैं कि पलाश के फूल से पिछले वर्ष गुलाल बनाया गया था, लेकिन इस वर्ष इसके लिए पहल नहीं की गई।

उन्होंने कहा कि अगर लाह को खेती का दर्जा मिल जाता है, तो प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर बनने को झारखंड(Jharkhand) में साकार किया जा सकता है। उन्होंने झारखंड सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि प्र्रकृति ने झारखंड को आत्मनिर्भर बनने के लिए काफी कुछ दिया है लेकिन सरकार ही रूठी है।(आईएएनएस-SHM)

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