नाग्यरेव का रहस्य : जहाँ औरतों ने बेबसी में पतियों को मौत का घूंट पिलाया

हंगरी (Hungarian) का नाग्यरेव गाँव (Nagyrev Village), जहाँ औरतों ने मजबूरी और ज़ुल्म से तंग आकर पतियों को धीरे-धीरे ज़हर (Poisonous) देकर मार डाला। यह सिर्फ़ हत्या नहीं थी, बल्कि औरतों की बेबसी, पितृसत्ता और समाज की कठोर सच्चाई का प्रतीक बन गया।
नाग्यरेव हंगरी (Hungarian) की राजधानी बुडापेस्ट से करीब 130 किलोमीटर दक्षिण में बसा हुआ गाँव था। यह गाँव बहुत साधारण था, लेकिन 1911 से 1929 के बीच यह धीरे-धीरे मौत का अड्डा बन गया।
नाग्यरेव हंगरी (Hungarian) की राजधानी बुडापेस्ट से करीब 130 किलोमीटर दक्षिण में बसा हुआ गाँव था। यह गाँव बहुत साधारण था, लेकिन 1911 से 1929 के बीच यह धीरे-धीरे मौत का अड्डा बन गया। (AI)
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14 दिसंबर 1929 को अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स में एक ऐसी ख़बर छपी जिसने पूरे यूरोप ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। इस ख़बर में बताया गया था, हंगरी के एक छोटे-से गाँव नाग्यरेव (Nagyrev Village) में रहने वाली महिलाओं ने अपने पतियों और पुरुष रिश्तेदारों को धीरे-धीरे ज़हर (Poisonous) देकर मौत के घाट उतार दिया है। इस ख़बर में यह भी बताया गया कि करीब 50 महिलाओं पर मुक़दमा चल रहा है। आरोप यह था कि इन्होंने महिलाओं के साथ मिलकर दर्जनों मर्दों को आर्सेनिक नामक ज़हर पिलाकर मार डाला। यह दृश्य देखकर लोग दंग रह गए। यह सिर्फ़ हत्या की ख़बर नहीं थी, बल्कि उस दौर की सामाजिक व्यवस्था और औरतों की बेबसी का काला सच भी था।

नाग्यरेव: एक ‘मौत का गाँव’

नाग्यरेव हंगरी (Hungarian) की राजधानी बुडापेस्ट से करीब 130 किलोमीटर दक्षिण में बसा हुआ गाँव था। यह गाँव बहुत साधारण था, लेकिन 1911 से 1929 के बीच यह धीरे-धीरे मौत का अड्डा बन गया। अंदाज़ा है कि यहाँ 50 से 300 पुरुषों की मौतें ज़हर (Poisonous) से हुईं थी। इतिहासकारों ने इसे "आधुनिक दौर में महिलाओं द्वारा पुरुषों की सबसे बड़ी सामूहिक हत्या" कहा है।

इस कहानी को समझने के लिए उस दौर का सामाजिक ढाँचा जानना बहुत ज़रूरी है। तभी समझ पाएंगे की आखिर सच क्या है, इस गाँव में लड़कियों की शादियाँ ज्यादातर उनके परिवार की मर्ज़ी से तय होती थी। यहां पर कई बार 14-15 साल की बच्चियों की शादी उनसे कहीं ज़्यादा उम्रदराज़ पुरुषों से कर दी जाती थी। शादी के बाद औरतों पर घरेलू हिंसा, शराबखोरी, बलात्कार और शोषण यहां के लिए आम बात थी। यहां तलाक़ लेना लगभग नामुमकिन था। अगर एक बार शादी हो गई तो चाहे पति कैसा भी हो उनके साथ ही जीवन भर रहना होता था, अगर पति उम्रदराज़ है या उसमें कोई भी समस्या है उसके बाद भी हर हाल में उसी पुरुष के साथ जीवन भर रहना पड़ता था। यानि अगर एक औरत दुखी थी, तो वह अपनी ज़िंदगी भर उसी रिश्ते में फँसी रहती थी। इन हालात में औरतें अपने पतियों से छुटकारा पाने का कोई वैध रास्ता नहीं ढूँढ पाती थीं। यही बेबसी ने धीरे-धीरे ज़हर का रास्ता चुनने के लिए महिलाओं को मजबूर कर दिया।

इस मामले में जिस महिला का नाम बार-बार सामने आया, वह थी ज़ोज़साना फ़ाज़कास।
इस मामले में जिस महिला का नाम बार-बार सामने आया, वह थी ज़ोज़साना फ़ाज़कास। (AI)

ज़हर का खेल कैसे शुरू हुआ ?

इस मामले में जिस महिला का नाम बार-बार सामने आया, वह थी ज़ोज़साना फ़ाज़कास। वह नाग्यरेव गाँव (Nagyrev Village) की दाई थीं, नाग्यरेव में गाँव न कोई डॉक्टर था, और न ही कोई पादरी। इसलिए लोगों की बीमारियों और गर्भ से जुड़ी परेशानियों का इलाज वही करती थीं। धीरे-धीरे उस गाँव महिलाएँ अपनी घरेलू समस्याएँ भी उनसे बाँटने लगीं। फ़ाज़कास ने इन औरतों को एक “हल” सुझाया उन्होंने उन महिलाओं से कहा “अगर पति से जान नहीं छूट रही, अगर ज़ुल्म सहना मुश्किल है, तो उसके खाने में यह दवा मिला दो।” यह “दवा” असल में आर्सेनिक का घोल थी, जो चूहों को मारने में भी इस्तेमाल होता था। धीरे-धीरे यही गाँव का गुप्त हथियार बन गया।

पहली हत्या 1911 में हुई। शुरू में किसी को शक भी नहीं हुआ। लेकिन फिर पहले विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान हालात बदले। पुरुष युद्ध के लिए गए और महिलाएँ थोड़ी आज़ाद हुईं। उन्होंने खेत-खलिहान संभाले शुरू किये , और अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीने लगीं। लेकिन जैसे ही युद्ध ख़त्म हुआ और पुरुष लौटे, महिलाओं को लगा कि उनकी आज़ादी छिन रही है। तब औरतों ने और भी तेज़ी से पतियों को ज़हर देना शुरू कर दिया।

इस प्रकार से मौतों का सिलसिला चलता रहा। पुरुष एक-एक करके मरते गए और सबको गाँव के कब्रिस्तान में दफ़ना दिया गया। फिर 1929 में पुलिस को अचानक शक हुआ और कई कब्रों को खोला गया उसके बाद लाशों की जाँच की गई। नतीजा चौंकाने वाला था, जाँच के बाद पता चला की हर लाश में आर्सेनिक है जिसकी वजह से इतनी संख्यां में मौतें हुई है।

पहली हत्या 1911 में हुई। शुरू में किसी को शक भी नहीं हुआ।
पहली हत्या 1911 में हुई। शुरू में किसी को शक भी नहीं हुआ।(AI)

19 जुलाई 1929 को जब पुलिस फ़ाज़कास को पकड़ने पहुँची, तो वह सब समझ गईं थीं, उनको पता था की पुलिस क्यों आई है। उन्होंने वही ज़हर पी लिया यह वही ज़हर था जो वो सालों से दूसरों को देती आई थीं। उसके बाद पुलिस उनके घर पहुँची, तब तक वह मर चुकी थीं। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जल्द ही गाँव की और कई महिलाओं के नाम सामने आए। फिर 1929 में पास के शहर सोज़नोक में मुक़दमा चला। 26 महिलाओं पर केस दर्ज हुआ। 8 को फाँसी की सज़ा दी गई और 7 को उम्रक़ैद मिली उसके बाद बाक़ी को अलग-अलग सज़ाएँ हुईं। लेकिन असली सच्चाई कभी पूरी तरह सामने नहीं आई, क्योंकि बहुत कम महिलाओं ने अपराध स्वीकार किया था।

लोगों ने नाग्यरेव (Nagyrev Village) को “क़ातिलों का गाँव” कहना शुरू किया। लेकिन अगर गहराई से देखें, तो यह गाँव उस दौर की महिलाओं की मजबूरी और पीड़ा का प्रतीक था। उन महिलांओं को कानून या समाज से कोई मदद नहीं मिली, तो उन्होंने ग़लत लेकिन असरदार रास्ता चुन लिया इतिहासकार मानते हैं कि नाग्यरेव की औरतों ने जो किया, वह अपराध था। लेकिन यह अपराध पितृसत्ता और सामाजिक अन्याय की उपज था। अगर उन्हें तलाक़ का अधिकार, समानता का हक़ और सुरक्षित जीवन जीने के लिए मिला होता, तो शायद यह कहानी कभी जन्म ही नहीं लेती।

19 जुलाई 1929 को जब पुलिस फ़ाज़कास को पकड़ने पहुँची, तो वह सब समझ गईं थीं, उनको पता था की पुलिस क्यों आई है। उन्होंने वही ज़हर पी लिया यह वही ज़हर था जो वो सालों से दूसरों को देती आई थीं।
19 जुलाई 1929 को जब पुलिस फ़ाज़कास को पकड़ने पहुँची, तो वह सब समझ गईं थीं, उनको पता था की पुलिस क्यों आई है। उन्होंने वही ज़हर पी लिया यह वही ज़हर था जो वो सालों से दूसरों को देती आई थीं। (AI)

निष्कर्ष

नाग्यरेव का ज़हरकांड हमें यह सिखाता है कि जब किसी इंसान को, ख़ासकर एक महिला, को हर तरफ से घेर लिया जाता है, उनको न आवाज़ उठाने का हक़ दिया जाता है, और न ही आज़ादी का रास्ता दिया जाता है, तो वह ऐसे में अंततः ऐसा रास्ते चुन सकती है जो पूरे समाज को हिला दें। यह कहानी सिर्फ़ हत्या की सनसनी नहीं, बल्कि उस दौर की औरतों की दबी हुई चीख़ है। आज भले ही नाग्यरेव को लोग 'ज़हर (Poisonous) का गाँव' कहें, लेकिन असल में यह गाँव हमें याद दिलाता है कि अगर इंसाफ़ और बराबरी न मिले, तो समाज किस तरह से अपनी ही नींव खोद डालता है। [Rh/PS]

नाग्यरेव हंगरी (Hungarian) की राजधानी बुडापेस्ट से करीब 130 किलोमीटर दक्षिण में बसा हुआ गाँव था। यह गाँव बहुत साधारण था, लेकिन 1911 से 1929 के बीच यह धीरे-धीरे मौत का अड्डा बन गया।
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