दहेज और एलिमनी Sora AI
सामाजिक मुद्दे

दहेज और एलिमनी: क्यों दहेज परंपरा है पर एलिमनी को 'लूट' कहा जाता है?

भारत में दहेज और एलिमनी पर समाज की सोच बिल्कुल उलटी है। दहेज गैरकानूनी होने के बावजूद परंपरा कहलाई जाती है, जबकि एलिमनी को कानूनी हक़ होते हुए भी “लूट” कहा जाता है।

न्यूज़ग्राम डेस्क

दहेज और एलिमनी दोनों महिलाओं की ज़िंदगी से जुड़े आर्थिक सवाल हैं, लेकिन समाज उन्हें उल्टा-सीधा देखता है। दहेज (Dowry) गैरकानूनी होने के बावजूद परंपरा और रीति बन गई है और इससे हर दिन महिलाएँ मरती हैं। वहीं, तलाक के बाद महिलाओं को मिलने वाली एलिमनी को अक्सर लोग लालचीपन कहकर कोसते हैं। यह दोहरी सोच, दहेज (Dowry) को स्वीकारना और एलिमनी (Alimony) को अपराध मानना, सीधे तौर पर महिलाओं के अधिकार और इज़्ज़त पर ठेस पहुँचाता है।

दहेज का सच

दहेज देना और माँगना अवैध है, पर यह रीति कई घरों में अब भी चलती है। लोग दहेज को “रिवाज़” या शादी का हिस्सा समझ लेते हैं। दहेज की माँग पैसे, गाड़ी, ज्वेलरी या ऊँची शर्तों की शक्ल में होती है। इससे लड़की के परिवार पर भारी आर्थिक दबाव बनता है और कई बार घर तोड़ने, शारीरिक या मानसिक टार्चर (Torture) और हत्या तक हो जाती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्डिंग (NCRB) के आँकड़ों की तरह, हरों मामलों में महिलाएं दहेज से जुड़ी हिंसा का शिकार होती हैं; यही वजह है कि कहा जाता है हर दिन 20 महिलाएँ दहेज के कारण मरती हैं।

यह सिर्फ आँकड़ा नहीं, एक रोज़मर्रा की भयावह हकीकत है: परिवारों में शौहर, ससुराल वाले या रिश्तेदार दहेज की माँग करते हैं; अगर माँ न दे तो दबाव, धमकी और हिंसा बढ़ती है। इस ढाँचे में कानून होने के बावजूद भी काफ़ी मामलों में शिकायत दर्ज कराना मुश्किल होता है, वकीलों और पुलिस के कदम स्लो होते हैं, या समाज चुप्पी अपनाता है।

ऐसी घटनाएँ रोज़ होती हैं

ऐसी घटनाएँ बड़ी खबर बनती हैं, पर असल में वे रोज घटती हैं। उदाहरण के तौर पर ग्रेटर नोएडा (Greater Noida) में एक युवती, निकी (Nikki) के साथ कथित दहेज-निरंतर माँग और विवाद के बाद हिंसा हुई, और उसकी मौत ने फिर से इस समस्या की तरफ़ ध्यान खींचा। यह मामला बताता है कि कैसे दहेज की माँग छोटी शुरुआत से लेकर जानलेवा अंजाम तक पहुँच सकती है। ऐसे उदाहरण साबित करते हैं कि दहेज सिर्फ़ “रिवाज़” नहीं, बल्कि कई बार जानलेवा व्यवस्था बन जाता है।

एलिमनी

जब कोई महिला तलाक के बाद एलिमनी मांगती है, तो उसका उद्देश्य जीवनयापन और इज़्ज़त बनाए रखना होता है, खासकर अगर उसने घर-परिवार के लिए करियर छोड़ा हो या बच्चों की देखभाल की हो। कानून इसके लिए व्यवस्था देता है ताकि अलगाव के बाद महिला को भरण-पोषण बनाए रखने का अधिकार मिल सके। लेकिन समाज में झूठी धारणा चलती है कि महिला “पैसा मांगकर फ़ायदा उठा रही है”। लोग कहते हैं, “लोन ले लो तो बीवी के नाम, प्रॉपर्टी लो तो माँ के नाम”, ऐसी टिप्पणी दिखाती है कि लोग महिलाओं के हक़ को समझने के बजाय उन्हें नीचा दिखाना पसंद करते हैं।

दहेज परंपरा है पर एलिमनी 'लूट'

यह दहेज-प्रथा की ही तरह पितृसत्ता की किसी और शक्ल है: दहेज से घर लड़कियाँ निकलती हैं और तलाक के बाद महिलाओं को समाज ही दोषी बना देता है। इस तरह महिलाओं को अपना हक़ लेने में शर्म महसूस कराई जाती है।

जनता और मीडिया का रोल

अक्सर समाज और मीडिया बिना पूरी सच्चाइयों के भी निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं। जब किसी सार्वजनिक या निजी तलाक़ केस की खबर आती है, तो लोगों की राय जल्दी बन जाती है, और ज़्यादातर उसे महिला के खिलाफ कर दिया जाता है। अक्सर यह देखा गया है कि लोग बातों को सुनकर, अफवाहों पर, या सिर्फ़ तरीक़े से जज कर लेते हैं, न कि तथ्यों से।

सेलिब्रिटी केस में भी यही होता है: युजवेंद्र चहल-धनश्री (Yujvendra chahal - Dhanushree) के मामले में बहुत से लोग स्थिति को समझे बिना टिप्पणी करने लगे। चहल की टी-शर्ट ने चर्चा छेड़ दी और तुरंत कुछ लोगों ने महिला को दोषी मान लिया, जबकि असलियत कानूनी समझौते और व्यक्तिगत परिस्थितियों में छिपी होती है। ऐसे रिएक्शन दिखाते हैं कि कैसे दहेज और एलिमनी के मामले में महिलाओं पर जल्दी-बुलंदी से निर्णय हो जाते हैं।

दहेज और एलिमनी—एक ही सिक्के के दो पहलू

दोनों ही प्रथाएँ महिलाओं की आर्थिक ज़रूरतों और अधिकारों से जुड़ी हैं, पर समाज अलग दो तरीकों से पेश आता है:

दहेज, ग़लत और गैरकानूनी होने के बावजूद कई परिवारों में सामान्य माना जाता है। एलिमनी, कानूनी हक़ होने के बावजूद महिलाओं को इस आदेश पर शर्मिन्दा या लालची करार दिया जाता है।

इस विरोधाभास की जड़ पितृसत्ता और आर्थिक अधिकारों की असमान समझ में है। लोग दहेज में फायदा उठाने को परंपरा कहते हैं, पर जब औरत वही आर्थिक सुरक्षा माँगे तो उसे अपराधी जैसा दिखाया जाता है।

दहेज महिलाओं की ज़िंदगियाँ छीन रहा है और हर दिन मौतों के ज़रिये यह सच साबीत होता है।

क्या बदलेगा? छोटे-छोटे कदम बड़े असर डाल सकते हैं

कानून लागू करना: दहेज विरोधी कानूनों का सख्त पालन और तेज़ जांच ज़रूरी है।

सामाजिक चेतना: स्कूल, कॉलेज और मीडिया में यह सिखाना चाहिए कि दहेज गलत है और एलिमनी कभी “लूट” नहीं।

महिला आर्थिक सशक्तिकरण: महिलाओं को काम, स्किल और आत्मनिर्भरता के अवसर देने होंगे ताकि वे दबाव में न रहें।

मैला-झाड़ (ब्लेम गेम) रोकना: जब भी तलाक की खबर आए, बिना जांच ऐसे निर्णय न बनाएं; क्रोध और अफवाहें औरतों को दोहरा नुकसान पहुंचाती हैं।

ये कदम धरातल पर बदल सकते हैं कि लोग दहेज और एलिमनी को कैसे देखते हैं।

निष्कर्ष

दहेज और एलिमनी पर हमारी सोच बदलनी चाहिए। दहेज महिलाओं की ज़िंदगियाँ छीन रहा है और हर दिन मौतों के ज़रिये यह सच साबीत होता है। दूसरी ओर, एलिमनी महिलाओं का जियोने का हक़ है, जिसे समाज ने अनैतिक कह दिया है। जब तक हम दहेज को परंपरा की तरह स्वीकार करते रहेंगे और एलिमनी को 'लूट' कहकर जज करते रहेंगे, तब तक महिलाएँ बराबरी और सुरक्षा नहीं पा सकेंगी। बदलाव चाहिए, कानूनी कार्रवाई चाहिए, और उससे भी ज़्यादा, हमारी सोच में बदलाव चाहिए। (Rh/BA)

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