गुजरात के IAS अधिकारी राजेंद्र कुमार पटेल की गिरफ्तारी से साफ़ पता चलता है कि ज़मीन से जुड़े फैसलों में भ्रष्टाचार कैसे छोटे अमाउंट से शुरू होकर करोड़ों तक पहुँच जाता है।
CLU मंज़ूरी के नाम पर प्रति फाइल 1,500 रुपये तक की रिश्वत और 800 से ज़्यादा मामलों में गड़बड़ी ने पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ED की कार्रवाई और सरकार का निलंबन यह तय करेगा कि यह केस मिसाल बनेगा या एक और फाइल बनकर रह जाएगा।
आईएएस (IAS-Indian Administrative Service) जब कभी हम इस शब्द को सुनते हैं तो हमारे मन में एक ऐसे पद की छवि उभर कर सामने आती है, जिसका समाज में एक अलग ही रुतबा माना जाता है। भारत का हर दूसरा बच्चा बचपन से ही आईएएस बनने का सपना देखता है, और इसकी वजह सिर्फ़ एक सरकारी नौकरी पाने से कही बढ़कर है। आईएएस एक ऐसा सरकारी पद है जिससे किसी भी व्यक्ति के पास वो रुतबा, वो हक़ होता है कि वह समाज में हो रहे उत्पीड़न को ख़त्म कर सके या वह सभी सुधार करे जिससे समाज को बेहतर बनाया जा सकता है। ऐसे में अगर इतने अहम पद पर काम करने वाले लोग ही लोगों को शोषित कर रहे हो या लोगों को पैसो के मामलो में लूट रहे हों तो एक आम आदमी किस पर और कैसे भरोसा करेगा ?
ठीक इसी प्रकार की खबर गुजरात राज्य से सामने आई है। गुजरात में एक आईएएस अधिकारी की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश का प्रशासनिक तंत्र वाकई भ्रष्टाचार से मुक्त है या फिर सिस्टम के भीतर सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद रखी जाती हैं।
क्या है मामला?
मामला गुजरात कैडर के 2015 बैच के आईएएस (IAS-Indian Administrative Service) अधिकारी राजेंद्र कुमार पटेल से जुड़ा है, जिन्हें 2 जनवरी 2026 को प्रवर्तन निदेशालय (ED- Enforcement Directorate ) ने रिश्वत और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किया। राजेंद्र कुमार पटेल इससे पहले सुरेंद्रनगर जिले के कलेक्टर रह चुके हैं और उनके पास ज़मीन से जुड़े अहम प्रशासनिक अधिकार थे। जांच एजेंसियों के अनुसार, भूमि उपयोग परिवर्तन (CLU) मंज़ूरी के नाम पर प्रति वर्ग मीटर 5 से 10 रुपये की दर से रिश्वत तय की गई थी, जो कई मामलों में एक फाइल पर औसतन करीब 1,500 करोड़ रुपये तक पहुँच जाती थी, और यही छोटी दिखने वाली रकम सैकड़ों फाइलों के जरिए करोड़ों के भ्रष्टाचार में बदल गई। प्रवर्तन निदेशालयकी कार्रवाई के बाद गुजरात सरकार ने उन्हें सेवा नियमों के तहत निलंबित कर दिया, लेकिन यह निलंबन अपने आप में कई सवाल छोड़ जाता है कि क्या यह केवल एक औपचारिक प्रक्रिया है या वाकई सिस्टम के भीतर जवाबदेही तय करने की कोई ईमानदार कोशिश।
जांच में क्या सामने आया?
प्रवर्तन निदेशालय की जांच के अनुसार, यह मामला भूमि उपयोग परिवर्तन (Change of Land Use – CLU) से जुड़ा है, जो किसी भी राज्य में रियल एस्टेट, उद्योग और शहरी विकास से जुड़ा बेहद संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। आरोप है कि भूमि उपयोग परिवर्तन के आवेदन पास कराने के लिए एक सुनियोजित रिश्वत तंत्र बनाया गया था, जिसमें प्रति वर्ग मीटर 5 से 10 रुपये तक की अवैध वसूली की जाती थी।
जांच एजेंसी का दावा है कि करीब 800 से अधिक भूमि उपयोग परिवर्तन फाइलों में इस तरह की गड़बड़ियां सामने आई हैं और इस पूरे नेटवर्क के जरिए 10 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध राशि इकट्ठा की गई। इस मामले में चेतन कंजरिया द्वारा 65 लाख रूपए देने की भी बात सामने आयी है। प्रवर्तन निदेशालय का यह भी कहना है कि इस पैसे को अलग-अलग माध्यमों से घुमाकर वैध दिखाने की कोशिश की गई (हाथों से लिखी गई शीट औरबदिगीताल शीट), जो सीधे तौर पर पीमलए (PMLA-Prevention of Money Laundering Act) के तहत अपराध की श्रेणी में आता है। इस मामले में न सिर्फ आईएएस राजेंद्र कुमार पटेल बल्कि उनके पीए का भी नाम सामने आया है।
2 जनवरी 2026 को गिरफ्तारी के बाद राजेंद्र कुमार पटेल को विशेष पीमलए अदालत में पेश किया गया, जहाँ कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय को राजेंद्र कुमार पटेल हिरासत 7 जनवरी 2026 तक दे दी। आज 8 जनवरी 2026 की स्थिति में उन्हें जमानत नहीं मिली है और वे अभी भी प्रवर्तन निदेशालय की कस्टडी या न्यायिक हिरासत में हैं। सेवा नियमों के अनुसार, यदि कोई सरकारी अधिकारी 48 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रहता है, तो उसे निलंबित किया जा सकता है। इसी प्रावधान के तहत गुजरात सरकार ने उन्हें सस्पेंड कर दिया है। सरकार की ओर से इस पूरे मामले पर कोई नैतिक या राजनीतिक टिप्पणी सामने नहीं आई।
सिस्टम पर उंगली उठाती यह गिरफ्तारी
यह केस सिर्फ एक आईएएस (IAS-Indian Administrative Service) अधिकारी की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम पर उंगली उठाता है। सवाल यह है कि अगर एक जिले में सैकड़ों भूमि उपयोग परिवर्तन फाइलों में कथित तौर पर रिश्वत ली गई, तो क्या किसी स्तर पर ऑडिट नहीं हुआ, क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी को यह पैटर्न दिखाई नहीं दिया, या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनदेखा किया गया। भारत में ज़मीन से जुड़े मामलों में पहले से ही भ्रष्टाचार, राजनीतिक दबाव और अफसरशाही की मिलीभगत के आरोप लगते रहे हैं। आम नागरिक के लिए भूमि उपयोग परिवर्तन जैसी प्रक्रियाएँ अक्सर सालों तक लटकी रहती हैं और फिर धीरे-धीरे “सेटिंग” और “मैनेजमेंट” जैसे शब्द सामने आते हैं। यह मामला उन्हीं आशंकाओं को और मजबूत करता है।
निष्कर्ष
आईएएस (IAS-Indian Administrative Service) अधिकारी केवल प्रशासनिक कर्मचारी नहीं होते, बल्कि वे राज्य की ताकत का प्रतीक माने जाते हैं। उनके एक हस्ताक्षर से किसी परियोजना को मंज़ूरी मिल जाती है या किसी का सपना टूट जाता है। जब ऐसे पद पर बैठे व्यक्ति पर रिश्वत के रेट तय करने जैसे आरोप लगते हैं, तो यह सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के साथ सीधा धोखा है। राजेंद्र कुमार पटेल की गिरफ्तारी एक चेतावनी की तरह है कि सिस्टम चाहे जितना मजबूत दिखे, अगर पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होगी तो भ्रष्टाचार अपनी जगह बना ही लेता है। अगर इस केस में निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई होती है, तो यह भरोसा बहाल करने की दिशा में एक कदम हो सकता है। लेकिन अगर यह भी बाकी मामलों की तरह धीरे-धीरे गायब हो गया, तो यह संदेश जाएगा कि कानून कागज़ों में सबके लिए बराबर है, लेकिन ज़मीन पर नहीं। यही वजह है कि यह खबर सिर्फ एक दिन की हेडलाइन नहीं, बल्कि उस सवाल का आईना है, जो बार-बार उठता है, क्या सिस्टम सच में खुद को साफ करने के लिए तैयार है, या फिर हर बार की तरह उम्मीदें ही सबसे पहले गिरफ्तार होती हैं?
(Rh)