नोएडा सेक्टर 150 में युवराज मेहता की मौत ने साबित किया कि ये “हादसा” नहीं, बैरिकेडिंग–लाइटिंग–सेफ्टी ऑडिट फेल होने से बनी सिस्टम की लापरवाही है।
पिछले एक साल की NCR घटनाएँ दिखाती हैं कि ओपन ड्रेन, वॉटरलॉगिंग और कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ जनता का नियम तोड़ना और ट्रैफिक पुलिस में “सेटिंग/रिश्वत” वाली संस्कृति हादसों को बढ़ा रही है।
कालिंदी कुंज जैसे चेकिंग पॉइंट्स का उदाहरण बताता है कि जब प्रवर्तन डर नहीं बनता, तो रोड ‘मौत का शॉर्टकट’ बन जाती है—इसका इलाज सिर्फ जांच नहीं, निवारक जवाबदेही भी है।
रात हो या दिन या फिर दोपहर रोजाना किसी भी समय आपको सड़क हादसे की खबर हर पल सुनने को मिल जाती है। यही कारण है कि भारत को रोड एक्सीडेंट (Road Accidents ) का राजधानी कहा जाने लगा है। सरकार बदलती रहती है और सड़कों की हालात वही रहती है। सड़क बनवाने, रोड एक्सीडेंट कम होने का किया गया वादा सिर्फ वादा बन कर रह जाता है। इसी से जुडी एक ख़बर 16 जनवरी 2026 को नोएडा (Sector 150) से सामने आयी, जहाँ 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता (Yuvraj Mehta) की कार घने कोहरे में एक पानी से भरे गड्ढे में जा गिरी और वो अंदर फँस गए जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की मृत्यु हो गई।
रिपोर्ट्स के मुताबिक मौके पर वार्निंग साइन, लाइटिंग, ठीक बैरिकेडिंग जैसी बेसिक चीज़ें नहीं थीं। यही कारण है कि लोगों द्वारा इसे हादसा न समझ कर सरकार की लापरवाही समझा जा रहा है। बाद में अफसरों पर कार्रवाई हुई लेकिन सवाल यह है कि अगर ये सब पहले होता, तो क्या एक परिवार आज “पोस्टमॉर्टम” की लाइन में खड़ा होता?
गुरुग्राम (Gurugram Sector 49): वॉटरलॉगिंग के बीच एक ऑटो-रिक्शा ड्राइवर ओपन सीवर में गिरकर जान गंवा बैठा।
दिल्ली (समयपुर बादली ) : "द न्यू इंडियन एक्सप्रेस" के मुताबिक़ भारी बारिश के बाद पानी दिल्ली के समयपुर बादली में भरे अंडरपास में दो बच्चों की डूबने से मौत की खबर सामने आई।
Delhi (अशोक विहार ): एनडीटीवी (NDTV ) के रिपोर्ट के मुताबिक़ सफाई के दौरान सीवर में गिरने और दम घुटने जैसी घटना में एक worker की मौत और अन्य के घायल होने की खबर।
Gurugram (Daulatabad/ओपन ड्रेन केस): "द टाइम्स ऑफ़ इंडिया" के अनुसार ओपन ड्रेन में गिरने के बाद एक व्यक्ति के डूबने की आशंका/सर्च ऑपरेशन वाली रिपोर्ट जनवरी 2026 की शुरुआत में सामने आई।
साल 2024 में भारत में लगभग 4.73 लाख रोड एक्सीडेंट और करीब 1.77 लाख मौतें हुई है।नेशनल हाईवे पर जनवरी 2025 से जून 2025 में 26,770 मौतें हुई है। ये सारी घटनाएँ देखने में अलग-अलग लगती हैं, लेकिन जड़ एक है: ओपन ड्रेन्स, खराब बैरिकेडिंग, लाइटिंग, वॉटरलॉगिंग और जवाबदेही का गायब होना।
ऐसी ही एक दुर्घटना महाराष्ट्र के पालघर ज़िले से सुनने को मिली थी, जहाँ 4 सितंबर 2022 को टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री की कार दुर्घटनाग्रस्त हुई थी। सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्ट्स में इस दुर्घटना को “ Tata Cyrus Mistry death trap” जैसे नाम से जाना जाने लगा। इसे “डेथ ट्रैप (death trap)” इसलिए कहा गया क्योंकि उस जगह को लेकर road-safety पर गंभीर सवाल उठे—जैसे ब्रिज/एप्रोच की डिजाइन, चेतावनी बोर्ड/साइनज की कमी, स्पीड कंट्रोल और सेफ्टी बैरियर्स की effectiveness। यानी लोगों ने इस घटना को सिर्फ “ड्राइवर की गलती” नहीं माना, बल्कि उस लोकेशन को unsafe planning/poor safety measures का उदाहरण बताकर “मौत का जाल” जैसे शब्दों से पुकारा।
“पैसा लो, नियम जाने दो” ग्राउंड रियलिटी में लोग जानते हैं कि बहुत जगहों पर नियम का डर कम, “सेटिंग” का भरोसा ज्यादा चलता है—इसलिए लोग डरते नहीं, क्योंकि उन्हें लगता है चल जाएगा। और दिलचस्प बात ये है कि खुद ट्रैफिक पुलिस के पास “corruption complaint” का official चैनल तक मौजूद है—मतलब सिस्टम ये मानता है कि शिकायतें आती हैं।
कालिंदी कुंज का उदहारण : कालिंदी कुंज बेल्ट (Kalindi Kunj belt) को लोग NCR में अक्सर एंट्री/एग्ज़िट और चेकिंग पॉइंट की तरह देखते हैं—जहाँ ट्रैफिक का प्रेशर, चालान का डर, और “मैनेज” वाली संस्कृति साथ-साथ चलती है। और ये सिर्फ लोकल बात नहीं बल्कि "द न्यू इंडियन एक्सप्रेस" कालिंदी कुंज पोस्टिंग से जुड़े रिश्वत मामले में पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी की रिपोर्ट भी आ चुकी है। इतना ही नहीं कालिंदी कुंज के रास्ते पर कितने ही रिक्शा वाले पुलिस की सहमति से रॉंग रास्ते (Wrong Way) में रिक्शा चलाते है।
नोएडा में हुए हादसे को लेकर कई विपक्षी नेताओं ने अपने शब्द बयान किये है जैसे की समाजवादी पार्टी के वीरेंद्र सिंह ने कहा की सिस्टम की लापरवाही की वजह से नोएडा में इंजीनियर की मौत हुई, वही भारतीय लिबरल पार्टी के अध्यक्ष डॉ मुनीश रायज़ादा ने अपने ट्विटटर अकाउंट पर ट्वीट किया कि "नोएडा में 27 वर्षीय युवराज मेहता की मृत्यु पुनः याद दिलाती है कि भारत में सड़क और यातायात सुरक्षा को लेकर किस ढंग की लापरवाही बरती जाती है। उन्होंने यह भी लिखा कि जब तक भ्रष्ट अधिकारियों व लोकल सरकारी विभागों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक कोई आशा नहीं है।
भारत जनता 21वी शताब्दी में भी ट्रैफिक नियम एवं कानूनों को हलके में लेती हैं। रोज़ाना सड़क हादसे की खबर को जानते हुए भी जनता जल्दबाज़ी के चक्कर में रॉंग वे से गाडी ले जाती है, हर तीसरे आदमी का यही रवैया है की अगर पकडे भी गए तो क्या होगा, ज्यादा से ज्यादा ट्रैफिक पुलिस को 500-1000 रूपए देने पड़ेंगे, और गौर करने की बात है की कितने ही ट्रैफिक पुलिस रिश्वत लेकर बिना केस दर्ज़ किये गाडी और गाडी के चालाक को छोड़ देते है।
अगर नगर-निगम अपना काम कर रही होती, तो खुली खाई सड़क के साथ “सजावट” की तरह नहीं पड़ी होती। बैरिकेडिंग, रिफ्लेक्टर, साइनबोर्ड, रोड-लाइट, सेफ्टी ऑडिट—ये सब बेसिक (basic) चीज़े है, जोकि हर सड़क पर मौजूद होनी चाहिए । अंत में यही कह सकते हैं कि जब तक नगर-निगम अथॉरिटी को preventive accountability में नहीं पकड़ा जाएगा—और ट्रैफिक enforcement को “रिश्वत-मुक्त” नहीं बनाया जाएगा—तब तक हर बारिश, हर कोहरा, हर अंधेरी सड़क किसी के लिए “मौत का शॉर्टकट” बनी रहेगी। इसलिए नियम अधिकारियों के साथ लोगों के लिए सख्त होने चाहिए।
(PO)