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स्वास्थ्य
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क्या होती है जीनोम सिक्वेंसिंग, यह कैसे बताएगी ओमीक्रोन के बारे में?

जानें दुनिया में तेजी से फैल रहे कोरोना के नए वेरिएंट ओमीक्रोन (Omicron) का कैसे पता लगा सकती है जीनोम सिक्वेंसिंग।

देश में अब तक ओमीक्रोन से संक्रमित दो मरीज मिल चुके हैं। [pixabay]

दुनिया में तेजी से फैल रहे कोरोना के नए वेरिएंट ओमीक्रोन ने अब भारत में भी दस्तक दे दी है। मामले की गंभीरता आप इस बात से समझ सकते हैं कि देश के टॉप साइंटिस्ट ने शुक्रवार को यह चेतावनी तक दे दी है कि यह वेरिएंट देश में तीसरी लहर ला सकता है। बता दें कि देश में अब तक ओमीक्रोन से संक्रमित दो मरीज मिल चुके हैं। ये दोनों मरीज कर्नाटक से हैं। इनमे से एक शख्स 66 साल का विदेशी है जो 20 नवंबर को बैंगलुरु आया था। कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद इसे प्राइवेट होटल में आइसोलेट कर दिया गया, जिसके बाद 27 नवंबर को ये शख्स दुबई लौट गया। वहीं 46 साल का जो दूसरा शख्स ओमिक्रॉन वेरिएंट से प्रभावित है, वो स्थानीय है और 22 नवंबर को ये पॉजिटिव पाया गया था। फिलहाल इनके संपर्क में आए लोगों के सैंपल जीनोम सिक्वेंसिंग (Genome Sequencing) के लिए भेजे गए हैं। अब आइये जानते हैं कि क्या होती है जीनोम सिक्वेंसिंग।

जीनोम सिक्वेंसिंग क्या है ?


जीनोम सिक्वेंसिंग (Genome Sequencing) को अच्छी तरह से समझने के लिए सबसे पहले आपको यह समझना होगा की जीन (Gene) क्या होती है। आसान भाषा में समझें तो जीन ही दरअसल हमारे जैविक विशेषताओं का कारण होता है। हमारा रंग, कद, बालों की लम्बाई या घनत्व जैसी सारी विशेषताएं इनसे जुड़े जीन्स ही तय करते हैं। अब तो आप समझ ही गए होंगे कि जीन्स क्या होते हैं। इसके बाद सवाल आता है कि जीनोम क्या होता है। दरअसल जीन्स के सामूहिक रूप को ही जीनोम कहते हैं और कभी भी दो व्यक्तियों का जीनोम एक दुसरे से मेल नहीं खाता। हालांकि, हमारे कुछ जीन्स हमारे पेरेंट्स से मेल खा सकते हैं, पर पूरा जीनोम मेल खा जाए, ऐसा होना असंभव है। किसी भी व्यक्ति के शरीर की बनावट और उसके कार्य करने के तरीके को समझने के लिए उसके जीनोम की स्टडी की जाती है। मगर जीनोम आकार में इतना छोटा और जटिल होता है कि इसे नंगी आंखों से देख पाना नामुमकिन है। यदि इसे माइक्रोस्कोप से भी देखा जाए, तो इसकी जटिलता के कारण इसे पूरी तरह से समझ पाना मुश्किल है। इसलिए जीनोम को स्टडी करने के लिए वैज्ञानिक इसे एक कोड दे देते है और इस कोड को पता करने वाली तकनीक को ही जीनोम मैपिंग (Genome Mapping) या जीनोम सिक्वेंसिंग (Genome Sequencing) कहा जाता है। जीनोम मैपिंग से पता चल जाता है कि जीनोम में किस तरह के बदलाव आए हैं। यानी यदि ओमिक्रोन (Omicron) की जीनोम मैपिंग होती है तो इसके जेनेटिक मटेरियल की स्टडी करके यह पता किया जा सकेगा कि इसके अंदर किस तरह के बदलाव हुए हैं और यह पुराने कोरोना वायरस से कितना अलग है।

corona, new corona variant, omicron देश के टॉप साइंटिस्ट ने शुक्रवार को यह चेतावनी दी है कि यह वेरिएंट देश में तीसरी लहर ला सकता है। [Wikimedia Commons]

जीनोम के अध्ययन को जीनोमिक्स (Genomics) कहते हैं। जीनोम सिक्वेंसिंग (Genome Sequencing) के जरिये मानसिक और शारीरिक बीमारियां जैसे कैंसर, दिल संबंधी रोग, डायबिटीज, हाई ब्लडप्रेशर, न्यूरोमस्क्युलर डिस्ऑर्डर आदि का इलाज किया जा सकता है। इसके अलावा कई संक्रामक रोगों जैसे मलेरिया, डेंगू, एचआईवी, कोरोनावायरस, ईबोला, सार्स आदिको इलाज के लिए भी जीनोम सिक्वेंसिंग की जा चुकी है। इससे यह पता चलता है कि किस व्यक्ति को किस तरह की बीमारी है या हो सकती है। इसके कैसे लक्षण हो सकते हैं। साथ ही इसके जरिए हम बीमारी का सटीक इलाज भी खोज सकते हैं।

कोरोना की जीनोम सिक्वेंसिंग कैसे होती है ?

जैसा की हम बहुत समय से सुनते आ रहे हैं कि किसी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करने के बाद कोरोना वायरस लगातार म्यूटेट हो रहा यानी अपना स्वरूप बदल रहा है। कभी यह म्यूटेट होकर पहले से ज्यादा खतरनाक हो जाता है तो कभी कम। अब आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि इससे जीनोम सिक्वेंसिंग का क्या लेना देना। तो इसका जवाब है- जी, बिलकुल लेना देना है। मान लीजिये यदि किसी इलाके में अचानक से कोरोना के मामले बढ़ने लगते हैं, तो उस इलाके से सैंपल इकट्ठे किये जाते हैं। बाद में इसकी सिक्वेंसिंग की जाती है और पता लगाया जाता है की इस इलाके के सैंपल में कुछ बदलाव आया है या नहीं। और क्या इसी बदलाव के कारण ही इस इलाके में कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं ? इस प्रकार जीनोम सिक्वेंसिंग से यह पता चल जाता है की किसी इलाके में कोरोना मामले में जो बढ़ोतरी हो रही है , वह किसी नए वेरिएंट की वजह से हो रही या पुराने।

यह भी पढ़ें : इस ब्लड ग्रुप वाले लोग हो जाएं सावधान, हो सकते हैं कोरोना के शिकार

भारत में जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए उपलब्ध प्रयोगशालाओं की बात करें तो यहां इसके लिए इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (नई दिल्ली), सीएसआईआर-आर्कियोलॉजी फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (हैदराबाद), डीबीटी - इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज (भुवनेश्वर), डीबीटी-इन स्टेम-एनसीबीएस (बेंगलुरु), डीबीटी - नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स (NIBMG), (कल्याणी, पश्चिम बंगाल), आईसीएमआर- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (पुणे) जैसे चुनिंदा प्रयोगशालाएं मौजूद हैं।

Input: Various sources; Edited By: Manisha Singh

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