
जम्मू-कश्मीर (Jammu & Kashmir) के वैष्णो देवी (Vaishno Devi) मार्ग पर हुए भूस्खलन (Landslide) ने पूरे देश को हिला दिया। 30 लोगों की मौत हो चुकी है और कई घायल अस्पतालों में जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैं। सरकार और प्रशासन ने इसे सिर्फ़ भारी बारिश की मार बताया, लेकिन हकीकत सिर्फ़ इतनी नहीं है। यह हादसा हमें बताता है कि आस्था की आड़ में किए जा रहे अंधाधुंध विकास ने पहाड़ों को इतना कमजोर कर दिया है कि ज़रा सी बारिश भी जानलेवा साबित हो रही है।
त्रासदी का मंज़र
मंगलवार को जब भक्त माता वैष्णो देवी (Vaishno Devi) के दरबार जा रहे थे, तभी अचानक तेज़ बारिश ने तबाही मचा दी। कटरा (Katra) से ऊपर जाते रास्ते में अचानक पहाड़ टूट गया। यात्री संभल भी नहीं पाए और देखते ही देखते दर्जनों जिंदगियाँ मलबे के नीचे दब गईं। जिनके परिजन लौटकर नहीं आए, उनके घरों में मातम पसरा है। हादसे के बाद यात्रा रोक दी गई और राहत-बचाव टीमें लगातार काम करती रहीं। सरकार ने मुआवज़ा और मदद का ऐलान किया, लेकिन जो जानें चली गईं, वो अब वापस तो नहीं आ सकती।
भक्ति से पर्यटन तक का सफर
कभी वैष्णो देवी सिर्फ़ श्रद्धा और भक्ति का स्थान था। लोग पैदल चलकर माता के दरबार पहुँचते थे। रास्ते कठिन होते थे, लेकिन लोग आस्था से भरे रहते थे। धीरे-धीरे जब यात्री बढ़ने लगे तो सुविधा के नाम पर बड़े-बड़े निर्माण होने लगे। आज वहां हेलीकॉप्टर (Helicopter), ट्रॉली (Trolly), बड़े होटल और चौड़ी सड़कें हैं। इन सब चीज़ों से यात्रा आसान हो गई, लेकिन पहाड़ों का संतुलन बिगड़ गया। पेड़ों को काटकर और चट्टानों को तोड़कर बनाए गए ये ढांचे अब खुद खतरा बन चुके हैं। जो रास्ते कभी प्रकृति के साथ मिलकर चलते थे, अब वही रास्ते प्रकृति के खिलाफ खड़े दिखते हैं।
ओवर-डेवलपमेंट
हिमालयी (Himalaya) इलाके वैसे भी बहुत नाज़ुक माने जाते हैं। यहां की मिट्टी ढीली होती है और पहाड़ आसानी से खिसक सकते हैं। जब ऐसे इलाकों पर भारी-भरकम कॉन्क्रीट की इमारतें और बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बना दिए जाते हैं तो ज़रा सा दबाव भी विनाश में बदल जाता है। आज वैष्णो देवी (Vaishno Devi) के आस-पास होटल, पार्किंग, रोपवे (Rope Way) और दूसरी सुविधाएं यात्रियों को तो खुश करती हैं, लेकिन पहाड़ों पर यह सब एक बोझ की तरह बैठ गया है। जैसे किसी बीमार इंसान पर और वज़न डाल दिया जाए।
मानव की गलती
बारिश और बादल फटने जैसी घटनाएं अब आम हो चुकी हैं। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) ने मौसम को और भी अनिश्चित बना दिया है। लेकिन यह भी सच है कि अगर पहाड़ वैसे ही रहते जैसे पहले थे, तो वे इस बारिश को संभाल लेते। मिट्टी पानी सोख लेती और जंगल पानी रोक लेते। लेकिन अब हालात अलग हैं। पहाड़ों की ज़मीन पर कॉन्क्रीट की चादर बिछा दी गई है। जहां कभी मिट्टी पानी को खींच लेती थी, अब वहां पत्थर और सीमेंट खड़े हैं। नतीजा यह है कि पानी का दबाव सीधे भूस्खलन और बाढ़ (Flood) में बदल जाता है।
बार-बार रिपीट होता पैटर्न
ये कहानी नई नहीं है। 2013 में केदारनाथ (Kedarnath) में हजारों लोग मारे गए। 2023 में हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में बारिश और भूस्खलन ने तबाही मचाई। जोशीमठ (Joshimath) जैसे शहर धीरे-धीरे धंस रहे हैं। और अब 2025 में वैष्णो देवी (Vaishno Devi) हादसा। हर बार सरकारें कहती हैं कि बारिश ज़्यादा हुई। लेकिन सच्चाई यह है कि हमारी लापरवाही और लालच इन आपदाओं को और बड़ा बना देते हैं। पहाड़ पहले भी बरसात देखते थे, लेकिन इस तरह भूस्खलन देखने को नहीं मिलता था।
लोगों और प्रशासन की ज़िम्मेदारी
इस हादसे में सिर्फ़ सरकार को दोष देना आसान होगा, लेकिन सच्चाई यह भी है कि हम सबकी ज़िम्मेदारी है। लोग बिना मौसम देखे यात्रा पर निकल जाते हैं। चेतावनी दी जाती है, फिर भी कई यात्री खतरे के समय चढ़ाई करते हैं। शासन और मंदिर प्रबंधन भी भीड़ को रोकने के बजाय और सुविधा जोड़ते रहते हैं ताकि ज़्यादा लोग आ सकें। इस दौड़ में सुरक्षा पीछे रह जाती है। जब भक्ति पर्यटन और कारोबार में बदल जाती है, तो हादसों का खतरा और बढ़ जाता है।
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वैष्णो देवी हादसा सिर्फ़ एक त्रासदी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। अब वक्त आ गया है कि हम ऐसे पवित्र स्थलों को सुरक्षित क्षेत्रों में गिनें। यहां निर्माण पर सख्त रोक लगे, यात्रियों की संख्या तय हो और यात्रा को प्रकृति के साथ संतुलित किया जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले सालों में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। श्रद्धा का स्थान किसी मेले या पर्यटन केंद्र में नहीं बदलना चाहिए। इसे उसी तरह बचाना होगा जैसे इसे प्रकृति ने हमें दिया था।
निष्कर्ष
वैष्णो देवी (Vaishno Devi) हादसा हमें सोचने पर मजबूर करता है। क्या सचमुच सिर्फ बारिश ने 30 जिंदगियाँ लीं या हमारी बनाई गलतियों ने? हर नया होटल, हर नई सड़क और हर नया प्रोजेक्ट पहाड़ों पर एक बोझ है। अगर हम आस्था और विकास के बीच संतुलन नहीं बना पाए, तो यह पहाड़ हमें बार-बार सबक सिखाते रहेंगे। सच यही है, बारिश आती रहेगी, लेकिन हमें तय करना होगा कि पहाड़ जिंदा रहेंगे या हम उन्हें अपने विकास के बोझ तले दफना देंगे। [Rh/Eth/BA]