दिलकुशा कोठी से साकेत सदन तक : नवाबी शान पर मंदिर संग्रहालय बनी पहचान

दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi), जो कभी नवाब शुजाउद्दौला की शान और फ़ैज़ाबाद की पहचान थी, अब टूटे खंडहर से 'साकेत सदन' (Saket Sadan) में बदल रही है। सरकार यहाँ हिंदू तीर्थों का संग्रहालय बना रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या अवध की नवाबी विरासत (Heritage of Awadh) हमेशा के लिए मिट जाएगी ?
दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) का इतिहास 18वीं सदी से शुरू होता है। अवध के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला ने इसे 1752 के आसपास बनवाया।
दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) का इतिहास 18वीं सदी से शुरू होता है। अवध के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला ने इसे 1752 के आसपास बनवाया। (AI)
Published on
5 min read

अयोध्या सिर्फ़ धार्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि इतिहास की कई परतों को समेटे हुए है। इनमें सबसे खास नाम है दिलकुशा कोठी। यह इमारत अवध की नवाबी शान और शुजाउद्दौला की राजधानी फ़ैज़ाबाद जो अयोध्या का पुराना नाम है उस की पहचान रही है। लेकिन आज यह इमारत अपने इतिहास से ज़्यादा वर्तमान विवाद को लेकर चर्चा में है, क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने यहाँ “साकेत सदन” (Saket Sadan) बनाने का काम शुरू कर दिया है। सरकार का कहना है कि यहाँ हिंदू तीर्थों और देवी-देवताओं से जुड़ा संग्रहालय बनेगा। अब सवाल यह है कि क्या इसके साथ अवध की वह विरासत, जो सदियों से दिलकुशा की दीवारों में छिपी है, हमेशा के लिए मिट जाएगी ?

दिलकुशा कोठी का जन्म

दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) का इतिहास 18वीं सदी से शुरू होता है। अवध के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला ने इसे 1752 के आसपास बनवाया। इससे पहले फ़ैज़ाबाद में नवाब सआदत ख़ान और सफ़दरजंग ने बस नाम के लिए कुछ इमारतें खड़ी की थीं, लेकिन असली राजधानी का रूप शुजाउद्दौला ने दिया। शुजाउद्दौला ने जिस जगह पर अपना महल बनाया, वहीं समय के साथ एक शानदार परिसर खड़ा हुआ जिसे दिलकुशा कहा गया। यह केवल नवाब और उनके परिवार का निवास नहीं था, बल्कि उनके प्रशासन, सैनिकों और दरबारियों का भी केंद्र था।

इतिहासकारों के अनुसार, दिलकुशा एक दो-मंज़िला कोठी थी, जिसमें हर मंज़िल पर 10-10 बड़े बड़े कमरे थे। पहली मंज़िल पर नवाब और उनका परिवार रहता था, जबकि निचली मंज़िल पर दरबार लगता था। चारों ओर सैनिकों की बैरकें बनी थीं। महल के बाहर प्रशासनिक कर्मचारियों के रहने के लिए पूरा इलाक़ा बसाया गया, जहाँ सब्ज़ी मंडी, टकसाल और दरवाज़े बनाए गए। शुजाउद्दौला ने फ़्रेंच आर्किटेक्ट्स और सलाहकारों की मदद से इस महल को सजवाया। नतीजा यह हुआ कि दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) अवध की पहचान बन गई और फ़ैज़ाबाद उस दौर में उत्तर भारत का सबसे सुंदर शहर कहा जाने लगा।

शुजाउद्दौला के बाद अवध की सत्ता बदलती रही और धीरे-धीरे अंग्रेज़ों का असर बढ़ता गया। 1857 की आज़ादी की पहली लड़ाई में दिलकुशा कोठी ने भी अहम भूमिका निभाई।
शुजाउद्दौला के बाद अवध की सत्ता बदलती रही और धीरे-धीरे अंग्रेज़ों का असर बढ़ता गया। 1857 की आज़ादी की पहली लड़ाई में दिलकुशा कोठी ने भी अहम भूमिका निभाई। (AI)

फ़ैज़ाबाद का नाम और शुजाउद्दौला का दौर

इतिहासकार बताते हैं कि फ़ैज़ाबाद का नाम भी शुजाउद्दौला के समय पड़ा था। एक अंग्रेज़ अधिकारी ने कहा था कि यह जगह सबको “फ़ैज़” यानी फायदा दे रही है। यहीं से इसका नाम फ़ैज़ाबाद पड़ गया। उस दौर में यहाँ बड़े बाग-बगीचे, महल और ऐतिहासिक स्थल बने। शुजाउद्दौला ने व्यापार को भी बढ़ावा दिया। यही कारण था कि दिल्ली से आने वाले वज़ीर, विदेशी यात्री और व्यापारी फ़ैज़ाबाद की खूबसूरती की तारीफ़ करते करते कभी नहीं थकते थे।

शुजाउद्दौला के बाद अवध की सत्ता बदलती रही और धीरे-धीरे अंग्रेज़ों का असर बढ़ता गया। 1857 की आज़ादी की पहली लड़ाई में दिलकुशा कोठी ने भी अहम भूमिका निभाई। स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे छिपने की जगह के रूप में इस्तेमाल किया। लेकिन 1857 के बाद अंग्रेज़ों ने इस पर कब्ज़ा कर लिया। 1870 के आसपास उन्होंने इसे अफ़ीम का गोदाम बना दिया। यहाँ अफ़ीम अधिकारी तैनात किए गए और कोठी को “अफ़ीम कोठी” कहा जाने लगा। लेकिन आगे चल कर आज़ादी के बाद भी इसका इस्तेमाल बदला नहीं। भारत सरकार के नारकोटिक्स विभाग ने यहाँ अपना दफ़्तर बना लिया।

कभी फ़ैज़ाबाद की शान हुआ करती थी दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) लेकिन आज टूटे-फूटे छज्जों और दरकती दीवारों में सिमट गई है। यहां की देखभाल की कमी ने इसे लगभग खंडहर बना दिया है। इतिहासकार रोशन तक़ी कहते हैं कि यह हालत केवल दिलकुशा की नहीं है। फ़ैज़ाबाद की कई और नवाबी इमारतें भी लापरवाही के कारण गायब हो गईं है। कुछ ही संरक्षित स्थलों को आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने बचा पायी है। दिलकुशा को बचाने की कोशिश में एक समय इसे जिला लाइब्रेरी भी बनाया गया था, ताकि लोग आते-जाते रहें और इमारत ज़िंदा रह सके। लेकिन धीरे-धीरे यह प्रयोग भी ख़त्म हो गया।

दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) आज फिर चर्चा में है क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने यहाँ “साकेत सदन” (Saket Sadan) बनाने का फ़ैसला किया है।
दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) आज फिर चर्चा में है क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने यहाँ “साकेत सदन” (Saket Sadan) बनाने का फ़ैसला किया है।(AI)

इन दिनों क्यों चर्चा में है दिलकुशा कोठी ?

दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) आज फिर चर्चा में है क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने यहाँ “साकेत सदन” (Saket Sadan) बनाने का फ़ैसला किया है। साकेत सदन एक संग्रहालय होगा, जिसमें अलग-अलग हिंदू तीर्थस्थलों और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ लगाई जाएँगी। इसकी लागत लगभग 17 करोड़ रुपये है। साकेत सदन का काम जून 2023 में शुरू हुआ था और अब तक 60% निर्माण पूरा हो चुका है। इस प्रोजेक्ट को उत्तर प्रदेश प्रोजेक्ट कॉर्पोरेशन लिमिटेड बना रहा है।

अब बड़ा सवाल यह की दिलकुशा कोठी की ज़मीन पर बन रहे इस नए प्रोजेक्ट में अवध के नवाबी इतिहास या शुजाउद्दौला का कोई ज़िक्र नहीं होगा। प्रोजेक्ट मैनेजर ने साफ़ कहा है कि इसका मक़सद बिल्कुल अलग है और यह पूरी तरह धार्मिक थीम पर आधारित होगा। यही वजह है कि इतिहासकार और स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या इससे अवध की ऐतिहासिक पहचान मिट जाएगी ?

Also Read: जब दुबई का प्रशासन चलता था भारत से – ब्रिटिश काल की अनसुनी कहानी!

दिलकुशा कोठी का सफ़र किसी कहानी से कम नहीं है। 1752 में यह नवाब शुजाउद्दौला की राजधानी का महल था। उसके बाद 1857 में यह स्वतंत्रता सेनानियों का ठिकाना बन गया। और 1870 में अंग्रेज़ों ने इसे अफ़ीम का गोदाम बना दिया। फिर आज़ादी के बाद यह नारकोटिक्स विभाग के कब्ज़े में रही है। उसके बाद अब 2023 में इसे बदलकर “साकेत सदन” बनाया जा रहा है। यह सफ़र बताता है कि इतिहास की इमारतें समय के साथ कैसे अपना रूप बदलती हैं और नई राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार उनका इस्तेमाल तय होता है।

सबसे बड़ा डर यही है कि साकेत सदन बन जाने के बाद दिलकुशा कोठी का नाम और पहचान हमेशा के लिए मिट जाएगी। इतिहासकार मानते हैं कि यह इमारत केवल ईंट-पत्थर का नहीं था, बल्कि यह नवाबी शासन, उनकी संस्कृति और 18वीं सदी की राजनीति की गवाह थी। यहाँ से ही फ़ैज़ाबाद का इतिहास बना था। अगर इस इमारत का नाम और कहानी भविष्य की पीढ़ियों को नहीं बताई गई, तो अवध का एक अहम अध्याय इतिहास की किताबों से ग़ायब हो जाएगा।

दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) का इतिहास अवध की शान, अंग्रेज़ों की साज़िश, आज़ादी की लड़ाई और लापरवाही, सबको समेटे हुए है।
दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) का इतिहास अवध की शान, अंग्रेज़ों की साज़िश, आज़ादी की लड़ाई और लापरवाही, सबको समेटे हुए है।(AI)

निष्कर्ष

दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) का इतिहास अवध की शान, अंग्रेज़ों की साज़िश, आज़ादी की लड़ाई और लापरवाही, सबको समेटे हुए है। लेकिन आज यह इमारत इसलिए चर्चा में है क्योंकि सरकार ने इसे बदलकर “साकेत सदन” (Saket Sadan) बनाने का फ़ैसला किया है। शुजाउद्दौला का बनाया यह महल कभी फ़ैज़ाबाद की पहचान था। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में लोग इसे दिलकुशा कोठी के नाम से याद करेंगे या सिर्फ़ साकेत सदन ही उनकी याद में रह जाएगा। इतिहास ने कई बार देखा है कि इमारतें बदलती हैं, लेकिन उनकी असली पहचान और कहानी को मिटाना आसान नहीं होता। शायद यही उम्मीद है कि दिलकुशा कोठी की गूँज, चाहे किसी भी रूप में हो, भविष्य तक ज़रूर पहुँचना चाहिए। [Rh/PS]

दिलकुशा कोठी (Dilkusha Kothi) का इतिहास 18वीं सदी से शुरू होता है। अवध के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला ने इसे 1752 के आसपास बनवाया।
क्या महाभारत केवल कथा है ? राजस्थान की खुदाई से मिले प्रमाण खोल रहे हैं इतिहास के पन्ने

Related Stories

No stories found.
logo
hindi.newsgram.com