पुलिस की वर्दी पहनकर भी बन गए अपराधी ,प्रमोशन के लिए किया निर्दोष लोगों का एनकाउंटर

गाज़ियाबाद जिले के भोजपुर थाने के अंतर्गत आने वाले मछरिया गांव के चार निर्दोष लोगों को पुलिस का शिकार होना पड़ा।
इस तस्वीर में पिस्तौल को देखा जा सकता है।
प्रमोशन के लिए किया निर्दोष लोगों का एनकाउंटर। Wikimedia Commons
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आईपीएस,आईएएस बनने का ख़्वाब आज के दौर में छात्रों के अंदर होना एक शौक है,क्योंकि ये एक नाम नहीं हैं , यह समाज ,देश के प्रति एक ज़िम्मेदारी होती है। सोचिये जब ये नाम भी अपराध की दुनिया से जुड़ जाये,तब लोगों का भरोसा किस पर होगा,समाज में लोग किसको देखकर अपने आप को सुरक्षित महसूस करेंगे।

वैसे तो उत्तर प्रदेश में आपराधिक घटनाओं की सूची बनाई जाए तो सूची काफी बड़ी हो जाएगी। घटनायें हमारे समाज में रोज़ कहीं न कहीं होती रहती हैं,परन्तु कुछ घटनायें ऐसी होती हैं ,जो समूचे समाज को झकझोर देती हैं।

8 नवम्बर 1996 को, शाम के समय का वक्त गाज़ियाबाद के लिए काफी खास शाम था, यह वही तारीख़ है जब पुलिस के पिस्तौल से निकली गोलियां किसी अपराधी को नहीं बल्कि चार निर्दोष लोगों को ही अपना निशाना बना लेती है।

यह कहानी है उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद जिले के भोजपुर थाने के अंतर्गत आने वाले मछरिया गांव की ,जहां चार निर्दोष लोगों को पुलिस का शिकार होना पड़ता है।

क्या है पूरा मामला

भोजपुर थाने के एसएचओ (SHO) लाल सिंह,वायरलेस से अपने कंट्रोल रूम (Control Room) को सूचना देते हैं कि मुज़रिम रतनपाल ,विनोद और भागवत को ले जाते समय कुछ बदमाशों ने उनको घेर लिया है, जिससे उनको जान का खतरा है। मौके पर पुलिस (Police) पहुंचती है ,पता चलता है कि दो बदमाशों को पहले ही ढेर किया जा चुका है, शेष दो बदमाशों को पास के ही खेत के पास ढेर कर दिया जाता जाता है। चारों के नाम क्रमशः जसवीर सिंह ,जलालुद्दीन ,अशोक और प्रवेश था।

कहानी यहीं समाप्त नहीं होती है बल्कि कहानी की शुरुआत यहीं से होती है, मीडिया वालों ने जब सवाल किया कि उन बदमाशों के नाम व पहचान क्या हैं, तो पुलिस ने कहा कि, शिनाख़्त नहीं हुई है। कुछ दिन बीते ही थे कि अखबारों में खबर छपी कि पुलिस ने चार निर्दोष लोगों को अपने एनकाउंटर का निशाना बनाया। यह खबर जैसे ही छपती है परिवार वालों को ,समाज के लोगों को ,सड़क पर उतरने के लिए प्रेरणा मिलती है और आसपास के लोग इसके खिलाफ धरना प्रदर्शन के लिए सड़क पर आने लगते हैं।

थोड़े समय बाद चारों के परिवार वाले दिल्ली की तरफ रुख़ करते हैं और प्रधामंत्री से न्याय की उम्मीद लेकर उनके आवास के बाहर सीबीआई से जांच की मांग करने लगे। ये बात तब तक उस समय के स्थानीय सांसद रमेश चंद्र जी को पता चली , ने सदन में अपने चर्चा में घटना के बारे में जिक्र किया। बाद में पीएमओ (PMO) की तरफ़ से आदेश आता है कि इसकी जांच सीबीआई (CBI) को सौंप दिया जाए। यह वही दौर था जब देश में सत्ता की कुर्सी के लिए राजनीतिक दलों में उठा पटक चल रहा था।

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जांच और निर्णय

जांच शुरू होती है। एसएचओ (SHO) लाल सिंह ,एसआई (SI) जोगिन्दर सिंह ,सूर्यभान सिंह,और सुभाष चंद्र के खिलाफ FIR दर्ज़ होती है।

10 सितम्बर 2001 को CBI ने अदालत में रिपोर्ट पेश की। इसके पहले ही आईपीएस (IPS) ज्योति वेलुर लन्दन निकल जाती हैं। ये वही ज्योति वेलुर हैं जिनके पिस्तौल से जसवीर सिंह को गोली लगी थी।

20 साल बाद 20 फरवरी 2017 को अदालत ने क़रीब 226 पेज के निर्णय में सीबीआई (CBI) के जांच को सही माना। एसएचओ (SHO) लाल सिंह ,एसआई (SI) जोगिन्दर सिंह ,सूर्यभान सिंह, और सुभाष चंद्र को दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास हुई। आईपीएस (IPS) ज्योति वेलुर को भी इसमें दोषी बताया।

बीस साल बाद जब यह निर्णय एनकाउंटर में मारे गए चारों निर्दोष युवाओं के घर वालों को सुनाई पड़ी तो उनके आँख से अश्रु के धार निकल पड़े। आपको बता दें कि इसमें से बहुतों के परिवार वाले न्याय की लड़ाई लड़ते लड़ते दुनिया को अलविदा कह गए। प्रवेश नाम का लड़का, के पिताजी की मौत हो गयी। प्रवेश की माँ ने प्रवेश को न्याय दिलाने के लिए दमखम से लड़ाई लड़ी थी, क्योंकि माँ को और परिवार वालों को विशवास था कि उनका बच्चा निर्दोष है।

आईपीएस ज्योति वेलुर अभी भी भारत नहीं लौटी हैं। सूत्रों के अनुसार, अभी वो यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में प्रोफेसर हैं,बच्चों को पढ़ाती हैं। इस तरीके की घटनायें कहीं न कहीं समाज में सुरक्षा वयवस्था से लोगों के विश्वास को कमज़ोर कर देता है, क्योंकि प्रमोशन के लालच में पुलिस वालों ने ऐसी घटना को अंजाम दिया। वहीँ दूसरी तरफ परिवार वालों को न्याय मिलने से लोगों के मन में न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास बना हुआ है।

[Rh/PY]

इस तस्वीर में पिस्तौल को देखा जा सकता है।
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