

हिंदी संघ की राजभाषा, 1965 से भाषा विवाद
भारत में हिंदी उपेक्षित, लेकिन विदेशियों में लोकप्रिय
चार्ल्स थॉमसन सहित कई विदेशी हिंदी प्रेमी
पिटाई भी हो सकती है। आप भारत में रहकर अपने ही देश की भाषा नहीं बोल सकते, लेकिन क्या आप जानते हैं, संविधान निर्माता बी आर अंबेडकर, जो भारत के पहले कानून मंत्री भी थे, जब वो संविधान बना रहे थे, तब उन्होंने इसमें इसका जिक्र किया था।
संविधान के अनुच्छेद 343 में साफ़ लिखा है कि संघ की राजभाषा हिंदी (देवनागरी लिपि में) होगी और अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय होगा। इसके खंड 2 में बी आर अंबेडकर ने लिखा कि संविधान लागू होने के 15 साल तक संघ के सभी शासकीय कार्यो में अंग्रेजी भाषा का उपयोग जारी रहेगा। वहीं, इसके खंड 3 में यह जिक्र है कि संसद चाहे, तो अंग्रेजी को जारी रख सकती है।
हालांकि, जब 1965 में 15 साल पूरे हुए, तो आज़ादी के बाद भाषा को लेकर पहली लड़ाई हुई। तमिल जनता और द्रविड़ दलों ने हिंदी को एकमात्र भाषा बनाने को लेकर खूब विरोध किया। आलम तो ये है कि आज भी भाषा को लेकर लड़ाई जारी है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हिंदी भाषी लोगों के साथ काफी बुरा बर्ताव होता है।
गौर करने वाली बात यह कि हिंदी (Hindi) जिस भारत की अपनी भाषा है, उसे अपने ही देश में तिरस्कार का सामना करना पड़ता है जबकि इसके उल्ट जो विदेशी हैं, उन्हें इस भाषा से बहुत प्यार है। आज हम आपको 5 ऐसे विदेशियों के बारे में बताएंगे, जिन्हें हिंदी भाषा से काफी प्रेम है और वो इसी भाषा में बात करना पसंद करते हैं।
1970 के दशक में चार्ल्स थॉमसन (Charles Thomson) एक छात्र के रूप में भारत आए थे। वो केवल 13 साल की उम्र में अपने स्कूल की परीक्षा में टॉप करने के बाद अकेले ऑस्ट्रेलिया से भारत आ गए थे। उनका उद्देश्य बिहार के मुंगेर में स्थित बिहार योग विद्यालय में योग और ध्यान सीखना था। उन्होंने हिंदी को किसी संस्थान के बजाय भारत के गांवों और आम लोगों के बीच रहकर, रेडियो सुनकर और समाचार पत्र पढ़कर सीखा, जिसके कारण वे आज बिल्कुल सहज और शुद्ध हिंदी (Hindi) बोलते हैं।
कहते हैं कि चार्ल्स थॉमसन (Charles Thomson) करीब 40 साल तक भारत में रहे थे। उन्होंने पीपली लाइव जैसी फिल्मों में काम भी किया। उन्हें 'बिहारीलाल' भी कहा जाता है क्योंकि वो फर्राटेदार भोजपुरी भी बोलते हैं। 1985-86 के दौरान 'क्विट इंडिया' नोटिस मिलने के कारण उन्हें वापस ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा था, लेकिन वे 2007 में दोबारा भारत लौटे।
वहीं, दिल्ली में 2017 के MCD चुनाव में उन्होंने ज़ी टीवी (Zee TV) के लिए एक विशेष कार्यक्रम किया था, जिसका नाम 'बिहारी लाल ऑटो वाले बाबू' था। करीब 30 साल से अधिक वो भारत में बिता चुके हैं। फिलहाल वो ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं। बता दें कि एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था कि भारत में रहकर उन्हें अंग्रेजी बोलने में शर्म आता है।
हिंदी (Hindi) बोलने की लिस्ट में दूसरा नाम इयान वूलफोर्ड (Ian Woolford) का है, जो एक अमेरिकी मूल के प्रसिद्ध भाषाविद् और प्रोफेसर हैं, जो ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी (La Trobe University) में हिंदी पढ़ाते हैं। उन्होंने हिंदी की औपचारिक शिक्षा अमेरिका की शिकागो यूनिवर्सिटी से ली लेकिन उनका झुकाव प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वर नाथ 'रेणु' की रचनाओं की तरफ था। उनकी कहानियों को समझने के लिए इयान ने न केवल मानक हिंदी सीखी, बल्कि ग्रामीण अंचल की बोलियों पर भी पकड़ बनाई।
इयान वूलफोर्ड (Ian Woolford) कई बार भारत आए और अपना समय बिहार के पूर्णिया और अररिया जिलों में बिताया। वहाँ वे स्थानीय लोगों के साथ रहे, उनके साथ खाना खाया और उनके लोक गीतों व संस्कृति का अध्ययन किया। बता दें कि चार्ल्स थॉमसन (Charles Thomson) की तरह इयान भी भोजपुरी बोलते हैं। साथ ही उन्हें मैथिली और अंगिका जैसी उत्तर भारत की क्षेत्रीय भाषाओं का भी गहरा ज्ञान है। फिलहाल इयान ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं।
मारिया क्रिज़्स्तोफ़ बायर्स्की (Maria Krzysztof Byrski) करीब 10 साल से ज्यादा भारत में रहे। 12 जनवरी 2026 को उन्होंने अपना 86 वां जन्मदिन भी मनाया। वो भारत में करीब 6 साल रहे और बनारस हिंदी विश्वविद्यालय में भारतीय इतिहास, संस्कृति और संस्कृत पर अध्यन किया और 1966 में अपनी पीएचडी (Phd) भी पूरी की। वहीं, 1993 से 1996 के बीच दिल्ली में वो पोलैंड के राजदूत के रूप में काम भी किये। करीब 9 से 10 साल उन्होंने भारत की धरती पर बिताए।
बायर्स्की को नाट्यशास्त्र की दुनिया का विशेषज्ञ माना जाता है। उनकी किताब 'Concept of Ancient Indian Theatre' एक प्रामाणिक ग्रन्थ मानी जाती है। उन्होंने कई भारत की संस्कृत की किताबों का पॉलिश भाषा में अनुवाद किया, ताकि यूरोप के लोग भारतीय संस्कृति को जान पाएं। उनकी इन उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार द्वारा 25 जनवरी 2025 को पद्मश्री देने की घोषणा की गई। 28 मार्च 2022 को राष्ट्रपति राम नाथकोविंद द्वारा उन्हें इस महान उपलब्धि से नवाजा गया।
एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि अपनी मां के कहने पर उन्होंने भारतीय संस्कृति और यहाँ की भाषा को सीखना शुरू किया। मारिया क्रिज़्स्तोफ़ बायर्स्की (Maria Krzysztof Byrski) को भारत और खासकर हिंदी (Hindi) भाषा से काफी प्रेम है।
हिंदी (Hindi) भाषी प्रेमी की लिस्ट में चौथा नाम डॉ टोमियो मिज़ोकामी (Dr. Tomio Mizokami) का है। कहते हैं कि उन्हें 1960 के दशक में हिंदी से गहरा लगाव हुआ। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से वो काफी प्रभावित थे। एक इंटरव्यू के दौरान मिज़ोकामी ने कहा था कि जिस देश के पीएम नेहरू थे, उस देश की भाषा सीखना मैं गौरव का पल मानता हूँ।
मिज़ोकामी ने जापान में ही हिंदी के पढ़ाई की शुरआत की। हिंदी के आलावा उन्हें पंजाबी, गुजराती और बंगाली जैसी भाषाओँ का भी ज्ञान है। भारतीय फिल्मों और संगीतों के कारण उनका झुकाव हिंदी भाषा की तरफ हुआ। 60 के दशक में वो भारत आए और इलाहाबाद (जो अब प्रयागराज है) वहां रहकर भाषा की पकड़ को और मजबूत किया। 2018 में मिज़ोकामी पहली बार पीएम मोदी से मिले थे और उनकी हिंदी भाषा से नरेंद्र मोदी भी काफी प्रभावित हुए थे।
हिंदी के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2018 में 'पद्मश्री' से नवाजा था। वे जापान में हर साल 'हिंदी नाटक' का आयोजन भी करवाते हैं। बता दें कि डॉ टोमियो मिज़ोकामी (Dr. Tomio Mizokami) ओसाका यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज के प्रोफेसर रहे हैं और उन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में समर्पित किया है।
इस लिस्ट में पांचवां नाम प्रोफेसर जियांग जिंगकुई (Jiang Jingkui) का है, जो चीन के एक बहुत ही प्रसिद्ध हिंदी विद्वान और प्रोफेसर हैं। वे वर्तमान में सिंघुआ यूनिवर्सिटी (Tsinghua University) में दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र के निदेशक हैं और इससे पहले पेकिंग यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग के प्रमुख रह चुके हैं।1980 के दशक में चीन के पेकिंग यूनिवर्सिटी से उन्होंने हिंदी सीखनी शुरू की। उनके गुरु प्रोफेसर जिन डिंगहान थे, जिन्होंने उन्हें भारतीय साहित्य और संस्कृति की गहरी समझ दी।
कहा जाता है कि हिंदी को और बेहतर बनाने के लिए वो भारत आए थे। वे 1988 से 1990 के बीच भारत सरकार की छात्रवृत्ति पर आए थे और उन्होंने केंद्रीय हिंदी संस्थान (Central Hindi Institute), आगरा में भी पढ़ाई की थी। कहा जाता है कि उन्होंने भारत की कई महान ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया था जिसमे मुंशी प्रेमचंद की किताबें भी शामिल हैं। उन्हें डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन पुरस्कार, डॉ. आनंद कुमारस्वामी फेलोशिप, विश्व हिंदी सम्मान, कमलेश्वर पुरस्कार और फादर कामिल बुल्के पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।