

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि यमुना को पूरी तरह साफ होने में “एक दशक” या उससे ज्यादा समय लग सकता है, जबकि शहर में प्रदूषण की तस्वीर साल-दर-साल वैसी ही बनी हुई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक कई STP मानकों के अनुसार काम नहीं कर रहे; 30 mg/L BOD से 10 mg/L BOD अपग्रेड का लक्ष्य बताया गया, लेकिन उन्नयन कार्य अधूरा है और कापसहेड़ा (234 गुना) व घिटोरनी (70 गुना) जैसे इलाकों में अधिक प्रदूषण दर्ज हुआ।
यमुना पर राजनीति और जिम्मेदारी का सवाल भी उठता है—AAP के लंबे कार्यकाल के बावजूद सुधार नहीं दिखा, और अब नई सरकार के “एक दशक” वाले बयान पर भी जनता जवाब और ठोस नतीजे मांग रही है।
यमुना का मुद्दा दिल्ली के लिए सिर्फ एक नदी का सवाल नहीं, बल्कि सरकारों की नीयत और सिस्टम की क्षमता की असली परीक्षा है। इसी बीच दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का हालिया बयान चर्चा में आया जहाँ उन्होंने कहा कि यमुना को पूरी तरह साफ होने में “एक दशक” या उससे भी ज़्यादा समय लग सकता है।
दिल्ली (Delhi) में यमुना की हालत को लेकर गुस्सा नया नहीं है। हर साल कोई न कोई रिपोर्ट, कोई न कोई सर्वे, और फिर वही तस्वीर—झाग, बदबू, काली धाराएँ और किनारे पर जमा गंदगी। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि यमुना गंदी क्यों है, सवाल ये है कि इतने सालों में यमुना को साफ करने की इच्छाशक्ति और व्यवस्था आखिर कहाँ कमजोर पड़ जाती है?
राजधानी में रहने वाले लोग जानते हैं कि यमुना की सफाई सिर्फ “नदी की सफाई” नहीं है; यह असल में सीवेज मैनेजमेंट, नालों की मॉनिटरिंग, एसटीपी की क्षमता, और रोज़-रोज़ की प्रशासनिक जिम्मेदारी का मामला है।
यमुना से जुड़ा असली मुद्दा—सीवेज और एसटीपी
यमुना में नालों के ज़रिए जो गंदगी गिरती है, उसे रोकने की जिम्मेदारी STP (Sewage Treatment Plant) पर आती है। सोच ये थी कि शहर का गंदा पानी STP तक पहुँचे, वहाँ ट्रीट हो, और फिर मानकों के अनुसार साफ होकर ही आगे बढ़े। लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि दिल्ली (Delhi) के कई STP मानक के अनुसार पानी साफ नहीं कर पा रहे। यानी “ट्रीट” होकर भी कई जगह पानी में फीकल कॉलिफॉर्म और अन्य प्रदूषण पैरामीटर सवालों में रहे और वही आउटफ्लो आगे जाकर यमुना को और बिगाड़ता है। जब इलाज करने वाला सिस्टम ही कमजोर हो, तो यमुना का “साफ होना” सिर्फ पोस्टर-लाइन बनकर रह जाता है।
यही वजह है कि यमुना की चर्चा अक्सर “इंटरसेप्शन”, “ट्रीटमेंट”, “अपग्रेड” जैसे शब्दों में घूमती है। पर जमीन पर फर्क तभी दिखेगा जब STP सिर्फ कागज़ों में अपग्रेड न हों, बल्कि उनकी परफॉर्मेंस रोज़ाना के स्तर पर मापी जाए। कई बार तकनीक लग जाती है, प्लांट बन जाता है, लेकिन ऑपरेशन-मेंटेनेंस में ढिलाई, निगरानी की कमी और डिसइन्फेक्शन की कमजोरी पूरी कड़ी को तोड़ देती है। फिर नतीजा वही—ट्रीटमेंट के बाद भी पानी सुरक्षित नहीं, और नदी पर भार वही पुराना।
अमित साह द्वारा किया गया असफल उद्धघाटन
रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने भी यमुना की सफाई और सीवेज ट्रीटमेंट से जुड़े कामों की समीक्षा/बैठक के जरिए इस मुद्दे पर पिछले वर्ष अक्टूबर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उद्घाटन किया है। इनकी क्षमता बढ़ाने के साथ ही गुणवत्ता में भी सुधार किया गया है। लेकिन, सात अन्य का उन्नयन कार्य अबतक नहीं हुआ है। वहीं दिल्ली जल बोर्ड (DJB) के अधिकारियों के अनुसार, फरवरी–मार्च 2025 में एसटीपी के उन्नयन की घोषणा की गई थी और लक्ष्य यह बताया गया कि पहले 30 mg/L BOD मानक पर बने एसटीपी अब 10 mg/L BOD मानक के अनुसार अपग्रेड किए जा रहे हैं, लेकिन उन्नयन कार्य अब तक पूरा नहीं हुआ। रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि कापसहेड़ा में 234 गुना और घिटोरनी में 70 गुना अधिक प्रदूषण दर्ज हुआ; साथ ही यह भी उल्लेख है कि घिटोरनी में कुछ सुधार बताया गया है, लेकिन पहले वाले सीवेज/पुराने बहाव की स्थिति वही बनी हुई है। मानक के अनुसार काम न करने वाले एसटीपी/प्लांट्स में रिपोर्ट में सेन नर्सिंग होम, दिल्ली गेट, कापसहेड़ा, मोलरबंद, ओखला (पुराना), महरौली, वसंत कुंज, यमुना विहार (चरण-1), और चरण-3 के नीचे चरण-1 का नाम शामिल बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इनमें से कुछ जगहों पर उन्नयन/मेंटेनेंस का काम चल रहा है, लेकिन वर्तमान स्थिति में इन्हें मानकों के अनुरूप नहीं बताया गया है।
सरकार की लापरवाही
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता द्वारा (Rekha Gupta) यमुना को साफ़ करने के लिए एक दशक का समय माँगा गया पर गौर करने की बात यह है कि इससे पहले भी दिल्ली में एक दशक तक अरविन्द केजरीवाल (Arvind Kejriwal) और उनकी पार्टी (AAP - Aam Aadmi Party) का राज था परन्तु जनता को किये गए वादे को पूरा नहीं किया गया। दस सालों से अधिक समय में भी आप सरकार यमुना के समस्या को ख़त्म नहीं कर पायी, बल्कि हालात दिन-प्रीतिदिन बिगड़ती चली गयी।
(PO)