

फैज़-ए-इलाही मस्जिद के पास MCD ने अवैध निर्माण पर कार्रवाई की, मस्जिद को नहीं तोड़ा गया।
22 दिसंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुई कार्रवाई को लेकर अफ़वाह फैलाई गई कि मस्जिद गिराई जा रही है।
अफ़वाह के चलते भीड़ जमा हुई और हालात बिगड़ते हुए पुलिस पर पथराव तक पहुँच गए।
दिल्ली (Delhi) के पुरानी दिल्ली इलाके में स्थित फैज़-ए-इलाही (Faiz-e-Illahi Masjid) के पास कल रात नगर निगम की कार्रवाई हुई। इस कार्रवाई के दौरान मस्जिद के आसपास बने कुछ घरों और निर्माणों को तोड़ा गया। यह कार्रवाई सीधे मस्जिद पर न होकर उसके आसपास मौजूद कुछ ढांचों पर की गई थी, जिन्हें प्रशासन द्वारा अवैध निर्माण माना जा रहा था।
इस कार्रवाई को 6 जनवरी आधी रात को किया गया। आधी रात कार्रवाई होने से इलाके में तनाव फैल गया और लोगों के बीच अफरा- तफरी फ़ैल गयी। बाद में हालात और बिगड़ते चले गए। लेकिन अगर पूरे मामले को शुरुआत से समझें, तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या था?
इस पूरे मामले की जड़ सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) का वह फैसला है, जो 22 दिसंबर 2025 को आया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि सरकारी जमीन या सार्वजनिक जगह पर बने अवैध निर्माण हटाए जा सकते हैं, लेकिन यह भी जरूरी है कि कार्रवाई कानून के दायरे में हो और धार्मिक स्थलों को लेकर विशेष सावधानी बरती जाए। कोर्ट के फैसले का मतलब यह नहीं था कि किसी मस्जिद या धार्मिक स्थल को तोड़ा जाए, बल्कि यह था कि जो भी अवैध निर्माण हैं, चाहे वे किसी के भी हों, उन्हें हटाया जा सकता है। इसी फैसले के आधार पर स्थानीय प्रशासन और दिल्ली नगर निगम (Municipal Corporation of Delhi) ने इलाके में कार्रवाई की योजना बनाई।
दिल्ली नगर निगम ने क्या कार्रवाई की?
दिल्ली नगर निगम की टीम रात के समय इलाके में पहुंची और मस्जिद के आसपास बने कुछ घरों और ढांचों को गिराया। प्रशासन का कहना है कि ये निर्माण अवैध थे, और पहले से नोटिस (Notice) दिए जा चुके थे। यह भी साफ किया गया कि मस्जिद को नहीं तोड़ा गया। कार्रवाई सिर्फ आसपास के अवैध निर्माणों पर थी। यह सभी कार्रवाई कोर्ट के आदेशों के तहत किया गया। लेकिन रात का समय, भारी पुलिस बल और बुलडोजर देखकर लोगों में डर और भ्रम पैदा हो गया।
एक व्यक्ति द्वारा मस्जिद तोड़ने की अफ़वाह फैलाना ?
कार्रवाई के दौरान या उसके तुरंत बाद एक व्यक्ति द्वारा अफ़वाह फैला दी गई कि "फैज़-ए-इलाही (Faiz-e-Illahi) मस्जिद को तोड़ा जा रहा है।”यह बात आग की तरह इलाके में फैल गई। सोशल मीडिया, फोन कॉल और मुँह-जुबानी खबरों के ज़रिये लोग यह मानने लगे कि मस्जिद पर बुलडोजर चल रहा है, जबकि ऐसा कुछ नहीं था। अफवाहों का असर बहुत तेज़ होता है, खासकर जब मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हो। अफ़वाह फैलते ही बड़ी संख्या में लोग मौके पर जमा हो गए। भीड़ में गुस्सा और डर दोनों था, और तब ही हालात को संभालने के लिए पुलिस को आगे आना पड़ा। लेकिन स्थिति इतनी बिगड़ गई कि कुछ लोगों द्वारा पुलिस पर पत्थरबाज़ी शुरू की गई। इससे इलाके में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई। पुलिस को हालात काबू में करने के लिए सख्ती करनी पड़ी, जैसे आंसू की गैस का प्रयोग करना इत्यादि।
असली सच्चाई क्या है?
अगर पूरे मामले को शांत दिमाग से देखें, तो साफ बात ये है कि मस्जिद नहीं तोड़ी गई है। कई मीडिया रिपोर्टर्स द्वारा मस्जिद पर जाकर ग्राउंड रिपोर्टिंग की गयी जिसमें दिखाया गया कि मस्जिद पर कोई भी आंच नहीं आई है। यह कार्रवाई साफतौर पर अवैध निर्माणों पर थी। कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के 22 दिसंबर 2025 के फैसले के बाद की गई, और इसकी खबर लोगों को पहले से दी गयी थी। हालात अफ़वाह की वजह से बिगड़ते चले गए और पुलिस पर पथराव गलत सूचना फैलने के बाद शुरू हुआ। यानी जो मामला प्रशासनिक और कानूनी था, वह अफ़वाहों और गलत जानकारी के कारण सांप्रदायिक तनाव में बदल गया।
निष्कर्ष
बिना पुष्टि के लोगों के बीच खबर फैलाना एक घातक हो सकता है, खासकर अगर वह खबर धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हो। धार्मिक स्थलों से जुड़ी किसी भी खबर में जिम्मेदारी ज़रूरी है। प्रशासन को भी ऐसी कार्रवाई में बेहतर संवाद रखना चाहिए। जनता को भी चाहिए कि अफ़वाहों पर भरोसा न करे।
फैज़-ए-इलाही (Faiz-e-Illahi Masjid) मस्जिद के पास जो कुछ हुआ, वह कोर्ट के आदेश के तहत की गई नगर निगम की कार्रवाई थी, न कि मस्जिद तोड़ने की कोशिश। लेकिन एक व्यक्ति द्वारा फैलाई गई अफ़वाह ने हालात बिगाड़ दिए, जिसके कारण पुलिस और आम लोगों के बीच टकराव हुआ। सच यह है कि कानून के नाम पर हुई कार्रवाई को धर्म के नाम से जोड़कर जानकारी ने हिंसा और तनाव में बदल दिया।
(Rh/PO)