गुलाबी फ़ाइल में मेडिकल कॉलेज का वादा हुआ पूरा, धरातल से सब गायब

दैनिक भास्कर ने मध्य प्रदेश के कई शहरों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की, जिसमें फैकल्टी की कमी और कॉलेजों की स्थिति चौंका देने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में 19 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें से केवल 7 में पर्याप्त फैकल्टी है; बाकी कॉलेजों में कहीं आधी, तो कहीं 90% तक पद खाली बताए गए हैं।
इस इमेज में डॉक्टरों को लैब में प्रैक्टिस करते हुआ देखा जा सकता है।
गुलाबी फ़ाइल में मेडिकल कॉलेज का वादा हुआ पूरा, धरातल से सब गायब । MatthiasChurchill, CC BY-SA 4.0, via Wikimedia Commons
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  • मरीज–डॉक्टर विवादों के बीच भारत की हेल्थकेयर रैंकिंग 45वीं बताई जाती है, यानी सुधार के दावे हैं पर सिस्टम अभी भी दबाव में है।

  • दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्टिंग ने MP के मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी, लैब और अस्पताल-प्रैक्टिस की भारी कमी (सागर, सतना, सिंगरौली, श्योपुर) को उजागर किया है।

  • सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब बुनियादी सुविधाएँ ही नहीं, तो ऐसे कॉलेज “शिक्षा” के लिए खुल रहे हैं या सिर्फ कागज़ों में उपलब्धि दिखाने के लिए?

देश में आज के समय में जब देश भर से मरीज और डॉक्टर के बीच हो रहे विवाद चर्चा में हैं (उदाहरण के तौर पर हाल में हुआ शिमला में हुआ मामला), वहीं दूसरी ओर भारत में डॉक्टर की उपलब्धता भी एक सवाल बनी हुई है। भारत की medical health में भरोसे/सुविधा की विश्वभर में रैंकिंग 45th बताई जाती है—यानी सुधार की बातें तो होती हैं, लेकिन हालात अभी पूरी तरह सुधरे नहीं हैं। इसी बीच दैनिक भास्कर द्वारा की गई हाल की ग्राउंड रिपोर्टिंग ने एक बार फिर सिस्टम की दरारें सामने रख दीं। 

दैनिक भास्कर ने मध्य प्रदेश के कई शहरों में ग्राउंड रिपोर्टिंग की, जिसमें फैकल्टी की कमी और कॉलेजों की स्थिति चौंका देने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में 19 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें से केवल 7 में पर्याप्त फैकल्टी है; बाकी कॉलेजों में कहीं आधी, तो कहीं 90% तक पद खाली बताए गए हैं। 

सागर 

दैनिक भास्कर द्वारा सागर में किये गए रिपोर्टिंग वहां के मेडिकल कॉलेज की दयनीय स्थिति को साफ़ दिखता है। वहाँ के एक पुराने कॉलेज में 270 पद होने के बावजूद सिर्फ 136 डॉक्टर उपलब्ध बताए गए हैं। इतना ही नहीं, रिपोर्टिंग में यह भी सामने आया कि कॉलेज की लैब और उपकरणों पर धूल चढ़ रही है। मतलब इंफ्रास्ट्रक्चर दिखता है, पर इस्तेमाल और सिस्टम दोनों सवालों के घेरे में हैं।

सतना 

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में सतना के नए मेडिकल कॉलेज का भी ज़िक्र है— रिपोर्ट्स के मुताबिक़ सतना में नया मेडिकल कॉलेज तो खोल दिया गया, लेकिन फैकल्टी (Faculty) पूरी नहीं है। छात्रों के प्रैक्टिस के लिए मेडिकल कॉलेज का अस्पताल भी नहीं है । छात्रों को प्रैक्टिस (Practice) के लिए जिला अस्पताल जाना पड़ता है जो की काफी असुविधाजनक है।  

सिंगरौली 

सिंगरौल में भी तस्वीर कुछ मिलती-जुलती बताई गई—कॉलेज की शुरुआत कर दी गई, एडमिशन भी हो गए, लेकिन हकीकत में सुविधाएँ/इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी पर्याप्त नहीं। यानी बिल्डिंग है, पर सिस्टम नहीं—और यही सबसे बड़ा खतरा है।

श्योपुर 

श्योपुर के मेडिकल कॉलेज में रिपोर्ट के अनुसार 116 फैकल्टी पद हैं, लेकिन सिर्फ 73 पदों पर नियुक्ति बताई गई—और हॉस्टल तक खाली होने की बात सामने आई। 

इन्हीं मुद्दों पर श्योपुर के डॉक्टर अनिल अग्रवाल ने दैनिक भास्कर के रिपोर्टर से कहा कि हमारे यहाँ ऑनलाइन पढ़ाई इसलिए चल रही है क्योंकि न तो पर्याप्त फर्नीचर है, न ही लैब, और न ही फैकल्टी। 

वहीं फाहमा के एग्जीक्यूटिव मेंबर डॉक्टर आकाश सोनी ने चेतावनी दी कि ऑनलाइन पढ़ाई से सीखने वाले डॉक्टर के पास “आधा ज्ञान” रहेगा और यह आधा ज्ञान सिर्फ मध्य प्रदेश नहीं बल्कि देश भर के लिए खतरा बन सकता है। सवाल सीधा है: बिना फैकल्टी, बिना लैब, बिना हॉस्पिटल प्रैक्टिस के कॉलेज खोलने का क्या फायदा? क्या मेडिकल कॉलेज भी अब सिर्फ कागज़ी आंकड़ों में “सरकार की उपलब्धि” दिखाने का तरीका बनते जा रहे हैं?

(PO)

इस इमेज में डॉक्टरों को लैब में प्रैक्टिस करते हुआ देखा जा सकता है।
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