

अमेरिका ने 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला पर एक बड़ा हमला किया और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को क़ैद कर न्यूयॉर्क ले गया। अमेरिका ने यह कार्रवाई नशे के कारोबार, ‘नार्को-आतंकवाद’ ('Narco-Terrorism') और लोकतंत्र बहाल करने का हवाला देकर की, लेकिन इसके कारण कई लोग मारे गए और दुनिया में कड़ी आलोचना हुई। वैसे ये पहली बार नहीं है जब अंकल सैम की आलोचना पूरी दुनियां में हो रही है क्योंकि वेनेज़ुएला पहला देश नहीं है जिस पर हमले हुए हैं।
जब भी दुनिया में अमेरिका की सैन्य ताकत, दखल या जंग की बात होती है, तो एक नाम बार-बार सुनाई देता है “अंकल सैम” (Uncle Sam), लेकिन सवाल ये है कि आखिर अंकल सैम है कौन? दरअसल, अंकल सैम अमेरिका का ही नाम है। अमेरिका को “अंकल सैम” (Uncle Sam) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह नाम सैमुअल विल्सन (Samuel Wilson) से जुड़ा है। वे अमेरिकी सेना को मीट सप्लाई करते थे और सामान पर “U.S.” लिखा होता था, जिसे लोग मज़ाक में अंकल सैम कहने लगे। धीरे-धीरे अंकल सैम अमेरिका की सरकार का प्रतीक बन गया।
आज के दौर में जब भी अमेरिका (America) किसी देश पर हमला करता है या किसी युद्ध में दखल देता है, तो आलोचक कहते हैं कि “ये तो अंकल सैम (Uncle Sam) की फितरत है”। यानी ताकत के दम पर दुनिया के मामलों में हस्तक्षेप करना ही अमेरिका की आदत बन चुकी है। वेनेज़ुएला से पहले भी अमेरिका कई देशों में सैन्य कार्रवाई कर चुका है। आज हम 15 ऐसे देश के बारे में जानेंगे जिन पर अमेरिका ने हमले किए।
हैती (Haiti) में अमेरिका ने 1915 से 1934 तक सैन्य कब्ज़ा किया और 1994 में फिर हस्तक्षेप किया, ताकि यहाँ की राजनीतिक अस्थिरता बनी रहे। अमेरिका ने इसे राजनीतिक नियंत्रण और सुरक्षा के नाम पर किया, जिससे हैती में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी प्रभाव बढ़ता गया।
उत्तर कोरिया (North Korea) के हमले के बाद अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के नाम पर दक्षिण कोरिया की मदद करते हुए 1950–1953 के दौरान युद्ध में प्रवेश किया। मकसद उत्तर कोरिया और उसके समर्थकों को रोकना था। तीन साल चले युद्ध के बाद कोई निर्णायक जीत नहीं हुई और अंत में कोरिया उत्तर और दक्षिण दो हिस्सों में बँट गया, जो आज भी विभाजित है।
अमेरिका ने ब्रिटेन के साथ मिलकर ईरान (Iran) की लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ 1953 में गुप्त कार्रवाई की। उस समय ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग (Mohammad Mossadegh) ने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया था, जिससे पश्चिमी देशों के हित प्रभावित हुए। अमेरिका ने CIA के जरिए तख्तापलट (ऑपरेशन एजैक्स) कराया और मोसादेग को सत्ता से हटा दिया गया। इसके बाद शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को पूरी ताकत के साथ सत्ता में बैठाया गया। इस हस्तक्षेप का परिणाम यह हुआ कि ईरान में वर्षों तक तानाशाही शासन, दमन और जनता में अमेरिका के प्रति गहरी नाराज़गी पैदा हुई, जिसने आगे चलकर 1979 की इस्लामिक क्रांति की नींव रखी।
अमेरिका ने ग्वाटेमाला की वामपंथी राष्ट्रपति जाकोबो आर्बेन्ज़ की सरकार को गिराने के लिए 1954 में हस्तक्षेप किया। कारण यह था कि उनकी नीतियाँ अमेरिकी कंपनियों और हितों के खिलाफ जा रही थीं। अमेरिका ने CIA के गुप्त ऑपरेशन के ज़रिये सैन्य तख्तापलट कराया। सरकार गिरते ही ग्वाटेमाला में राजनीतिक अस्थिरता फैल गई। इसका नतीजा यह हुआ कि देश लंबे गृहयुद्ध, हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों में फँस गया, जिसमें हजारों लोगों की जान चली गई।
अमेरिका ने 1960 के दशक के अंत से 1970 के दशक की शुरुआत तक वियतनाम युद्ध के दौरान गुप्त सैन्य कार्रवाई की। अमेरिका का उद्देश्य था उत्तर वियतनाम के लड़ाकों की सप्लाई लाइनों को तोड़ना, जो कंबोडिया और लाओस (Cambodia and Laos) से होकर गुजरती थीं। इसके लिए अमेरिका ने बिना आधिकारिक घोषणा के भारी हवाई बमबारी की। इस गुप्त युद्ध की जानकारी आम लोगों को बाद में मिली। इसका परिणाम काफ़ी खतरनाक रहा लाखों निर्दोष नागरिक मारे गए, गांव तबाह हुए और इन देशों में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा फैल गई।
अमेरिका ने बे ऑफ पिग्स (Bay of Pigs) नामक जगह पर गुप्त हमला किया, जिसका लक्ष्य क्यूबा के कम्युनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो (Fidel Castro) की सरकार को गिराना था। इसके लिए CIA ने क्यूबा के निर्वासी सैनिकों को हथियार और प्रशिक्षण दिया, और 17 अप्रैल 1961 को उन्हें बे ऑफ पिग्स की तटरेखा पर उतारा गया, ताकि वे स्थानीय लोगों की मदद से कास्त्रो को हटाकर सरकार बदल सकें। लेकिन यह योजना शुरू से ही खराब तरीके से लागू हुई। अमेरिकी समर्थित बलों को कास्त्रो की सेना ने तुरंत हराया, और हमला लगभग दो दिनों में विफल हो गया।
अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम (Southern Vietnam) के समर्थन में 1964-65 के दौरान उत्तर वियतनाम के खिलाफ़ युद्ध में दखल दिया। अमेरिका का मकसद था कम्युनिज़्म के फैलाव को रोकना, क्योंकि उसे डर था कि उत्तर वियतनाम और उसके सहयोगी पूरे देश पर कब्ज़ा कर लेंगे। इस दौरान अमेरिका ने भारी हवाई बमबारी, रासायनिक हथियारों और लाखों सैनिकों का इस्तेमाल किया। लंबे युद्ध के बाद अमेरिका को हार माननी पड़ी। इस युद्ध में लाखों नागरिक मारे गए और वियतनाम बुरी तरह तबाह हो गया।
अमेरिका ने 28 अप्रैल 1965 को लगभग 22,000 सैनिक डोमिनिकन रिपब्लिक (Dominican Republic) पर भेजे, जब देश में अंदरूनी गृहयुद्ध और राजनीतिक अस्थिरता फैल गई थी। अमेरिका ने दावा किया कि वे “कम्युनिस्ट तानाशाही” ("Communist Dictatorship") को रोकने और वहाँ मौजूद अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप कर रहे हैं, क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि क्यूबा जैसा कम्युनिस्ट शासन वहाँ भी बन जाए। अमेरिका ने ऑपरेशन पावर पैक के तहत सैनिक उतारे और जल्द ही संघर्ष को नियंत्रित किया। इस हस्तक्षेप के बाद देश में एक अमेरिका-समर्थक सरकार स्थापित हुई और युद्ध थमा, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और विवाद लंबे समय तक बनी रही।
अमेरिका ने 1983 में छोटे से कैरेबियाई देश ग्रेनेडा (Grenada) पर अचानक सैन्य हमला किया। यह हमला तब हुआ जब वहाँ एक कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) सत्ता में थी। अमेरिका ने दावा किया कि ग्रेनेडा में मौजूद अमेरिकी नागरिकों, खासकर छात्रों की सुरक्षा खतरे में है और देश क्यूबा के प्रभाव में जा रहा है। इसी बहाने अमेरिकी सेना ने “ऑपरेशन अर्जेंट फ्यूरी” (“Operation Urgent Fury”) के तहत हवाई और ज़मीनी हमला किया। कुछ ही दिनों में ग्रेनेडा की सरकार गिरा दी गई और वहाँ अमेरिका समर्थक शासन स्थापित कर दिया गया। इस सैन्य कार्रवाई के बाद देश की राजनीतिक दिशा बदल गई, लेकिन इस हमले को कई देशों ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और इसकी कड़ी आलोचना भी हुई
अमेरिका ने पनामा (Panama) के तानाशाह शासक मैनुएल नोरिएगा (Manuel Noriega) के खिलाफ सीधा सैन्य हमला किया। यह हमला दिसंबर 1989 में “ऑपरेशन जस्ट कॉज़” (“Operation Just Cause”) के तहत किया गया। अमेरिका का आरोप था कि नोरिएगा ड्रग तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल हैं और अमेरिका विरोधी नीतियाँ अपना रहे हैं। इसके अलावा पनामा नहर पर अमेरिकी हितों की सुरक्षा भी एक बड़ा कारण बताया गया। अमेरिकी सेना ने पनामा सिटी समेत कई इलाकों में ज़मीनी और हवाई कार्रवाई की। इस हमले के बाद नोरिएगा को गिरफ्तार कर अमेरिका ले जाया गया और वहाँ सज़ा सुनाई गई। हमले के परिणामस्वरूप पनामा में नई सरकार बनी, लेकिन इस सैन्य कार्रवाई में सैकड़ों निर्दोष नागरिकों की जान गई और देश को भारी नुकसान झेलना पड़ा।
अमेरिका और नाटो (NATO) देशों ने कोसोवो संकट के नाम पर 1999 में यूगोस्लाविया (Yugoslavia) पर हवाई हमला किया। आरोप था कि सर्बियाई बल कोसोवो में मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं। बिना संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के नाटो ने हफ्तों तक बमबारी की। इसके बाद यूगोस्लाविया कमजोर पड़ा और अंत में देश कई हिस्सों में टूट गया, जिससे बाल्कन क्षेत्र में नई राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हो गई।
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अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 को भारत पर हुए आतंकी हमलों के बाद अफ़ग़ानिस्तान (Afghanistan) पर सैन्य कार्रवाई शुरू की। उनका आरोप था कि अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन अफ़ग़ानिस्तान में छिपा है और उसे तालिबान सरकार का संरक्षण मिला हुआ है। इसी कारण अमेरिका ने नाटो देशों के साथ मिलकर “वॉर ऑन टेरर” (“War on Terror”) के तहत हवाई और ज़मीनी हमले किए। शुरुआत में तालिबान की सरकार गिरा दी गई और नई सरकार बनाई, लेकिन यह युद्ध करीब 20 साल तक चला, जिसमें हजारों नागरिक और सैनिक मारे गए। अंत में 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान फिर से सत्ता में लौट आया।
अमेरिका ने मार्च 2003 में इराक़ (Iraq) पर पूर्ण सैन्य हमला किया। कारण बताया गया कि सद्दाम हुसैन (Saddam Hussein) के पास WMD हथियार हैं, जो बाद में झूठे साबित हुए। हमले में सद्दाम मारा गया, लेकिन इराक गृहयुद्ध, आतंकवाद और तबाही में फँस गया।
अमेरिका और नाटो देशों ने लीबिया (Libya) के शासक मुअम्मर गद्दाफी (Muammar Gaddafi) के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की। यह हमला 2011 में अरब स्प्रिंग के दौरान किया गया, जब गद्दाफी सरकार पर अपने ही नागरिकों पर हिंसा करने के आरोप लगे। अमेरिका ने मानवीय हस्तक्षेप के नाम पर हवाई हमले किए। इन हमलों के बाद गद्दाफी को पकड़कर मार दिया गया। हालांकि सरकार गिर गई, लेकिन इसका परिणाम बेहद भयावह रहा। लीबिया में स्थिर शासन स्थापित नहीं हो सका और देश गृहयुद्ध, आतंकवाद और अराजकता में फँस गया।
अमेरिका ने सीरिया (Syria) पर 2014 में ISIS के खिलाफ हवाई हमले किए। अमेरिका का कहना था कि ISIS वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा है। इन हमलों में सीरियाई सरकार की अनुमति नहीं ली गई, जिससे विवाद बढ़ा। हवाई हमलों के बावजूद ISIS पूरी तरह खत्म नहीं हुआ और सीरिया का युद्ध और भी जटिल व लंबा हो गया, जिसमें लाखों लोग प्रभावित हुए। [Rh]