Shravan Month 2022: कैसे स्थापित हुआ Kashi Vishwanath Jyotirlinga?

Shravan Month 2022: Kashi Vishwanath Jyotirlinga के दर्शन-पूजन से मनुष्य समस्त पापों-तापों से मुक्त हो जाता है।
Shravan Month 2022: कैसे स्थापित हुआ सातवाँ ज्योतिर्लिंग Kashi Vishwanath Jyotirlinga ?
Shravan Month 2022: कैसे स्थापित हुआ सातवाँ ज्योतिर्लिंग Kashi Vishwanath Jyotirlinga ?Kashi Vishwanath Jyotirlinga (Wikimedia Commons)

Shravan Month 2022: श्रावण मास में हम पढ़ रहे हैं 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में, और आज इसी कड़ी में हम पढ़ रहे हैं सातवें ज्योतिर्लिंग श्री Kashi Vishwanath Jyotirlinga के बारे में। उत्तर भारत की प्रसिद्ध नगरी काशी में एक पुण्यमयी ज्योतिर्लिंग स्थापित है जिसका नाम श्री विश्वनाथ है। इस पावन नगरी काशी के लिए कहा जाता है कि यह प्रलयकाल में भी नष्ट नहीं होता। कहा जाता है कि ऐसे समय में भगवान शिव अपनी इस पवित्र भूमि को अपने त्रिशूल पर धारण करते हैं और फिर सृष्टि का आरंभ होने पर उसे यथास्थान रख देते हैं। इसीलिए इस नगरी को सृष्टि की आदि स्थली भी बताया जाता है। सृष्टि-कामना से भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर भगवान शंकर की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया था। अगस्त्य मुनि ने भी इसी तपस्थली में अपनी तपस्या द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न किया था। इस नगरी के लिए शास्त्र कहते हैं कि इस नगरी में जिस भी प्राणी के प्राण छूटते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है, अतः इसे मोक्षदायिनी काशी भी कहते हैं। मृत्यु को प्राप्त होने के बाद मृतक की आत्मा को गुरु रूप में उसके कान में 'तारक' मंत्र का उपदेश करते हैं। इस मंत्र के प्रभाव से पापी से पापी प्राणी भी मुक्ति पा जाता है।

विषयासक्तचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरतिर्नरः।

इह क्षेत्रे मृतः सोऽपि संसारे न पुनर्भवेत्‌॥

उपर्युक्त श्लोक का अर्थ है, 'विषयों में आसक्त, अधर्मी व्यक्ति भी यदि इस काशी क्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त हो तो उसे भी पुनः संसार बंधन में नहीं आना पड़ता।'

इसके अतिरिक्त मत्स्य पुराण में इस पावन नगरी का महत्व बताते हुए कहा गया है- 'जप, ध्यान और ज्ञानरहित तथा दुःखों से पीड़ित मनुष्यों के लिए काशी ही एकमात्र परमगति है। श्री विश्वनाथ के आनंद-कानन में दशाश्वमेध, लोलार्क, बिंदुमाधव, केशव और मणिकर्णिका- ये पाँच तीर्थ हैं। इसी से इसे 'अविमुक्त क्षेत्र' कहा जाता है।'

जपध्यानविहीनानां ज्ञानवर्जितचेतसाम्‌।

ततो दुःखाहतानां च गतिर्वाराणसी नृणाम्‌॥

तीर्थानां पञ्चकं सारं विश्वेशानंदकानने।

दशाश्वमेधं लोलार्कः केशवो बिंदुमाधवः॥

पञ्चमी तु महाश्रेष्ठा प्रोच्यते मणिकर्णिका।

एभिस्तु तीर्थवर्यैश्च वर्ण्यते ह्यविमुक्तकम्‌॥

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इस मोक्षदायिनी नागरी के उत्तर की तरफ ओंकारखंड, दक्षिण में केदारखंड और बीच में विश्वेश्वरखंड है। kकहा जाता है कि प्रसिद्ध विश्वनाथ-ज्योतिर्लिंग इसी खंड में स्थित है। पुराणों के अनुसार इस ज्योतिर्लिंग के बारे में एक कथा प्रसिद्ध है।

जब भगवान शिव पार्वतीजी से विवाह करके अपने निवास कैलाश पर्वत की तरफ जा रहे थे, तब माता पार्वती ने शिव जी से कहा कि उन्हें अपने ही पिता के घर में जीवन बिताना अच्छा नहीं लगता। उन्होंने भगवान शिव से कहा कि 'सारी लड़कियाँ शादी के बाद अपने पति के घर जाती हैं, मुझे पिता के घर में ही रहना पड़ रहा है। अतः आप मुझे अपने घर ले चलिए। यहां रहना मुझे अच्छा नहीं लगता।' भगवान शिव ने उनकी बात स्वीकार करते हुए उन्हें अपनी पवित्र नगरी काशी में ले आए। यहाँ आकर वो विश्वनाथ-ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए।

इस ज्योतिर्लिंग की महिमा के बारे में बताया जाता है कि इसके दर्शन पूजन से मनुष्य समस्त पापों-तापों से मुक्त हो जाता है।

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