रूपिंदर पाल सिंह : ओलंपिक मेडलिस्ट, जिन्हें बचपन में हॉकी स्टिक और जूतों के लिए भी करना पड़ा संघर्ष

टोक्यो ओलंपिक पदक विजेता रूपिंदर पाल सिंह संन्यास के बाद एचआईएल 2025-26 में एसजी पाइपर्स के लिए खेल रहे हैं।
ओलंपिक पदक के साथ भारतीय हॉकी खिलाड़ी रूपिंदर पाल सिंह|
ओलंपिक मेडलिस्ट रूपिंदर पाल सिंह एचआईएल में खेलते हुए|IANS
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रूपिंदर पाल सिंह (Rupinder Pal Singh) के पिता स्कूल में हॉकी खेला करते थे। उनके भाई भी हॉकी खिलाड़ी रहे हैं। चचेरे भाई भी इसी खेल से जुड़े हैं, जिन्हें देखकर रूपिंदर पाल इस खेल के प्रति आकर्षित हुए।

महज 10 साल की उम्र में रूपिंदर ने हॉकी स्टिक थामी। जब रूपिंदर ने हॉकी खेलनी शुरू की, तो उबड़ खाबड़ मैदान पर प्रैक्टिस करनी पड़ती। उस समय जिस स्टेडियम में खेलते, वहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का टर्फ नहीं था। हॉकी स्टिक और जूते काफी महंगे होते थे, जिसका मुश्किल से प्रबंध हो पाता। शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें भारतीय टीम में मौका मिला।

रूपिंदर पाल ने साल 2011 में सुल्तान अजलन शाह कप में ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ हैट्रिक लगाई, जिसने सभी का ध्यान उनकी ओर खींचा।

रूपिंदर पाल को पेनाल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ माना जाता है, लेकिन पेनाल्टी कॉर्नर उनके लिए प्राथमिकता नहीं थी। उनका फोकस टीम में खेलना था। वह जब भी पेनाल्टी कॉर्नर लेते, तो ड्रैग फ्लिक के बेसिक पर ध्यान देते।

इस खिलाड़ी का भारतीय टीम के लिए खेलने का अनुभव बेहद शानदार रहा। उन्होंने शुरुआती समय में सीनियर खिलाड़ियों से काफी कुछ सीखा।

रूपिंदर मानते हैं कि अगर आपकी फिटनेस अच्छी है, तभी आप फील्ड पर अच्छा खेल सकते हैं। अगर आप अनफिट हैं, तो विपक्षी टीम दबाव बना सकती है। मैच के दिन आपको तरोताजा महसूस करना चाहिए। खिलाड़ी को कठिन परिश्रम जारी रखना चाहिए। रोज सुबह उठकर ग्राउंड में जाकर प्रैक्टिस करनी जरूरी है। प्रैक्टिस से ब्रेक नहीं लिया जा सकता। खिलाड़ी को अपने कोच की बातों को ध्यान से सुनकर उन पर अमल करना चाहिए। सफलता जरूर कदम चूमेगी। दूसरों को देखकर ये ना सोचें कि आपको भी वही मिलना चाहिए था।

रूपिंदर सिंह साल 2011 और 2016 में एशियन चैंपियंस ट्रॉफी की गोल्ड मेडलिस्ट टीम का हिस्सा रहे। साल 2013 में एशिया कप (Asia Cup) में सिल्वर जीता, जिसके बाद 2014-15 और 2016-17 में हॉकी वर्ल्ड लीग में ब्रॉन्ज मेडल विजेता बने।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2014 के सिल्वर मेडलिस्ट रूपिंदर ने इसी साल एशियन गेम्स में गोल्ड जीता। इसके बाद साल 2018 में एशियन ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया, लेकिन 2020 टोक्यो ओलंपिक उनके लिए बेहद खास था, जिसमें भारतीय टीम ने 41 वर्षों का सूखा करते हुए ब्रॉन्ज मेडल पर कब्जा जमाया।

यह रूपिंदर सिंह के करियर का सबसे यादगार पल रहा। रूपिंदर सिंह ने बताया, "वो पल हमारे लिए काफी यादगार रहा, क्योंकि ओलंपिक खेलना ही एक एथलीट (Athlete) का सपना होता है। हमने तो मेडल तक जीत लिया था। हॉकी में काफी वर्षों के बाद हमें मेडल मिला था। इस मेडल ने हमारी जिंदगी बदल दी। हमें अच्छी नौकरियां मिलीं। मैं पंजाब सिविल सर्विसेज में हूं। हमारी टीम के अन्य खिलाड़ियों को भी प्रमोशन मिले।"

रूपिंदर सिंह मानते हैं कि प्रत्येक मैच में खिलाड़ी पर प्रदर्शन का दबाव होता है, लेकिन अगर खिलाड़ी टीम के साथ खेलने का लुत्फ उठाता है, तो इतनी मुश्किल नहीं होती। वह मैदान पर हमेशा अपना शत प्रतिशत देने की कोशिश करते हैं।

एसजी पाइपर्स को एचआईएल 2025-26 के अपने पहले मैच में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन रूपिंदर सिंह को यकीन है कि टीम आगामी मुकाबलों में शानदार प्रयास करेगी। इस टीम में जूनियर, सीनियर और विदेशी खिलाड़ियों का मिश्रण है। टीम का मकसद प्लेऑफ के लिए क्वालीफाई करना है। टीम मैच-दर-मैच रणनीति बनाते हुए खिताब जीतना चाहती है। उन्हें उम्मीद है कि इस बार एसजी पाइपर्स ट्रॉफी जरूर उठाएगी।

भारतीय डिफेंडर ने कहा, "मैं एसजी पाइपर्स के साथ खेलने के लिए उत्सुक हूं। मैं पहली बार इस टीम से जुड़ा हूं। इस टीम में नए खिलाड़ी हैं। इस टीम में अर्जेंटीना, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और हॉलैंड के दिग्गजों का भी मिश्रण है। मैं यहां खेल का लुत्फ उठाते हुए युवाओं को प्रेरित करना चाहता हूं।"

यह खिलाड़ी मानता है कि भारत में हॉकी (Hockey) को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए इस खेल का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करना चाहिए। भारतीय टीम ने लगातार दो ओलंपिक में मेडल जीते, लेकिन शायद लोग उसे भूल गए।

पूर्व ओलंपियन ने कहा, "किसी भी खेल में राजनीति नहीं होनी चाहिए। खिलाड़ी का काम खेलना है। वह कड़ी मेहनत करता है, लेकिन राजनीति की वजह से जब उसे टीम में मौका नहीं मिलता, तो बहुत दुख होता है। जब कोई खिलाड़ी पदक जीतता है, तो उसे वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसका वो हकदार है। खिलाड़ियों को जितना प्रोत्साहित करेंगे, उतना ही वो मैदान पर उम्दा प्रदर्शन कर सकेंगे।"

[AK]

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