

बिहार चुनाव की धूम के बाद अब देश की राजनीति का रुख धीरे-धीरे पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ने लगा है। चुनावी माहौल गरमाने लगा है और सियासी सरगर्मियां भी तेज़ हो चुकी हैं। एक तरफ़ बंगाल की ‘दीदी’ ममता बनर्जी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुकी हैं। कहा जा रहा है कि हमेशा की तरह वह साम, दाम, दंड, भेद हर राजनीतिक दांव आज़माकर एक बार फिर अपनी जीत पर मुहर लगाने की कोशिश में जुटी हैं।
लेकिन इसी चुनावी शोर-शराबे के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कुछ नेताओं की आपराधिक पृष्ठभूमि को लेकर खबरें भी लगातार सुर्खियों में बनी हुई हैं। विपक्ष जहां इसे बड़ा मुद्दा बनाने में जुटा है, वहीं आम जनता के बीच भी यह सवाल उठने लगा है कि क्या गंभीर आरोपों वाले नेता लोकतंत्र के लिए सही विकल्प हैं? इन्हीं विवादों के केंद्र में एक नाम बार-बार सामने आता है शेख साहोनावेज़ (Sekh Sahonawez) का। पश्चिम बंगाल के इस टीएमसी नेता पर हत्या, चोरी, धमकी और अन्य गंभीर आपराधिक मामलों के आरोप दर्ज हैं। हैरानी की बात यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद वह लगातार तीन बार विधायक चुने गए।
आखिर कैसे एक ऐसा नेता, जिसके खिलाफ आपराधिक मामलों की लंबी सूची बताई जाती है, जनता का भरोसा जीतता रहा? क्या इसके पीछे राजनीतिक संरक्षण है, या फिर स्थानीय मजबूरी और वोट बैंक की राजनीति? आज हम इसी नेता, और उसके कथित कारनामों के बारे में विस्तार से बात करेंगे।
शेख साहोनावेज़ (Sekh Sahonawez) पश्चिम बंगाल का एक सियासी नेता हैं, जो All India Trinamool Congress (TMC) पार्टी से जुड़ा हैं और केतुग्राम (Ketugram) विधानसभा क्षेत्र के विधायक रह चुके हैं। आपको बता दें कि केतुग्राम (Ketugram), पूर्व बर्धमान जिले का एक महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र है, जहाँ शेख साहोनावेज़ ने 2011, 2016 और 2021 के तीन विधानसभा चुनाव लगातार जीते और जनता के प्रतिनिधि के रूप में चुने गए।
उनका राजनीतिक सफर मुख्य रूप से केतुग्राम से शुरू हुआ, जहाँ उन्होंने लेफ्ट फ्रंट और CPI(M) जैसे पार्टियों के मजबूत विरोध के बावजूद जीत दर्ज की। खास बात यह है कि उन्होंने हर चुनाव में बड़ी वोट शेयर के साथ जीत हासिल की जैसे 2021 में लगभग 1,00,226 वोट पाकर जीत दर्ज की। हालांकि उनकी प्रमुख पहचान सिर्फ जीत नहीं है, बल्कि वह विवादित पृष्ठभूमि वाले नेताओं में से एक माने जाते हैं। उनके खिलाफ चुनाव हलफनामों में कई आपराधिक मामले दर्ज बताए जाते हैं जिनमें हत्या, बलात्कार, अपहरण, धमकी और चोरी जैसे आरोप शामिल हैं।
शेख साहोनावेज़ TMC में एक मजबूत स्थानीय चेहरे के रूप में जाने जाते हैं और पार्टी के लोकप्रिय नेताओं, जैसे ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी, के समर्थन में सक्रिय रूप से पार्टी प्रचार और कार्यक्रमों में भी भाग लेते हैं।
पश्चिम बंगाल के TMC नेता शेख साहोनावेज़ (Sekh Sahonawez) पर कई गंभीर आपराधिक आरोप दर्ज हैं, जो राजनीति में विवाद का विषय बने हुए हैं। इस नेता पर पर हत्या के तीन मामलों, हत्या के प्रयास (Attempted to Murder), अपहरण (Kidnapping) और अन्य गंभीर आपराधिक आरोप लगाए गए हैं। ये मामले संविधान के तहत दर्ज आपराधिक धाराओं के अंतर्गत आते हैं और आमतौर पर FIR (First Information Report) के रूप में पुलिस थानों में लिखे गए हैं। चुनाव के समय जब उम्मीदवारों को अपने हलफनामे (Affidavit) में अपने खिलाफ दर्ज मामलों को सार्वजनिक करना होता है, तो इस दौरान शाहोंआवेज़ ने भी अपने नाम कई आपराधिक मुकदमों की घोषणा की है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इन मामलों में से कितने कोर्ट तक पहुँचे हैं, कितनों में आरोप सिद्ध हुए हैं, या किन मामलों में उन्हें जमानत मिली है। अधिकांश रिपोर्टों में दावा है कि ये मामले लंबित (Pending) हैं, और न्यायालय में प्रक्रिया जारी है, लेकिन सटीक विवरण उपलब्ध नहीं है।
एक मामला जो काफ़ी चर्चा में रहा वह 2 मई 2021 का है, जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए थे। उसी दिन बीरभूम जिले के इलामबाजार इलाके में बीजेपी कार्यकर्ता गौरव सरकार के साथ कथित तौर पर हिंसा हुई। आरोप लगे कि चुनाव परिणाम आने के कुछ ही घंटों बाद टीएमसी कार्यकर्ताओं ने उनकी बेरहमी से पिटाई की, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इस टीएमसी कार्यकर्ताओं में बीरभूम के लाबपुर विधायक और पूर्व बर्धमान के केतुग्राम विधायक शेख साहोनावेज़ (Sekh Sahonawez) का नाम शामिल था।
भारत में यह सवाल बार-बार उठता है कि आपराधिक आरोपों वाले नेता चुनाव लड़ कैसे सकते हैं? दरअसल, इसका जवाब भारतीय संविधान और चुनाव कानूनों में छिपा है। भारतीय संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति तब तक चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं ठहराया जाता, जब तक उसे किसी मामले में अदालत द्वारा दोषी (Convicted) घोषित न कर दिया जाए। केवल आरोप लगना या FIR दर्ज होना चुनाव लड़ने पर रोक का आधार नहीं है। इसी कानून का फायदा उठाकर कई ऐसे नेता, जिन पर हत्या, अपहरण या धमकी जैसे गंभीर आरोप होते हैं, पार्टी से टिकट लेकर चुनाव मैदान में उतर जाते हैं। कानूनी भाषा में इसे “आरोपित लेकिन दोषसिद्ध नहीं” कहा जाता है। चूंकि मामला अदालत में लंबित होता है, इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता।
राजनीतिक दल भी ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने से पीछे नहीं हटते, क्योंकि कई मामलों में उनका स्थानीय प्रभाव, वोट बैंक और चुनाव जिताने की क्षमता पार्टी के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी वजह से सवाल उठता है कि क्या ऐसे नेता वास्तव में जनता का भविष्य बदल सकते हैं? हालांकि ये डिबेट का मामला है और हर चुनावों में कुछ इस प्रकार के मुद्दे अक्सर उठते रहतें हैं।
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शेख साहोनावेज़ (Sekh Sahonawez) की लगातार चुनावी जीत के पीछे कई राजनीतिक और सामाजिक कारण माने जाते हैं। सबसे बड़ा कारण है उनका स्थानीय जनाधार, जो केतुग्राम (Ketugram) जैसे ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण इलाके में काफी मजबूत बताया जाता है। क्षेत्र में उनकी मौजूदगी लंबे समय से रही है, जिससे स्थानीय स्तर पर एक पावर नेटवर्क बना है। कई लोग मानते हैं कि जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के साथ-साथ स्थानीय प्रभाव और डर-सम्मान की राजनीति भी उनकी पकड़ को मजबूत करती है। इसके अलावा टीएमसी का पॉलिटिकल बैकअप भी उनकी जीत में अहम भूमिका निभाता है। ममता बनर्जी की पार्टी पश्चिम बंगाल में मजबूत संगठन और वोट बैंक के लिए जानी जाती है। चुनाव के समय पार्टी का कैडर, संसाधन और रणनीति उम्मीदवार को जमीन पर मजबूती देती है। शेख साहोनावेज़ (Sekh Sahonawez) को भी पार्टी नेतृत्व का समर्थन मिलता रहा है, जिससे उन्हें हर चुनाव में फायदा मिला।
वहीं दूसरी ओर, विपक्ष लगातार उनके आपराधिक मामलों को लेकर हमला करता रहा है। बीजेपी और वाम दल उन पर “अपराध और राजनीति के गठजोड़” का आरोप लगाते हैं। आम जनता की प्रतिक्रिया बंटी हुई दिखती है कुछ लोग विकास और स्थानीय कामों के नाम पर समर्थन करते हैं, तो कई मतदाता ऐसे नेताओं की राजनीति को लोकतंत्र के लिए खतरा मानते हैं। यही विरोधाभास उनकी जीत की कहानी को जटिल बनाता है। [Rh]