

2025 में दुनिया भर में 128 पत्रकारों की मौत ने प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर खतरे को उजागर किया।
फिलीस्तीन, इज़राइल-गाज़ा, यमन और यूक्रेन जैसे युद्धग्रस्त इलाकों में सबसे ज़्यादा पत्रकार मारे गए।
भारत, मैक्सिको और पेरू जैसे देशों में भी पत्रकारों की हत्या हुई, जहाँ अपराध और भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग कारण बनी।
2025 में दुनिया भर में पत्रकारों की मौतों का कुल आंकड़ा बेहद चिंताजनक रहा है। इस साल अलग-अलग देशों में 128 पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई, जो यह दिखाता है कि सच दिखाना और सवाल पूछना लगातार खतरनाक होता जा रहा है। पत्रकारों पर हो रहे हमले सिर्फ किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक वैश्विक समस्या बन चुकी है। प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरा लगातार बढ़ रहा है। कई देशों में सरकार, किसी पॉवरफुल दल या अपराधियों द्वारा पत्रकारों को डराया जा रहा है, धमकियां दी जा रही हैं और कई बार उन्हें जान से मार दिया जाता है।
इसका सीधा असर लोकतंत्र और आम लोगों के अधिकारों पर भी पड़ता है। संघर्ष और युद्ध क्षेत्रों में काम कर रहे पत्रकारों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। युद्ध (War) की रिपोर्टिंग करते समय वे गोलियों, बमों और हिंसा के बीच फंस जाते हैं। फिर भी पत्रकार जोखिम उठाकर दुनिया के सामने सच्चाई लाने की कोशिश करते हैं, जिसकी कीमत कई बार उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। आज हम आपको 8 ऐसे देशों के बारे में बताएंगे जहां 2025 में सबसे ज्यादा पत्रकारों की मौत (8 such countries where the most journalists died in 2025) हुई है।
2025 में फिलीस्तीन दुनिया भर के सबसे खतरनाक देशों में एक रहा, जहाँ पत्रकारों के लिए काम करना बेहद जोखिम भरा रहा था। साल भर में कुल 56 पत्रकारों की मौत हो गई, जो दुनिया में किसी एक देश में सबसे अधिक संख्या है। यह जानकारी अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के संगठन (IFJ) की रिपोर्ट से मिलती है, जिसमें कहा गया है कि गाजा की युद्ध-स्थिति के कारण पत्रकार लगातार घातक हमलों का शिकार हुए। फिलीस्तीन में यह स्थिति मुख्य रूप से इज़राइल-गाज़ा युद्ध के कारण बनी, जहाँ सैन्य हमलों के बीच रिपोर्टिंग करना बेहद खतरनाक हो गया है। कई पत्रकार सीधे युद्ध क्षेत्रों में घूमकर खबरें कवर कर रहे थे और इसी दौरान उन्हें हवाई हमलों, बमबारी और गोलाबारी में मौत का सामना करना पड़ा। सबसे अधिक चर्चा में रहा वह हमला जब अल जज़ीरा के पत्रकार अनस अल-शरीफ और उनके सहकर्मी गाज़ा शहर के शिफ़ा अस्पताल के बाहर मीडिया टेंट में थे और हवाई हमले में मारे गए।
इज़राइल-ग़ाज़ा संघर्ष साल 2025 में पत्रकारों के लिए दुनिया का सबसे ख़तरनाक युद्ध क्षेत्र बनकर सामने आया। अंतरराष्ट्रीय पत्रकार संगठनों के अनुसार, सैन्य कार्रवाई में होने वाली कुल पत्रकार मौतों में से लगभग 43% इसी क्षेत्र से जुड़ी हैं। इसका मतलब यह है कि हर तीन में से लगभग एक से ज़्यादा पत्रकार की मौत इज़राइल-ग़ाज़ा युद्ध से जुड़ी घटनाओं में हुई। ग़ाज़ा में लगातार हवाई हमले, बमबारी और ज़मीनी सैन्य कार्रवाई के बीच पत्रकार सच्चाई दिखाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते रहे। कई पत्रकार रिपोर्टिंग के दौरान मारे गए, जबकि कुछ के दफ्तर और घर तक सुरक्षित नहीं रहे। इस संघर्ष में स्थानीय पत्रकार सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए, क्योंकि वे लगातार युद्ध क्षेत्र में मौजूद थे।
यमन साल 2025 में भी पत्रकारों के लिए एक बेहद ख़तरनाक देश बना रहा। लंबे समय से चल रहे गृहयुद्ध के कारण 2025 में कम से कम 13 पत्रकारों की मौत दर्ज की गई। ये मौतें ज़्यादातर उस समय हुईं, जब पत्रकार जंग, मानवीय संकट और आम लोगों की स्थिति पर रिपोर्टिंग कर रहे थे। यमन में कई इलाकों पर अलग-अलग गुटों का नियंत्रण है, जहां पत्रकारों को न सिर्फ़ बमबारी और गोलीबारी का खतरा रहता है, बल्कि अपहरण, धमकी और जेल में डाले जाने का डर भी बना रहता है। कई पत्रकारों को सिर्फ़ सच दिखाने और सवाल पूछने की वजह से निशाना बनाया गया। युद्धग्रस्त हालात, कमजोर क़ानून व्यवस्था और पत्रकार सुरक्षा के अभाव ने यमन को मीडिया के लिए बेहद असुरक्षित बना दिया है। ये आंकड़े बताते हैं कि यमन में पत्रकारिता करना आज भी जान जोखिम में डालने जैसा है।
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यूक्रेन साल 2025 में भी पत्रकारों के लिए एक ख़तरनाक देश बना रहा। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते लगभग 8 पत्रकारों की मौत हुई, जो ज़्यादातर रिपोर्टिंग के दौरान हुईं। ये पत्रकार फ्रंटलाइन से खबरें दिखा रहे थे, जहां लगातार मिसाइल हमले, ड्रोन अटैक और भारी गोलाबारी हो रही थी। यूक्रेन में कई बार मीडिया टीमों को सैन्य ठिकानों के पास काम करना पड़ा, जिससे वे सीधे युद्ध की चपेट में आ गए। कुछ पत्रकार बमबारी में मारे गए, जबकि कुछ की मौत सड़क पर रिपोर्टिंग करते समय हुई। स्थानीय पत्रकारों के साथ-साथ विदेशी मीडिया कर्मी भी इस संघर्ष में प्रभावित हुए।
सूडान साल 2025 में भी पत्रकारों के लिए बेहद ख़तरनाक देशों में शामिल रहा। देश में चल रहे इंटरनल वार के कारण कम से कम 6 पत्रकारों की मौत दर्ज की गई। ये पत्रकार ज़मीन पर जाकर हिंसा, मानवाधिकार उल्लंघन (Human Rights Violation) और आम लोगों की समस्याओं को सामने लाने की कोशिश कर रहे थे। सूडान में सेना और अर्धसैनिक बलों के बीच जारी लड़ाई ने मीडिया के लिए हालात और मुश्किल बना दिए। कई इलाकों में पत्रकारों को रिपोर्टिंग के दौरान गोलीबारी, बम धमाकों और हमलों का सामना करना पड़ा। कुछ पत्रकार सीधे संघर्ष में मारे गए, जबकि कुछ को निशाना बनाकर हमला किया गया।
भारत में साल 2025 के दौरान कम से कम 4 पत्रकारों की मौत की रिपोर्ट सामने आई, जिसने एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। ये मौतें अलग-अलग राज्यों में हुईं, जहाँ पत्रकार भ्रष्टाचार, अपराध, अवैध खनन, माफिया और स्थानीय राजनीति से जुड़े मामलों की जांच कर रहे थे। भारत में ज़्यादातर पत्रकारों की मौत सीधे हमले, धमकी और हिंसा से जुड़ी रही। कई मामलों में पत्रकारों को पहले डराया गया, लेकिन सुरक्षा नहीं मिलने के कारण हालात जानलेवा बन गए। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले पत्रकार सबसे ज़्यादा जोखिम में रहे, क्योंकि वहाँ न तो संस्थागत सुरक्षा होती है और न ही तेज़ न्याय मिलता है।
पेरू साल 2025 में लैटिन अमेरिका के उन देशों में शामिल रहा, जहाँ पत्रकारों के लिए हालात बेहद ख़तरनाक रहे। 2025 में पेरू में कम से कम 4 पत्रकारों की मौत की रिपोर्ट की गई। ये पत्रकार ज़्यादातर भ्रष्टाचार, अवैध खनन, ड्रग माफिया और स्थानीय राजनीति से जुड़े मामलों की जांच कर रहे थे। पेरू के कई इलाकों में संगठित अपराध का गहरा असर है, जहाँ सच सामने लाने वाले पत्रकार सीधे निशाने पर आ जाते हैं। कई मामलों में पत्रकारों को पहले धमकियाँ मिलीं, लेकिन समय रहते सुरक्षा नहीं दी गई। कुछ पत्रकारों की हत्या खुलेआम कर दी गई, जिससे मीडिया जगत में डर का माहौल फैल गया।
मैक्सिको साल 2025 में भी पत्रकारों के लिए बेहद ख़तरनाक देशों में शामिल रहा। संगठित अपराध, ड्रग कार्टेल और बढ़ती हिंसा के कारण कम से कम 3 पत्रकारों की मौत दर्ज की गई। इन पत्रकारों की हत्या ज़्यादातर उस समय हुई, जब वे ड्रग माफिया, भ्रष्टाचार और अपराध से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग कर रहे थे। मैक्सिको में पत्रकारों को न सिर्फ़ अपराधियों से खतरा रहता है, बल्कि कई बार स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही भी उनकी सुरक्षा को कमजोर बना देती है। कई मामलों में पत्रकारों को पहले धमकियाँ मिलीं, लेकिन प्रभावी सुरक्षा नहीं दी गई। खासकर छोटे शहरों और सीमावर्ती इलाकों में काम करने वाले पत्रकार सबसे ज़्यादा निशाने पर रहते हैं। [Rh]