अमेरिका में दिसंबर 2025 से “Sharia Free America” बहस तेज़ है, और कीथ सेल्फ-चिप रॉय ने इसी नाम से एक congressional caucus बनाकर शरिया के “influence” को रोकने की बात कही है।
मुद्दा सिर्फ बयान नहीं—H.R. 5722 जैसे बिल के जरिए इमिग्रेशन नियमों में बदलाव कर “Sharia adhere” करने वाले विदेशियों की एंट्री रोकने का प्रस्ताव भी सामने है।
इसका असर भारतीयों पर वीज़ा/स्क्रीनिंग और सोशल माहौल के रूप में पड़ सकता है—खासतौर पर Indian Muslims पर ज्यादा scrutiny का जोखिम, जबकि बाकी South Asians पर भी profiling का indirect खतरा बढ़ सकता है।
अमेरिका की राजनीति में दिसंबर 2025 के बाद एक नया नारा तेज़ी से उभरा है—“ शरिया फ्री अमेरिका (Sharia Free America)”। 18 दिसंबर 2025 को टेक्सास (Texas) के रिपब्लिकन सांसद कीथ सेल्फ और चिप रॉय ने हाउस ऑफ रिप्रेज़ेंटेटिव्स में “Sharia Free America Caucus” लॉन्च किया। दावा है कि इसका मकसद अमेरिका में “शरिया कानून” के प्रभाव को रोकना और अमेरिकी संविधान/पश्चिमी मूल्यों की “हिफाज़त” करना है। आइये समझते हैं कि आखिर क्या है ट्रंप 2.0 का ये शरिया फ्री मामला?
शरिया क्या है?
शरिया (Sharia) इस्लाम का धार्मिक-कानूनी ढांचा है—यानी जीवन से जुड़े नियम और दिशा-निर्देश, जो क़ुरान, हदीस और विद्वानों की व्याख्या से निकलते हैं। आम तौर पर बहुत-से मुसलमान शरिया को अपनी निजी जिंदगी में मानते हैं—जैसे नमाज़-रोज़ा, ज़कात, हलाल-हराम, शादी-तलाक, विरासत वगैरह।
लेकिन राजनीति में अक्सर “शरिया” शब्द को ऐसे पेश किया जाता है जैसे वह एक ही तरह का “सख्त कानून” हो, जबकि हकीकत में इसकी व्याख्या देश-दर-देश और समुदाय-दर-समुदाय अलग होती है। विवाद की जड़ यही है—व्यक्तिगत धार्मिक पालन और राज्य द्वारा लागू “कानून” को एक ही चीज़ बना देना।
“Sharia Free America Caucus” का मुद्दा क्या है?
कॉकस यानी कांग्रेस के भीतर एक ऐसा समूह, जो किसी खास मुद्दे पर मिलकर काम करता है। कीथ सेल्फ और चिप रॉय का कॉकस कहता है कि शरिया का कोई भी “influence” अमेरिकी संविधान के खिलाफ है, इसलिए इसे रोकने के लिए कानून और निगरानी बढ़नी चाहिए। जनवरी 2026 में इस ग्रुप को और राजनीतिक वजन तब मिला जब हाउस मेजॉरिटी व्हिप टॉम एमर के जुड़ने की खबर आई।
अब बहस सिर्फ बयान तक नहीं—बिल तक पहुंच गई
इस पूरे विवाद के केंद्र में एक बिल है: H.R. 5722 – Preserving a Sharia-Free America Act Congress.gov पर दर्ज इस बिल के मुताबिक, इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट में बदलाव कर ऐसे विदेशी नागरिकों (aliens) की एंट्री रोकने का प्रस्ताव है, जिन्हें बिल की भाषा में “शरिया कानून का पालन करने वाला” माना जाए। यानी यह मुद्दा अब “culture war” से निकलकर सीधा इमिग्रेशन/वीज़ा पॉलिसी की दिशा में बढ़ रहा है।
समर्थक क्या कहते हैं?
समर्थकों का तर्क है कि यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि संविधान और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुरक्षित रखने की कोशिश है। वे यूरोप के कुछ देशों का उदाहरण देकर कहते हैं कि वहां “parallel systems” जैसी बहसें चलीं और अमेरिका में ऐसा नहीं होने देना चाहिए।
विरोध क्यों?
आलोचक इसे इस्लामोफोबिक (Islamophobic) और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ मानते हैं। उनकी चिंता यह है कि “शरिया” शब्द को एक डर की तरह पेश करने से आम मुसलमान भी शक की निगाह में आ सकते हैं, और समाज में भेदभाव बढ़ सकता है।
भारतीयों पर इसका असर: भारतीयों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है
वीज़ा इंटरव्यू और स्क्रीनिंग ज्यादा सख्त हो सकती है,
अगर H.R. 5722 जैसी सोच आगे बढ़ती है, तो वीज़ा प्रक्रिया में “ideology screening” जैसा एंगल बढ़ सकता है—मतलब इंटरव्यू में ज्यादा सवाल, ज्यादा दस्तावेज, ज्यादा बैकग्राउंड चेक।
भारतीय मुस्लिम समुदाय पर दबाव ज्यादा
अमेरिका में पढ़ाई/जॉब के लिए जाने वाले या वहां रहने वाले भारतीय मुसलमानों को ज्यादा सवालों, देरी या “prove yourself” वाले माहौल का सामना करना पड़ सकता है—भले वे पूरी तरह कानून-पालक हों।
बाकी भारतीयों पर भी “spillover” का जोखिम
ऐसी बहसें कई बार सिर्फ मुस्लिम तक नहीं रुकतीं। एयरपोर्ट/पब्लिक स्पेस में South Asian दिखने वाले लोगों पर “profiling” बढ़ सकती है—किसी का नाम, शक्ल, या बोलचाल भी वजह बन जाती है। ये हर जगह नहीं होता, लेकिन माहौल सख्त हो तो जोखिम बढ़ता है।
इमिग्रेशन माहौल पहले से टाइट होने का संकेत
जनवरी 2026 में कुछ रिपोर्टिंग/नोट्स में “immigrant visa processing pause” की बात भी सामने आई है।
शरिया एक धार्मिक शब्द है, लेकिन अमेरिका में इसे राजनीतिक हथियार बनाकर पेश किया जा रहा है। “Sharia Free America Caucus” और H.R. 5722 जैसे कदम इस बहस को अब सिर्फ बहस नहीं रहने दे रहे—यह इमिग्रेशन और समाजिक माहौल दोनों पर असर डालने की दिशा में जा रही है
(PO)